विदेश में पहली भारतीय फैक्ट्री लगाने वाला उद्योगपति, 24 की उम्र में शुरू किया था कारोबार; आज ₹11.30 लाख करोड़ का साम्राज्य
Business history India: इस युवा ने 24 साल की उम्र में एमआईटी से पढ़ाई कर भारत लौटने के बाद लाइसेंस ...और पढ़ें

विदेश में पहली भारतीय फैक्ट्री लगाने वाला उद्योगपति
HighLights
24 साल की उम्र में विदेश में पहली फैक्ट्री स्थापित की।
लाइसेंस राज में वैश्विक व्यापार का विस्तार किया।
आदित्य बिड़ला समूह को 120 बिलियन डॉलर का बनाया।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| सिर्फ 24 साल की उम्र में एमआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके भारत लौटे एक युवा ने ऐसा फैसला लिया, जो आगे चलकर दुनियाभर में 120 बिलियन डॉलर का साम्राज्य बन गया है। आज वह साम्राज्य दुनिया के 41 देशों में फैला है। कहानी है- आदित्य विक्रम बिड़ला (aditya vikram birla) की, जिन्हें भारत के शुरुआती ग्लोबल इंडस्ट्रियलिस्ट्स में गिना जाता है। अब सवाल यह है कि आखिर 24 साल के उस युवा ने ऐसा कौन सा दिमाग लगाया, जिससे उसका कारोबार दुनियाभर में फैल गया।
पिता ने कहा- अपनी मिल खुद खड़ी करो
कहानी शुरू होती है आज से करीब 6 दशक पहले। साल था- 1965। भारत में लाइसेंस राज का दौर था। नया कारोबार शुरू करना आसान नहीं था। फैक्ट्री लगाने के लिए महीनों की कागजी कार्रवाई और सरकारी मंजूरियों से गुजरना पड़ता था। इसी दौर में 24 साल के आदित्य विक्रम बिड़ला अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर कलकत्ता लौटे।
उनके पिता ने उन्हें एक इंडस्ट्रियल लाइसेंस दिया और कहा कि, "अपनी टेक्सटाइल मिल खुद खड़ी करो।" परिवार का कारोबार पहले से था, लेकिन आदित्य ने उसमें सीधे कदम रखने के बजाय अपना कारोबार अलग से शुरू किया।
उन्होंने कलकत्ता में ईस्टर्न स्पिनिंग मिल्स एंड इंडस्ट्रीज (Eastern Spinning Mills & Industries) की स्थापना की। साथ ही, टेक्सटाइल और रेयॉन कारोबार खड़ा करना शुरू किया। लेकिन असली मोड़ इसके चार साल बाद आया।
विदेशी धरती पर फैक्ट्री लगाने वाले पहले भारतीय
साल- 1969, तब वह सिर्फ 25 साल के थे। आदित्य विक्रम बिड़ला थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक पहुंचे। वहां उन्होंने इंडो-थाई सिंथेटिक्स (Indo-Thai Synthetics) नाम की टेक्सटाइल कंपनी शुरू की। यह सिर्फ एक नई कंपनी नहीं थी।
मशहूर लेखिका गीता पीरामल की किताब 'बिजनेस महाराजस' के मुताबिक, यह किसी भारतीय कंपनी की विदेशी धरती पर बनाई गई पहली फैक्ट्री थी। दिलचस्प बात यह है कि तब भारत आर्थिक रूप से दुनिया के लिए ज्यादा खुला नहीं था। देश में लाइसेंस राज का दबदबा था। ज्यादातर भारतीय कारोबारी घरेलू बाजार तक ही सीमित थे। लेकिन बिड़ला ने भारत की सीमाओं के बाहर कारोबार खड़ा करने का फैसला किया। वो भी- आर्थिक उदारीकरण से करीब दो दशक पहले। फिर इसके बाद आदित्य बिड़ला ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
एक देश से दूसरे देश तक कारोबार का विस्तार
- 1973 में आदित्य बिड़ला ने इंडोनेशिया में पीटी इलिगेंट टेक्सटाइल्स (PT Elegant Textiles) नाम की फैक्ट्री शुरू की। इसी साल भारत में उन्होंने कला और थिएटर को बढ़ावा देने के लिए संगीत कला केंद्र (Sangeet Kala Kendra) की स्थापना भी की।
- 1974 में थाईलैंड में थाई रेयॉन आया। यह कारोबार विस्कोस रेयॉन स्टेपल फाइबर (viscose rayon staple fibre) पर आधारित था और आगे चलकर ग्रुप के मजबूत वैश्विक कारोबारों में शामिल हुआ।
- 1975 में उनका टेक्सटाइल और यार्न कारोबार फिलीपींस पहुंचा। 1977 में मलेशिया में पान सेंचुरी एडिबल ऑयल की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर दुनिया की बड़ी सिंगल साइट पाम ऑयल रिफाइनरीज में शामिल हुआ।
- 1978 में थाई कार्बन ब्लैक शुरू हुआ और 1982 तक इंडोनेशिया में पीटी इंडो भारत रेयॉन ने देश में विस्कोस स्टेपल फाइबर के उत्पादन की शुरुआत की।
- करीब दो दशकों में आदित्य विक्रम बिड़ला ने थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और मिस्र जैसे देशों में अपना कारोबार खड़ा कर दिया। आखिरकार उनके पास भारत के बाहर 19 कंपनियां थीं।
सिर्फ टेक्सटाइल पर निर्भर नहीं रहे आदित्य बिड़ला
बिड़ला की रणनीति सिर्फ एक कारोबार को बड़ा करने की नहीं थी। उन्होंने समूह को अलग-अलग उद्योगों में फैलाया। टेक्सटाइल और विस्कोस फाइबर के साथ उन्होंने एल्युमिनियम, केमिकल्स, फर्टिलाइजर्स, पेट्रोकैमिकल्स, इंजीनियरिंग गुड्स, कार्बन ब्लैक, पाम ऑयल और इंसुलेटर्स जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार बढ़ाया।
उनकी MIT की पढ़ाई का असर उनके काम करने के तरीके में दिखता था। वह प्लांट की क्षमता और बड़े पैमाने पर उत्पादन पर जोर देते थे। लेकिन उनकी शख्सियत का दूसरा पहलू भी था। उन्होंने संस्कृत की पढ़ाई की थी और उन्हें पेंटिंग और परफॉर्मिंग आर्ट्स में गहरी दिलचस्पी थी।
साल 1990 में नेतृत्व पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि,
"लोगों को संभालना कोई साइंस नहीं, बल्कि एक आर्ट है। क्योंकि हर व्यक्ति के साथ अलग तरीके से व्यवहार करना पड़ता है।"
कारोबार संभाला तो कर दिए बड़े बदलाव
साल 1983 में उनके दादा जीडी बिड़ला का निधन हुआ। जिसके बाद कारोबार के बड़े हिस्से को संभालने की जिम्मेदारी मिली- आदित्य विक्रम बिड़ला को। तब तक वह खुद करीब 18 साल का कारोबारी अनुभव हासिल कर चुके थे।
इसके बाद उन्होंने ग्रासिम इंडस्ट्रीज, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज, इंडियन रेयॉन और इंडो गल्फ फर्टिलाइजर्स समेत कई कारोबारों की जिम्मेदारी संभाली। उनकी लीडरशिप में ग्रासिम दुनिया की सबसे बड़ी विस्कोस स्टेपल फाइबर निर्माता कंपनी बनी।
हिंडाल्को को कम लागत वाले बड़े एल्युमिनियम प्रोड्यूसर्स में बदला गया। ग्रुप ने पाम ऑयल रिफाइनिंग और कार्बन ब्लैक में भी वैश्विक स्तर पर अपनी जगह बनाई। वे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और एयर इंडिया के डायरेक्टर भी रहे।
उनका नजरिया ग्लोबल कॉम्पीटिशन को लेकर भी साफ था। 1994 में उन्होंने एक सम्मेलन में कहा था कि वे कॉम्पीटिशन से डरते नहीं हैं, बल्कि कॉम्पीटिशन को उनसे डरना चाहिए।
बीमारी के बावजूद काम से जुड़े रहे आदित्य बिड़ला
1993 में आदित्य विक्रम बिड़ला को प्रोस्टेट कैंसर (Aditya Birla Prostate cancer) का पता चला। अगले दो साल में उनकी तबीयत बिगड़ती गई, लेकिन परिवार और कारोबार से उनका जुड़ाव बना रहा। 1 अक्टूबर 1995 को बाल्टिमोर, मैरीलैंड में जॉन हॉपकिन्स हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया। उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 51 साल थी।
उनके निधन के समय विदेशों में मौजूद कारोबार अकेले 8,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का रेवेन्यू कर रहे थे। दुनिया भर में समूह का टर्नओर करीब 15,000 करोड़ रुपए था और सीधे तौर पर 70,000 से ज्यादा लोग काम करते थे।
इसके बाद उनके 28 साल के बेटे कुमार मंगलम बिड़ला ने ग्रुप की कमान संभाली। उन्हें करीब 9,000 करोड़ रुपए की एसेट्स वाला बिजनेस एंपायर विरासत में मिला।
कुमार मंगलम बिड़ला के नेतृत्व में ये अलग-अलग कंपनियां धीरे-धीरे एक नाम आदित्य बिड़ला ग्रुप (Aditya Birla Group) के तहत आईं। इस ग्रुप ने बाद में अल्ट्राटेक सीमेंट और वोडाफोन आइडिया (Vodafone Idea) समेत 60 से ज्यादा अधिग्रहण किए और करीब 20 सेक्टरों में फैल गया।
41 देशों में कारोबार, हाल ही में नए बिजनेस में रखा कदम
आदित्य बिड़ला ग्रुप के मुताबिक, ग्रुप की कंपनियों का कम्बाइन्ड मार्केट कैप 120 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा है। भारतीय करेंसी में यह रकम करीब 11.30 लाख करोड़ रुपए के आसपास बैठती है। आज कंपनी का कारोबार 41 से ज्यादा देशों में फैला है। कंपनी में करीब 2,27,500 कर्मचारी हैं।
बिड़ला ग्रुप ने हाल ही में वायर और केबल के कारोबार में कदम रखा है। ग्रुप ने अल्ट्राबोल्ट नाम से नया ब्रांड लॉन्च किया है। इस नए कारोबार में ग्रुप करीब 1800 करोड़ रुपए निवेश करेगा।
आदित्य विक्रम बिड़ला को 2013 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में स्मारक डाक टिकट (commemorative postage stamp) जारी करके सम्मानित किया था। उन्हें भारत के पहले ग्लोबल इंडस्ट्रियलिस्ट के रूप में भी याद किया जाता है।
आदित्य बिड़ला की खास बात यही है कि, जब ज्यादातर भारतीय उद्योगपति लाइसेंसी राज की सीमाओं के भीतर कारोबार बढ़ा रहे थे। तब एक युवा भारतीय कारोबारी ने देश से बाहर फैक्ट्री लगाने का जोखिम उठाया। बैंकॉक से शुरू हुआ वह सफर आगे चलकर एक ऐसे ग्लोबल बिजनेस ग्रुप की नींव बना, जिसकी कंपनियों का आज कम्बाइन्ड मार्केट कैप 120 अरब डॉलर से भी ज्यादा है।
