राजस्थान की बेटियों के पीहर के इंतजार की दास्तान है 'चिरमी' लोकगीत, एक पौधे से जुड़ी है इसकी भावुक कहानी
एक नवविवाहिता की दु:ख भरी कहानी से जुड़ा है राजस्थान का यह चिरमी लोकगीत।

चिरमी: ससुराल गई बेटी के दर्द का लोकगीत (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान की संस्कृति में लोकगीतों का अपना खास महत्व है और इन्हीं में से एक लोकगीत है चिरमी। वैसे तो इस राज्य में चिरमी नाम से एक पौधा भी है, जो खासकर मारवाड़ के क्षेत्र में पाया जाता है। इन दोनों को ही केंद्र में रखकर हम आज राजस्थान के लोकप्रिय चिरमी लोकगीत की बात करेंगे, जिसे ससुराल गई बेटी के दर्द का गीत भी माना जाता है।
चिरमी: ससुराल गई बेटी के दर्द का लोकगीत
चिरमी राजस्थान में एक औषधीय बेल वाला पौधा है, जिसपर लाल और काले रंग के बीज आते हैं। यह मारवाड़ के ग्रामीण इलाकों में पाया जाता है जिससे चिरमी नामक लोकगीत निकला। इसकी उत्पत्ति की कहानी कुछ ऐसी है कि शादी के बाद जब नई नवेली दुल्हन अपना पीहर छोड़कर ससुराल जाती है तो उसे अपने परिवार वालों की खूब याद सताती है। उन पलों में वो घर के आंगन में लगे चिरमी के पौधे को संबोधित करते हुए अपने मन की व्यथा सुनाती है।
इन्हीं भावुक क्षणों से इस लोकगीत का जन्म हुआ, दूसरे शब्दों में कहें तो चिरमी का यह पौधा उसके भावुक मन का प्रतीक बन जाता है। वह पौधे के सामने रोकर अपना दु:ख व्यक्त करती है और अपने भाई और पिता के उसे लेने आने के इंतजार में बैठी रहती है।
राजस्थानी संस्कृति से खास नाता
राजस्थानी संस्कृति में चिरमी लोकगीत का खास महत्व है, क्योंकि यह गीत उस समय की स्मृतियों के बारे में बताता है जब संचार के कोई माध्यम उपलब्ध नहीं थे। उस दौर में कैसे एक नवविवाहिता ने किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि पौधे को अपने दु:ख का साथी बनाकर उससे सब कुछ साझा किया। इस तरह यह गीत मरुधरा की बेटियों के अपजने मायके के प्रति प्रेम और धैर्य का प्रतीक भी है।
चिरमी के लोकगीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं:
म्हारे चिरमी रा डाळा चार
वारी जाऊं चिरमी नै
चिरमी नै पीवरिये रौ कोड
वारी जाऊं चिरमी नै
इस गीत में नई दुल्हन चार डालियों को अपने परिवार के सदस्यों का प्रतीक मान रही है और वह कह रही है कि चिरमी का पौधा ही उसके सुख-दु:ख का साथी है।
चिरमी लोकनृत्य भी है इसका हिस्सा
चिरमी का लोकगीत गाते हुए महिलाएं नृत्य भी करती हैं और धीरे-धीरे घूमर स्टाइल में नृत्य करना शुरू करती हैं। अब बेल के पौधे को दर्शाने के लिए अपने हाथों को ऊपर-नीचे लहराते हुए ले जाती हैं। इसके बाद अपनी कलाइयों और उंगलियों का उपयोग करते हुए नाजुक इशारे किए जाते हैं। वहीं, पैरों का मूवमेंट इतनी खूबसूरती से होता है कि लहंगे का घेर नृत्य करते समय फैलता है।
