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मराठी फिल्म गोंधल में दिखी महाराष्ट्र की लोक संस्कृति, कुलदेवी के आह्वान के लिए पूरी रात किया जाता है ये नृत्य

Published: Sat, 19 Sep 2026 11:56 AM (IST)

भारत की ओर से ऑस्कर एंट्री के लिए मराठी फिल्म गोंधल को चुना गया है। गोंधल महाराष्ट्र का एक लोक नृत्य है।

क्या है महाराष्ट्र का 'गोंधल'? (AI Generated Image)

क्या है महाराष्ट्र का 'गोंधल'? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इस साल मराठी फिल्म गोंधल को ऑस्कर 2027 के लिए भारत की ओर से चुना गया है। क्या आप जानते हैं कि इस फिल्म का नाम एक मराठी लोक नृत्य परंपरा से जुड़ा है?

जी हां, गोंधल महाराष्ट्र का एक लोक नृत्य है, जिसे सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं किया जाता। इस नृत्य के पीछे मराठी संस्कृति से जुड़ी एक गहरी परंपरा है। आइए जाने क्यों किया जाता है गोंधल और महाराष्ट्र में इसका क्या महत्व है।

क्या होता है गोंधल?

गोंधल महाराष्ट्र का एक पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक लोक नृत्य है। इसे कुलदेवी खासकर भवानी और रेणुका माता के आह्वान के लिए किया जाता है। 

इस नृत्य में गीत, अभिनय और भक्ति का मेल होता है, जिसे नृतक पेश करते हैं। गोंधल करने वाले कलाकारों को गोंधली कहा जाता है और इसी समुदाय के लोगों ने इस परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया है। 

क्यों किया जाता है गोंधल?

गोंधल कुलदेवी के लिए आभार जाहिर करने के लिए और उनका आशीर्वाद लेने के लिए आयोजित किया जाता है। परिवार के किसी शुभ काम खासकर शादी के बाद कुलदेवी का आशीर्वाद लेने के लिए गोंधल किया जाता है। कोई मनोकामना पूरी होने के बाद भी गोंधल का आयोजन किया जाता है, ताकि देवी का आभार व्यक्त किया जा सके। 

महाराष्ट्र में गोंधल का महत्व

मराठी संस्कृति में गोंधल धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से काफी महत्व रखता है। ताल और तुनतुने की धुन के साथ गोंधली कुलदेवी की आराधना करते हैं और उनका आह्वान करते हैं। माना जाता है कि गोंधल छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से भी पुराना है और शुभ अवसरों और युद्ध में विजय के बाद ये नृत्य किया जाता था।  

गोंधल सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। इस आयोजन में परिवार और गांव के लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं और देवी की आराधना करते हैं। 

कैसे किया जाता है गोंधल?

गोंधल का आयोजन रात को किया जाता है, जो पूरी रात चलता है और लास्ट में देवी की आरती की जाती है। गोंधली खास पोशाक पहनते हैं, जिसमें लंबा कुर्ता, धोती, सिर पर फेटा और गले में कौड़ियों की माला पहनते हैं और माथे पर तिलक लगाते हैं। 

गोंधल को ढोल और तुनतुने जैसे वाद्य यत्रों की धुन पर किया जाता है। सबसे पहले कुलदेवी की पूजा की जाती है, मशाल जलाई जाती है और गीत गाकर देवी का आह्वान किया जाता है। ढोल की थाप के साथ गोंधली नृत्य करते हैं और पौराणिक काथाएं सुनाते हैं। गोंधल का अंत कुलदेवी की महाआरती के साथ होता है।