कैसे मिला भारतीय रुपये को '₹' का यह खास निशान? साल 2010 से पहले अलग थी करेंसी की पहचान
भारतीय रुपये के '₹' चिह्न का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, बल्कि यह 2010 में एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता के जरिए अस्तित्व में आया था।

'Rs' से '₹' तक का ऐतिहासिक सफर (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सुबह चाय की टपरी हो, ट्रेन की टिकट या मोबाइल से किया गया कोई झटपट ऑनलाइन पेमेंट, हर जगह हमारी नजर एक खास निशान पर पड़ती है, और वो है '₹'।
हम इसके इतने आदी हो चुके हैं कि ऐसा लगता है जैसे यह सदियों से हमारे साथ है। हालांकि, हकीकत यह है कि भारतीय करेंसी को मिली यह खास पहचान बहुत पुरानी नहीं है। इस छोटे से चिह्न के पीछे एक आम युवा की असाधारण सोच छिपी है। आइए, विस्तार से जानते हैं इस बारे में।
जब 'Rs' से चल रहा था काम
आजादी के कई दशकों बाद तक, हम अपने पैसों की कीमत को महज 'Rs' या 'Re' लिखकर दर्शाते थे। एक तरफ जहां दुनिया के बाजारों में अमेरिकी डॉलर ($), ब्रिटिश पाउंड (£), यूरोपीय यूरो (€) और जापानी येन (¥) जैसे चिह्नों का अपना एक अलग रुतबा था, वहीं हमारी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के पास अपना कोई ग्लोबल सिंबल नहीं था।
जैसे-जैसे भारत का व्यापार दुनिया भर में फैल रहा था, यह महसूस किया जाने लगा कि हमारी करेंसी को भी एक अपनी स्वतंत्र और ठोस विजुअल पहचान मिलनी चाहिए।
3,000 डिजाइनों के बीच से निकला एक आइडिया
इस बड़ी जरूरत को पूरा करने के लिए साल 2009 में भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता का आयोजन किया। देश के कोने-कोने से डिजाइन्स की झड़ी लग गई और करीब 3,000 प्रविष्टियां सरकार के पास पहुंचीं।
इन्हीं डिजाइन्स में एक ऐसा आइडिया था जिसने जजों का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह आइडिया तमिलनाडु के कल्लाकुरिची जिले के रहने वाले डी. उदय कुमार का था। उदय कुमार पेशे से एक आर्किटेक्ट थे और उस दौरान प्रतिष्ठित आईआईटी बॉम्बे में अपनी पीएचडी की पढ़ाई कर रहे थे। डिजाइन और विजुअल कम्युनिकेशन को लेकर उनकी समझ बहुत गहरी थी। उनका लक्ष्य एकदम साफ था, यानी एक ऐसा निशान तैयार करना जो भारत की जड़ों से भी जुड़ा हो और जिसे पूरी दुनिया आसानी से समझ भी सके।
आधुनिकता और परंपरा का बेजोड़ संगम
उदय कुमार ने अपने डिजाइन में कमाल की रचनात्मकता और सादगी का परिचय दिया। उन्होंने हमारी पारंपरिक देवनागरी लिपि के अक्षर 'र' और अंग्रेजी के रोमन अक्षर 'R' को आपस में पिरो दिया। इसे एक अनोखा रूप देने के लिए, उन्होंने रोमन अक्षर की सीधी खड़ी रेखा को हटा दिया।
अगर आप इस चिह्न को गौर से देखेंगे, तो इसके सबसे ऊपर आपको दो समानांतर रेखाएं दिखाई देंगी। ये रेखाएं सिर्फ सजावट के लिए नहीं हैं। इन्हें हमारे राष्ट्रीय ध्वज 'तिरंगे' के प्रतीक के रूप में डिजाइन किया गया था। साथ ही, ये रेखाएं समानता और आर्थिक संतुलन का भी एक गहरा संदेश देती हैं, जो भारत की तरक्की की आकांक्षाओं से मेल खाता है।
अमर हो गई यह पहचान
उदय कुमार की यह बेजोड़ सोच रंग लाई और जुलाई 2010 में उनके बनाए गए इस डिजाइन को विजेता घोषित कर दिया गया। उनका मकसद सिर्फ एक सुंदर डिजाइन बनाना नहीं था, बल्कि कुछ ऐसा रचना था जो समय की कसौटी पर खरा उतरे।
आज वह इसमें पूरी तरह सफल नजर आते हैं। एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता से निकलकर यह निशान आज हमारी चेकबुक, कीबोर्ड, रेस्टोरेंट के मेन्यू कार्ड, शेयर बाजार और डिजिटल वॉलेट्स का एक अटूट हिस्सा बन चुका है। उदय कुमार का बनाया यह चिह्न आज पूरी दुनिया में भारत की आर्थिक ताकत बयां कर रहा है।
