Adarsh Baal Vidyalaya Review: सरकारी स्कूलों की खोलती पोल, उठाए गंभीर मुद्दे; इस एक कमी ने बिगाड़ा सीरीज का खेल
Prime Video पर के के मेनन और नवीन कस्तूरिया स्टारर वेब सीरीज आदर्श बाल विद्यालय (Adarsh Baal Vidyalaya) ने दस्तक दे दी है। रिव्यू में पढ़ें कैसी है ये ...और पढ़ें
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आदर्श बाल विद्यालय रिव्यू
HighLights
आदर्श बाल विद्यालय रिव्यू
प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हुई सीरीज
रिव्यू में पढ़ें कैसी है सीरीज?
एकता गुप्ता, नई दिल्ली। दो महीने पहले मई में लुक्खे जैसी फुल पैकेज सीरीज देने वाले हिमांक गौर ने एक बार फिर ओटीटी पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है वो भी एक अलग और जमीन से जुड़ी कहानी के साथ। एक ऐसी कहानी जिसे भारत का एक बड़ा वर्ग जीता है और इस कहानी के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं जिनसे कोई अनजान नहीं है लेकिन इनके लिए कम ही आवाज उठती है।
आदर्श बाल विद्यालय (Adarsh Baal Vidyalaya) जिसमें के के मेनन, Aspirants सीरीज से स्टूडेंट्स के बीच जाना पहचाना चेहरा बने नवीन कस्तूरिया, अर्चना पूरन सिंह, प्रसन्ना बिष्ट और अन्य कलाकार शामिल हैं। रिव्यू में पढ़ें कैसी है प्राइम वीडियो (Prime Video) की ये नई सीरीज?

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कहानी
आदर्श बाल विद्यालय (Adarsh Baal Vidyalaya) में के के मेनन (Kay Kay Menon) ने स्कूल के हेडमास्टर का किरदार निभाया है लेकिन वे कोई सख्त या सीरियस प्रिंसिपल नहीं बल्कि बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने वाले, पढ़ाई लिखाई पर ज्यादा सख्ती ना बरतने वाले हेडमास्टर हैं। लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि रिजल्ट के आधार पर दिल्ली के टॉप 10 में आने वाले स्कूलों के हेडमास्टर्स को कैम्ब्रिज (Cambridge) जाने का मौका मिलेगा तो वे अपने स्कूल के बच्चों के रिजल्ट और स्कूल व्यवस्था सुधारने में लग जाते हैं।
हालांकि स्कूल के टीचर्स को यह नहीं पता आखिर हेडमास्टर ऐसा क्यों कर रहे हैं लेकिन फिर भी वो उनका साथ देते हैं क्योंकि प्रिंसिपल ने भी सबकी कभी न कभी मदद तो की ही थी। स्कूल व्यवस्था सुधारने और ज्यादा से ज्यादा बच्चों को अच्छे मार्क्स दिलाने के पीछे चलने वाले इस मिशन में कई ऐसे मुद्दे आते हैं जिनसे हम कभी ना कभी रुबरु जरूर हुए हैं। भले ही उन मुद्दों का हिस्सा हम ना रहे हों लेकिन उनके हमारे आसपास होने की वजह से उनसे जुड़ाव महसूस होता है
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तो क्या हेडमास्टर साहब अपने स्कूल को टॉप 10 में ला पाएंगे? क्या वे ये प्रतियोगिता जीतकर अपनी पत्नी के साथ कैम्ब्रिज जा पाएंगे? क्या स्कूल के बच्चे सचमुच पढ़ाई को लेकर सीरियस हो पाएंगे? इन सब सवालों के जवाब आपको सीरीज देखने पर मिलेंगे।
एक्टिंग
देखा जाए तो आदर्श बाल विद्यालय की सबसे मजबूत कड़ी में से एक एक्टिंग ही है। जिसमें एक सॉफ्ट बिहेवियर वाले हेडमास्टर के रोल में के के मेनन ने अच्छा काम किया है वहीं नवीन कस्तूरिया ने स्कूल के काउंसलर का किरदार निभाया है जिनकी बेटी उसी स्कूल में पढ़ती है।
हालांकि एस्पिरेंट्स से तुलना करेंगे तो उनका रोल आपको उतना वजनदार नहीं दिखेगा क्योंकि लीड में पहले के के मेनन जैसे मंझे हुए कलाकार है। लेकिन नवीन के किरदार को थोड़ी और मजबूती दी जा सकती थी।
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वहीं अर्चना पूरन सिंह, प्रसन्ना बिष्ट और अन्य सपोर्टिंग कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है। अब बात करें सीरीज के बच्चों की तो एक्टिंग अच्छी है लेकिन कहीं कहीं पर बच्चों का टीचर और पैरेंट्स के साथ इतना कूल, रूड और ओवर द टॉप बिहेवियर थोड़ा अन रियलिस्टिक लगता है। माना सरकारी स्कूल के बच्चों की छवि थोड़ी लापरवाह और अकडू मानी जाती है लेकिन टीचर्स के सामने इतनी बदतमीजी, छोटी छोटी बातों पर विरोध करना या धमकी देना थोड़ा कम रियल लगता है।
डायरेक्शन
सीरीज का डायरेक्शन हिमांक गौर (Himank Gaur) ने किया है जिन्होंने पहले ढिढोरा, ताजा खबर और लुक्खे बनाई है। हिमांक की पिछली बार सीरीज की तुलना में इस सीरीज में डायरेक्शन थोड़ा फीका पड़ गया। उनकी ताजा और पिछली सीरीज लुक्खे देखें तो इसमें कहानी से लेकर मुद्दे और फ्लो सबकुछ सही था।
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लेकिन आदर्श बाल विद्यालय में जो सबसे बड़ी कमी खलती है वह है स्टोरीटेलिंग की। सीरियस मुद्दे होने के बाजवूद कहानी में वो फ्लो नहीं बैठ पाता जो दर्शक को आगे के एपिसोड देखने पर मजबूर कर दे। वहीं अच्छे कलाकारों को स्क्रीन पर कहानी के फ्लो में पिरोना ही डायरेक्टर का काम है, जो इस सीरीज में थोड़ा अधूरा लगा।
आदर्श बाल विद्यालय रिव्यू (Adarsh Bal Vidyalaya Review)
एक्टिंग, कहानी का टॉपिक और गंभीर मु्द्दे ने इस सीरीज को अच्छा तो बनाया लेकिन स्टोरीटेलिंग की वजह से इसका खेल थोड़ा बिगड़ गया। कैम्ब्रिज जाने के सपने से कहानी शुरू होती है लेकिन ये बात बीच में चल रही जद्दोजहद में कहीं गुम हो जाती है। क्योंकि जिस मंजिल के लिए इस रास्ते पर चले थे वह मंजिल बीच-बीच में नजर नहीं आती जिससे पता ही नहीं चलता कि यह सब क्यों शुरू हुआ था?
सीरीज की सबसे अच्छी बात हर एपिसोड में एक नया और रियलिस्टीक मुद्दा उठाना है। पैसे कमाने के शॉर्टकर्ट के लिए नेटवर्क मार्केटिंग का लालच, सिर्फ पढ़ाई की रेस में भागने से बेहतर अपने पैशन को फॉलो करना, बायोलॉजी के पीरियड में रीप्रोडक्शन चैप्टर को लेकर टीचर और स्टूडेंट्स के बीच असहजता होना, मिड डे मिल और भी बहुत कुछ।
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सीरीज में एक दो डायलॉग को छोड़कर बाकी सब घिसे पिटे से लगते हैं। हां गाने अच्छे हैं लेकिन बस सीरीज देखने तक ही बाद में वे याद नहीं रहते। लेकिन हां सरकारी स्कूलों के हाल को खुलकर सीरीज में दिखाया गया है जो कि एक रियलिटी है और कड़वी सच्चाई भी।
देखें या नहीं?
अगर आप रियलिस्टिक मुद्दे वाली और जमीन से जुड़ी कहानियां पसंद करते हैं और स्टोरीटेलिंग को थोड़ा सा नजरअंदाज कर सकते हैं, तो ये सीरीज देखने लायक है। लेकिन अगर आप के के मेनन या नवीन कस्तूरिया के नाम होने की वजह से सीरीज से बड़ी उम्मीद लगाकर बैठे हैं तो आप निराश हो सकते हैं।