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    Health Insurance FAQs: क्लेम रिजेक्ट होने का डर खत्म! लाखों के नुकसान से बचने के लिए पॉलिसी लेते समय जरूर जान लें ये बातें

    Updated: Tue, 28 Jul 2026 12:01 PM (IST)

    यह लेख हेल्थ इंश्योरेंस के महत्वपूर्ण शब्दों जैसे सम इंश्योर्ड, डिडक्टिबल और वेटिंग पीरियड को समझाता है। इन शर्तों को समझकर आप सही पॉलिसी चुन सकते हैं ...और पढ़ें

    Health Insurance FAQs: Important terminology everyone needs to learn before buying any Policy.

    Health Insurance FAQs: Important terminology everyone needs to learn before buying any Policy.

    HighLights

    1. हेल्थ इंश्योरेंस के मुख्य शब्दों को समझना आवश्यक है।

    2. क्लेम रिजेक्शन से बचने के लिए शर्तें जानना जरूरी।

    3. सही पॉलिसी चुनकर मेडिकल इमरजेंसी में वित्तीय सुरक्षा पाएं।

    नई दिल्ली। आज के समय में हेल्थ इंश्योरेंस होना सिर्फ एक ऑप्शन नहीं, बल्कि ज़िंदगी की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। मेडिकल इमरजेंसी कभी भी बताकर नहीं आती, और अस्पताल का एक भारी-भरकम बिल आपकी सालों की मेहनत से जोड़ी गई रकम को एक पल में ही साफ कर सकता है। ऐसे में, किसी भी मुसीबत से बचने के लिए सही हेल्थ पॉलिसी चुनना बहुत जरूरी है।

    लेकिन, कई बार देखा गया कि पॉलिसी लेने वाले अक्सर पॉलिसी में दिए गए कुछ शब्दों को समझ नहीं पाते हैं। और फिर आखिर में या तो पॉलिसी लेने का प्लान कैंसिल कर देते हैं या तो क्लेम ठीक से नहीं कर पाते हैं। तो आपको अब घबराने की जरूरत नहीं है, आज आपको ऐसे शब्दों के बारे में बताएंगे तो आपके लिए जानना बेहद जरूरी हैं।

    1. सम इंश्योरर्ड (Sum Insured)
    सम इंश्योरर्ड का मतलब होता है बीमा राशि। लाइफ इंश्योरेंस में इसे 'सम अश्योर्ड' कहा जाता है, वहीं हेल्थ इंश्योरेंस में इसे सम इंश्योरर्ड कहते हैं। इसका मतलब है कि एक साल में इलाज के कुल खर्च पर इंश्योरेंस कंपनी अधिकतम कितना भुगतान करेगी। मान लीजिए आपका बिल ₹10 लाख का बना और पॉलिसी में सम इंश्योरर्ड सिर्फ ₹5 लाख लिखा है, तो आपको सिर्फ ₹5 लाख तक का ही क्लेम कर पाएंगे, बाकी का ₹5 लाख आपको खुद देना होगा।

    2. डिडक्टिबल (Deductible)
    डिडक्टिबल का मतलब वो रकम है जो बीमा के अलावा आपको अपनी जेब से चुकानी पड़ती है। और उसके बाद ही इंश्योरेंस कंपनी का कवरेज शुरू होता है। मान लीजिए आपकी पॉलिसी में ₹10,000 का डिडक्टिबल है और आपका कुल अस्पताल का बिल ₹1,00,000 आया है, तो ₹10,000 आपको खुद देने होंगे और बाकी के ₹90,000 इंश्योरेंस कंपनी देगी।

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    3. को-पे (Co-pay)
    ये एक ऐसा समझौता है जिसमें अस्पताल के खर्च का एक तय हिस्सा आपको और बाकी हिस्सा कंपनी को उठाना पड़ता है। ये आमतौर पर सीनियर सिटीजन या पहले से मौजूद बीमारियों (Pre-existing diseases) के मामलों में लागू होता है। इससे आपका प्रीमियम तो कम हो जाता है, लेकिन इलाज के वक्त कुछ खर्च आपको भी उठाना पड़ता है।

    4. वेटिंग पीरियड (Waiting Period)
    अगर आपने आज हेल्थ इंश्योरेंस लिया है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि आपका क्लेम तुरंत पास हो जाएगा। कुछ खास बीमारियों या पुरानी बीमारियों के इलाज के लिए एक तय समय (वेटिंग पीरियड) इंतजार करना पड़ता है, जिसके बाद ही उन पर कवरेज मिलता है। मान लीजिए कि आपको पहले से कोई बीमारी है और पॉलिसी के हिसाब से वेटिंग पीरियड 6 महीने है, तो आप उस बीमारी के इलाज का क्लेम 6 महीने बाद कर पाएंगे। इसलिए पॉलिसी लेते समय अपनी पुरानी बीमारियों की सही जानकारी दें, वरना क्लेम रिजेक्ट हो सकता है।

    5. कैशलेस हॉस्पिटलाइजेशन (Cashless Hospitalization)
    इसका मतलब है कि इलाज के दौरान आपको अपनी जेब से एक भी रुपया कैश नहीं देना पड़ेगा। अगर आप कंपनी के नेटवर्क वाले अस्पताल में इलाज कराते हैं, तो अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनी आपस में बिल का निपटारा कर लेते हैं। ऐसे में फिर नियमों के हिसाब से आपको कोई पैसा अस्पताल को नहीं देना पड़ेगा।

    6. इंकरर्ड क्लेम रेशियो (Incurred Claim Ratio - ICR)
    ये रेशियो बताता है कि आप किसी इंश्योरेंस कंपनी पर कितना भरोसा कर सकते हैं। कंपनी ने कुल जितना प्रीमियम इकट्ठा किया, उसमें से कितना पैसा उसने लोगों के क्लेम चुकाने में खर्च किया, इसे ICR कहते हैं। अगर किसी कंपनी का ICR 50% है, तो इसका मतलब है कि उसने 100 रुपये प्रीमियम के तौर पर लेकर 50 रुपये क्लेम में दिए हैं।

    7. एक्सक्लूजंस (Exclusions)
    हेल्थ पॉलिसी में कुछ ऐसी चीजें या बीमारियां होती हैं जिनका खर्च कंपनी नहीं उठाती है। जैसे कॉस्मेटिक सर्जरी, खुद को पहुंचाए गए नुकसान या डेंटल ट्रीटमेंट। पॉलिसी खरीदने से पहले इनकी लिस्ट जरूर पढ़नी चाहिए, वरना आगे आपको दिक्कत हो सकती है।

    8. नो-क्लेम बोनस (No-Claim Bonus - NCB)
    अगर आप पूरे साल ठीक रहते हैं और कोई क्लेम नहीं लेते हैं, तो इंश्योरेंस कंपनियां आपको इसका बोनस देती हैं। अगले साल आपका सम इंश्योरर्ड बिना प्रीमियम बढ़ाए 10% से 50% तक बढ़ जाता है या फिर रिन्यूअल के समय प्रीमियम में छूट मिल जाती है। लेकिन ये जरूरी नहीं है कि हर कंपनी ऐसा करे, हर कंपनी के अलग-अलग प्रावधान हो सकते हैं।

    ऐसे में अगर आप इन छोटी-छोटी लेकिन बेहद जरूरी बातों को समझकर हेल्थ पॉलिसी चुनेंगे, तो मेडिकल एमरजेंसी के समय आपको और आपके परिवार को किसी भी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

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