कौन थी बनारस की मशहूर 'तवायफ' जिसके दिल टूटने की दास्तां पर बना है गाना, 200 साल पहले लिखी गई थी कहानी
कोक स्टूडियो का ये पॉपुलर गाना 200 साल पुरानी एक नाकाम मोहब्बत की कहानी कहता है। यह बनारस की तवायफ गौहर जान और असलम के अधूरे प्यार की कहानी कहता है।
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बनारस की मशहूर गायिका गौहर जान
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। बीते दिनों कोक स्टूडियो का एक गाना सोशल मीडिया पर छाया हुआ था। भोजपुरी और अवधी भाषा के संगम से बने इस गीत में एक खास तरह का रस था जिसकी वजह से काफी लोग इसे खूब पसंद कर रहे थे।
वहीं कुछ यूजर्स इंस्टाग्राम रील्स में इसका खूब इस्तेमाल कर रहे थे। हम बात कर रहे हैं रेखा भारद्वाज (Rekha Bhardwaj) और उत्पल उदित (Utpal Udit) के उस खास गीत की जिसने आते ही खूब हलचल मचा दी।
नाकाम मोहब्बत की कहानी कहता है गीत
ये गाना पूर्वांचल या बिहार साइड में गाई जाने वाली एक खास तरह की कजरी है जोकि सुनने में किसी खाने के ऊपर बना गीत लगता है लेकिन ये असल में एक नाकाम मोहब्बत की दास्तां हैं। हम बात कर रहे हैं 'कोक स्टूडियो भारत' (Coke Studio India) के गाने 'कचौड़ी गली' (Kachaudi Gali) के बारे में।
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असलम से प्यार करती थीं गौहर?
गाने के बोल 'सेजिया पर लोटे काला नाग, कचौड़ी गली सून कइला बलमु' एक प्रेमिका की तड़प के बारे में है जिसका प्रेमी मिर्जापुर जाकर बस गया है जबकि प्रेमिका बनारस में है। ये कहानी 200 साल पुरानी गौहर जान की है जो बनारस की दाल मंडी में रहने वाली एक तवायफ थी।
एक बार वो कचौड़ी गली घूम रही थी जहां उन्होंने असलम को देखा। असलम से उनकी कोई बातचीत नहीं हुई लेकिन देखते ही पहली नजर में वो उन्हें अपना दिल दे बैठीं।
एक तरफा प्यार में हुईं दीवानी
गौहर जान को उनसे एक-तरफा आकर्षण हो गया। जब वह युवक उस जगह से हमेशा के लिए दूर चला गया, तो उसके बिछड़ने के दर्द और अकेलेपन को व्यक्त करने के लिए यह गीत अस्तित्व में आया। असलम मिर्जापुर चला गया तो गौहर खान ने ये गीत गाया था। बाद में उन्हें मालूम चला की विदेशियों ने उन्हें रंगून भेज दिया है। इस वजह से गीत में मिर्जापुर और रंगून जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इस गाने को गिरमिटिया गीत भी कहा जाता है।
महफिलों में जब भी कोई तवायफ सच्चे प्रेम में दिल टूटने या जुदाई का दर्द झेलती, तो वह इस गीत को गाती थी। बाद में बनारस की महान शास्त्रीय गायिका रसूलन बाई ने इस पारंपरिक गीत को अपनी महफिलों में गाकर इसे अमर और बेहद यादगार बना दिया था।
आज भी बनारस में मौजूद है वो गली
मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपने कार्यक्रम में इसे जरूर बजाते थे। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने भी इस कजरी को कई बार गाया है। वाराणसी में कचौड़ी गली नाम से ये जगह आज भी मौजूद है।
