Bihar News: दीपावली पर 250 रुपये में मिल रहा सपनों का घर, लेकिन क्या उसमें मिलेगी मिट्टी वाली खुशी?
दीपावली पर मल्टी स्टोरी, चारमीनार, हवामहल डिजाइन के घरौंदे 250 से एक हजार तक में आनलाइन उपलब्ध, गांव-घर में बच्चे ...और पढ़ें

दीपावली के लिए तैयार घरौंदा।
HighLights
परंपरागत घरौंदे बच्चे मिलकर मिट्टी से बनाते थे।
अब ऑनलाइन प्लाईवुड या कार्डबोर्ड के घरौंदे बिक रहे हैं।
किलकारी संस्था बच्चों को मिट्टी से घरौंदा बनाना सिखाती है।
मीरा सिंह, मुजफ्फरपुर। बचपन की दीपावली याद है। पटाखों, मिठाइयों और सजावटी सामान से इतर घरौंदा बनाने का वो उत्साह। सप्ताह 10 दिन पहले से ही सारे भाई-बहन, संगी-साथी मिलकर ईंट, मिट्टी, लकड़ी, गत्ता जमा करने में जुट जाते थे।
घरौंदा एक मंजिला हो या दो, उसकी बनावट, रंग-रोगन, सजावट घंटों मंथन होता। कोई ईंट से घरौंदे की नींव तैयार करता तो कोई मिट्टी गूंथ उससे लिपाई-पोताई करता।
दरवाजे, खिड़की, सीढ़ियों के साथ कैंपस भी तैयार किए जाते थे और फिर दीपावली से एक दिन पहले बारी आती थी उसकी रंगाई और सजावट की। यह महज परंपरा नहीं, सामूहिकता का एहसास भी था।
घर और आसपास के तमाम बच्चे मिलकर एकदूसरे के लिए घर-घरौना (घरौंदा) तैयार करते थे। बड़े-बुजुर्गों का मार्गदर्शन भी होता था। दीपावली के दिन इसमें खील-बताशे, मिठाइयां रख दीया जलाने की परंपरा थी।
हर घर के दरवाजे पर दीपावली से लेकर गंगा स्नान तक घरौंदा देखने को मिलता था। घरौंदे की अहमियत आंखों की चमक और चेहरे की खुशी से झलकती थी।
दीपावली पर घरौंदे की परंपरा आज भी है, लेकिन अब मिट्टी से गढ़े जाने वाले घरौंदे की आनलाइन दुनिया है। मिट्टी से दूर रंग-बिरंगी खूबसूरती है, इसमें परंपरा से दूर एक बाजार है।
जो घरौंदे कभी बच्चे और परिवार के लोग खुद अपने हाथों से आंगन में बनाते थे, वह अब आनलाइन शापिंग पर एक बड़ा मार्केट प्लेस बन चुका है। ये मिट्टी की जगह प्लाईवुड या कार्डबोर्ड से बने होते हैं।
मल्टी स्टोरी, ताजमहल, चारमीनार, हवामहल की डिजाइन वाले घरौंदे की कीमत 250 रुपये से लेकर एक हजार तक है। ये धरौंदे भले ही आकर्षित करते हैं, लेकिन इनमें परंपरा की वो सोंधी खुशबू नहीं, जो मिट्टी से आती है।

दादी-नानी के जमाने से सहेज रहे परंपरा
दरभंगा के कुम्हार शंभू पंड़ित बताते हैं कि मिथिला में घरौना (घरौंदा) का विशेष महत्व हैं। गांव-घर में तो बेटियां 15-20 दिन पहले से ही मिट्टी जमा करने लगती हैं और उसे स्वयं गढ़ती हैं।
हमलोग भी बनाते-बेचते हैं, लेकिन इसमें भी आनलाइन बाजार का प्रचलन बढ़ गया है। मिट्टी की परंपरा से अलग थर्माकोल, कार्डबोर्ड या प्लाईवुड से घरौंदे बनाए जा रहे।
ये देखने में आकर्षक हो सकते हैं, लेकिन इसमें वो परंपरा नहीं, जिसे दादी-नानी के जमाने से हमारी पीढ़ियां सहेज रही हैं। घरौंदा सजावटी वस्तु भर नहीं, यह संस्कृति है, जिसके साथ जनभावना का प्रवाह होता है।

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने की कोशिश
किलकारी की प्रमंडल कार्यक्रम समन्वयक पूनम कुमारी कहती हैं आज की पीढ़ी विलुप्त होती परंपराओं को समझ कर जीवन में उसके महत्व को जान सके, इसके लिए हम अपनी संस्था में बच्चों को मिट्टी से घरौंदा बनाना सिखाते हैं।
कार्यशाला में बच्चे अपनी संस्कृति और क्षेत्रीय कला को जान पाते हैं। एक पहलू यह भी है कि यहां बच्चे समूह में घरौंदा बनाते हैं, उसे रंगते हैं, सजाते हैं। इससे उनमें सबको साथ लेकर चलने की भावना विकसित होती है।
वैज्ञानिक आधार भी है। जब बच्चे अपने हाथों से घरौंदा तैयार करते हैं तो उनका उससे जुड़ाव होता है। लगता है, यह उनका अपना घर है। उसे सजाने-संवारने की क्षमता विकसित होती है।
जो आगे चलकर उनके जीवन में भी काम आता है। इससे बच्चों की कलात्मक क्षमता भी विकसित होती है। यहां वैसे बच्चे भी मिट्टी गूंथते और अपने हाथों से घर बनाते हैं जिनके घर में मिट्टी छूने का माहौल नहीं है।
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