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1812 टीमें तैनात, 81 करोड़ का फंड मिला, फिर भी दिल्ली की हवा क्यों नहीं सुधरी? सिस्टम की खुली पोल

Published: Sat, 26 Sep 2026 06:45 AM (IST)

दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर टीमें और मशीनें लगाई गईं, लेकिन स्थानीय स्रोतों पर प्रभावी लगाम ...और पढ़ें

आइटीओ विकास मार्ग पर प्रदूषण को कम करने के लिए खंभों पर लगी मिस्ट स्प्रे। जागरण

आइटीओ विकास मार्ग पर प्रदूषण को कम करने के लिए खंभों पर लगी मिस्ट स्प्रे। जागरण

HighLights

  1. प्रदूषण नियंत्रण के लिए 1812 प्रवर्तन टीमें तैनात की गईं।

  2. एमसीडी ने स्वच्छ वायु फंड का केवल 16.5% ही खर्च किया।

  3. दिल्ली का प्रदूषण स्तर राष्ट्रीय मानकों से अभी भी बहुत दूर।

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। सर्दियों में दिल्ली की हवा खराब होने से रोकने के लिए पिछले वर्ष सरकार और एमसीडी ने बड़े पैमाने पर उपायों की घोषणा की थी। सड़क की धूल, खुले में कूड़ा जलाने, निर्माण गतिविधियों, वाहनों और औद्योगिक प्रदूषण पर निगरानी के लिए 1812 प्रवर्तन टीमें लगाई गईं।

इसके बावजूद स्थानीय प्रदूषण स्रोतों पर पूरी तरह लगाम नहीं लग सकी। मतलब तंत्र और घोषणाओं की कमी नहीं थी, लेकिन उनके नियमित और प्रभावी अमल पर सवाल बने रहे।

सरकार के अनुसार धूल नियंत्रण के लिए 536, खुले में कूड़ा जलाने की रोकथाम के लिए 622, औद्योगिक प्रदूषण के लिए 65 और वाहनों की जांच के लिए 589 टीमें लगाई गई थीं। इसके अलावा 82 संयुक्त टीमों में 1165 अधिकारी भी तैनात किए गए।

बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े प्रवर्तन तंत्र के बावजूद खुले में कूड़ा जलाने और सड़क पर धूल जैसी समस्याएं क्यों बनी रहीं?

81.3 करोड़ मिले, खर्च हुए सिर्फ 13.41 करोड़

एक बड़ा सवाल एमसीडी को मिले स्वच्छ वायु फंड के इस्तेमाल पर भी उठता है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत एमसीडी को 81.3 करोड़ रुपये मिले थे, लेकिन एक आर्थिक सर्वे के अनुसार इसमें से सिर्फ 13.41 करोड़ रुपये, यानी करीब 16.5 प्रतिशत ही खर्च किए गए।

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इस राशि से 28 पानी के छिड़काव वाले वाहन खरीदे गए तथा उनके संचालन और रखरखाव पर खर्च हुआ। यानी प्रदूषण नियंत्रण के लिए पैसा उपलब्ध होने के बावजूद उसका बड़ा हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो सका।

मशीनें लगीं, लेकिन स्रोत बने रहे

धूल नियंत्रण के लिए 13 प्रदूषण हाटस्पाट पर मिस्ट स्प्रे सिस्टम लगाए गए। दिसंबर 2025 तक 656 बिजली के खंभों पर मिस्ट स्प्रे सिस्टम और ऊंची इमारतों में 156 एंटी-स्माग गन लगाने की जानकारी दी गई। मलबे के लिए 106 संग्रह केंद्रों के अलावा 19 नए केंद्र विकसित करने की प्रक्रिया भी शुरू हुई।

फिर भी फरवरी 2026 में सीएक्यूएम के निरीक्षण में दिल्ली के कई इलाकों में खुले में कूड़ा डंप करने और उसे जलाने के मामले मिले। आयोग को एमसीडी को कूड़ा तत्काल हटाने और जिम्मेदारी तय करने के निर्देश देने पड़े।

सुधार हुआ, लेकिन मानक से अभी बहुत दूर

आंकड़ों में कुछ सुधार जरूर दिखा। दिल्ली का वार्षिक पीएम 10 का स्तर 2024 के 225 से घटकर 2025 में 209 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम 2.5 का औसत 110 से घटकर 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा।

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लेकिन राष्ट्रीय वार्षिक मानक पीएम 10 के लिए 60 और पीएम 2.5 के लिए 40 माइक्रोग्राम है। ऐसे में पिछले साल का अनुभव साफ संकेत देता है कि प्रदूषण नियंत्रण में सिर्फ टीमें, मशीनें व घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। असली परीक्षा स्थानीय स्रोतों पर लगातार कार्रवाई, उपलब्ध बजट के समय पर इस्तेमाल और अधिकारियों की जवाबदेही की है।

कागजी प्लान नहीं, एकीकृत कार्ययोजना जरूरी

दिल्ली का प्रदूषण कम करने के लिए कागजी प्लान नहीं, आसपास के राज्यों को भी मिलाकर एक क्षेत्रीय कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए। इसमें हर क्षेत्र, प्रदूषण कारक एवं जिम्मेदार अधिकारी और विभाग के लिए स्पष्ट प्रदूषण भार कटौती के वार्षिक, मध्यकालीन, दीर्घकालीन लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए। इन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं करने पर सख्त कार्यवाही भी की जानी चाहिए।

इसकी शुरुआत मजबूत निगरानी और रिपोर्टिंग सिस्टम, सेक्टर-विशिष्ट समयबद्ध पूर्ण उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों की स्थापना करने और संबंधित माप संकेतकों के उपयोग से होनी चाहिए।

ये उपाय, जब शहरी स्थानीय निकायों और क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को तकनीकी कौशल और क्षमता प्रदान करके सक्षम किए जाते हैं, तो प्रदूषणकारी क्षेत्रों और विभागों द्वारा की गई प्रगति के आधार पर कुशल निगरानी, रिपोर्टिंग, निरीक्षण, दंड व प्रोत्साहन सुनिश्चित कर सकते हैं।

- सुनील दहिया, संस्थापक, एनवायरोकैटालिस्ट