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अनिल अग्रवाल की वेदांता का बड़ा कदम, ₹10534 करोड़ चुकाए; 3 कंपनियों से हटीं पाबंदियां

Published: Fri, 18 Sep 2026 12:10 PM (IST)Updated: Fri, 18 Sep 2026 12:23 PM (IST)

अनिल अग्रवाल की वेदांता रिसोर्सेज ने 1.1 बिलियन डॉलर के बॉन्ड का सफल भुगतान कर अपनी मुख्य भारतीय ऑपरेटिंग कंपनी, ...और पढ़ें

वेदांता ने चुकाए ₹10534 करोड़ के बॉन्ड, VEDL शेयरों से हटाए सभी बोझ

वेदांता ने चुकाए ₹10534 करोड़ के बॉन्ड, VEDL शेयरों से हटाए सभी बोझ

HighLights

  1. वेदांता ने $1.1 बिलियन के गारंटीड सीनियर बॉन्ड का भुगतान किया।

  2. VEDL इक्विटी शेयरों पर लगे सभी बोझ 2026 से हटेंगे।

  3. प्रमोटर समूह की सहायक कंपनियों के VEDL शेयर मुक्त हुए।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। अनिल अग्रवाल की वेदांता रिसोर्सेज ने घोषणा की है कि 17 सितंबर, 2026 से उसकी मुख्य भारतीय ऑपरेटिंग कंपनी, वेदांता लिमिटेड (VEDL) के इक्विटी शेयरों पर लगे सभी तरह के बोझ हटा दिए जाएंगे। यह कदम 1.1 बिलियन डॉलर (करीब ₹10534 करोड़) के गारंटीड सीनियर बॉन्ड के सफल और पूरे भुगतान व निपटान के बाद उठाया गया है। यह आधिकारिक जानकारी कंपनी ने खुद BSE फाइलिंग में बताई है।

बॉन्ड के भुगतान की जानकारी

ये बोझ (encumbrances) शुरू में 28 जनवरी, 2025 और 29 अक्टूबर, 2025 को दी गई जानकारी के आधार पर लगाए गए थे। ये VRL की सब्सिडियरी, वेदांता रिसोर्सेज़ फाइनेंस II PLC द्वारा जारी किए गए दो बॉन्ड से जुड़े थे।

इसमें पहला 2030 में मैच्योर होने वाले 550 मिलियन डॉलर के 9.475% गारंटीड सीनियर बॉन्ड था जबकि दूसरा 2033 में मैच्योर होने वाले 550 मिलियन डॉलर के 9.850% गारंटीड सीनियर बॉन्ड था।

इन इंस्ट्रूमेंट्स के होल्डर्स के लिए सिटीकॉर्प (Citicorp) ने ट्रस्टी के तौर पर काम किया। पूरा निपटान होने के बाद, इन बॉन्ड इश्यू से जुड़ी सभी जिम्मेदारियां और बोझ औपचारिक रूप से खत्म कर दिए गए हैं।

बोझ हटाने का दायरा

हटाए गए बोझ VEDL के उन इक्विटी शेयरों पर लागू थे जो मुख्य प्रमोटर ग्रुप की सब्सिडियरी कंपनियों के पास थे।

  1. ट्विन स्टार होल्डिंग्स लिमिटेड
  2. वेल्टर ट्रेडिंग लिमिटेड
  3. वेदांता होल्डिंग्स मॉरिशस II लिमिटेड

बॉन्ड की शर्तों के तहत, इन प्रमोटर कंपनियों पर कुछ खास पाबंदियां लागू थीं। इनमें सीधे तौर पर रखी गई संपत्तियों पर सिक्योरिटी इंटरेस्ट बनाने पर रोक, VEDL शेयरों को खरीदने या बेचने से जुड़े नियम और डिफ़ॉल्ट की स्थिति में संपत्ति बेचने की तय प्रक्रियाएं शामिल थीं। SEBI के टेकओवर रेगुलेशन के चैप्टर V के तहत, ये कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ी पाबंदियां 'एनकंब्रेंस' (यानी संपत्ति पर किसी तरह का बोझ या कानूनी दावा) की कानूनी परिभाषा के दायरे में आती थीं।

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