विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

न डायलॉग, न गाना... फिर भी पूरी कहानी कह देता है झारखंड का 'छऊ डांस', युद्ध के मैदान से जुड़ा है ये लोक नृत्य

Updated: Fri, 21 Aug 2026 12:21 PM (GMT+05:30)

झारखंड का लोक नृत्य छऊ, डांस के साथ-साथ मार्शल आर्ट्स और नाटक का भी संगम है। इसमें बिना बोले कहानी सुनाई जाती है।

झारखंड की संस्कृति का हिस्सा है छऊ नृत्य (AI Generated Image)

झारखंड की संस्कृति का हिस्सा है छऊ नृत्य (AI Generated Image)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। झारखंड की लोक संस्कृति में छऊ नृत्य का खास महत्व है। दूसरे नृत्यों की तरह, इसमें कलाकार सिर्फ डांस नहीं करते, बल्कि मार्शल आर्ट्स और नाटक का मेल भी पेश करते हैं। 

इतना ही नहीं, इस नृत्य की एक खासियत ये भी है कि इसमें कलाकार अपने मुंह से एक भी शब्द नहीं निकालते और न गाने बजाए जाते हैं। बिना कुछ बोले ही इस नृत्य के जरिए नृतक पूरी कहानी दर्शकों को बताते हैं। आइए जानें झारखंड के इस लोक नृत्य की शुरुआत कैसे हुई।  

क्या है छऊ नृत्य का इतिहास?

माना जाता है कि छऊ नृत्य की शुरुआत सरायकेला के रजवाड़ों और स्थानीय जनजातीय समुदायों से सैन्य अभ्यास से जुड़ी है। सैनिक अपने युद्ध कौशल को बनाए रखने के लिए ढोल-नगाड़ों की थाप पर युद्ध अभ्यास किया करते थे और यही से छऊ नृत्य शुरू हुआ। 

नगाड़ों की थाप पर युद्ध अभ्यास ने धीरे-धीरे नाटक और नृत्य का रूप ले लिया। 18वीं और 19वीं सदी में सरायकेला के राजाओं ने इस नृत्य को संरक्षण दिया और समय के साथ इस नृत्य की कई शैलियों ने भी रूप लिया। 

कैसे मिला इसे ये नाम?

छऊ नृत्य को उसका नाम कैसे मिला, इससे जुड़ी कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती है, लेकिन इससे जुड़ी कुछ मान्यताएं हैं। एक मान्यता है कि इसका नाम सैनिकों की छावनी से बना है। युद्ध अभ्यास से विकसित होने की वजह से इसे यह नाम मिला। दूसरी मान्यता है कि छऊ का मतलब छवि है, जो इस डांस को मुखौटा पहनकर करने की वजह से मिला है।  

क्यों खास है छऊ नृत्य?

छऊ नृत्य में मार्शल आर्ट और युद्ध कलाओं का मेल देखने को मिलता है। इसमें तलवारबाजी, ढाल चलाने के पैंतरे और हवा में ऊंची छलांग लगाने जैसे स्टेप्स शामिल होते हैं। झारखंड का छऊ नृत्य अपनी कलात्मकता के लिए जाना जाता है। इसमें कलाकार अपने चेहरे पर मिट्टी और पेपेर मैश के मुखौटे पहनते हैं और शरीर की मुद्राओं से कहानी कहते हैं।  

चेहरे के भाव मुखौटे के पीछे छिपे होने की वजह से इस नृत्य में शरीर की मुद्राओं और भाव की काफी अहम भूमिका होती है। इस नृत्य में रामायण, महाभारत, पौराणिक कथाएं और लोक कथाओं को दिखाया जाता है। इसकी एक खासियत यह भी है कि इस नृत्य में बोला या गाया नहीं जाता है, बल्कि ढोल, धंसा और शहनाई जैसे वाद्य यंत्रों पर इस नृत्य को पेश किया जाता है। 

कैसे किया जाता है छऊ नृत्य?

छऊ नृत्य खासतौर से चैत्र पर्व के दौरान किया जाता है। खुले मैदान में रात भर इस नृत्य का आयोजन किया जाता है। नर्तक भारी और रंग-बिरंगे पोशाक पहनते हैं और अपने पात्र, जैसे देव, असुर, जानवर आदि के अनुसार अपने मुखौटे चुनते हैं। 

इस नृत्य में शुरुआत बहुत धीमी चाल से होती है, जिसे सैनिक चाल कहा जाता है, लेकिन जैसे-जैसे ढोल की ताल तेज होती है, कलाकार की चाल तेज होने लगती है। वाद्य यंत्रों के संगीत पर यह पूरा नृत्य किया जाता है और अपनी शरीर के हाव-भाव से पूरी कहानी लोगों के सामने पेश की जाती है।