न मूर्ति, न मंदिर.. शरीर पर राम नाम गुदवाकर भक्ति करता है छत्तीसगढ़ का ये समुदाय; 130 साल पहले शुरू हुई परंपरा
छत्तीसगढ़ का रामनामी समुदाय भगवान श्री राम की भक्ति का अनूठा मार्ग अपनाता है।

भगवान श्री राम रामनामी समुदाय की संस्कृति का अहम हिस्सा (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। "जाकी रही भावना जैसी प्रभु, मूरत देखी तिन तैसी" रामचरित मानस में लिखे गोस्वामी तुलसीदास के ये वाक्य भक्ति के अलग-अलग रूपों के बारे में बताते हैं। कोई भक्ति में झूमने लगता है, तो कोई पूजा-पाठ के माध्यम से अपने ईश्वर को रिझाने की कोशिश करता है। पर छतीसगढ़ में एक ऐसा भी समुदाय है, जिसने ईश्वर को पूजने के लिए एक अलग ही मार्ग अपनाया।
हम बात कर रहे हैं इस राज्य में निवास करने वाले रामनामी समुदाय की, कहते हैं इस समुदाय ने भगवान श्री राम की भक्ति में अपना पूरा जीवन ही समर्पित कर दिया। आइए इस समुदाय के बारे में विस्तार से जानते हैं।
भगवान श्री राम इस समुदाय की संस्कृति का अहम हिस्सा
छत्तीसगढ़ में महानदी के आसपास रहने वाले रामनामी समुदाय के लोगों के दिन की शुरुआत और अंत राम का नाम लेकर होता है। इतना ही नहीं, भक्ति में डूबे हुए ये लोग अपने पूरे शरीर पर राम का नाम गुदवाते हैं, क्योंकि इस समुदाय ने आजीवन राम नाम का जाप करने का संकल्प लिया हुआ है।
उनके पहनावे की बात करें तो ये लोग सफेद रंग के कपड़े पहनते हैं, जिसपर सब जगह राम का ही नाम लिखा होता है। वहीं, इनके घरों की दीवारों पर भी अलग-अलग तरीकों से प्रभु श्री राम का नाम लिखा होता है। इस समाज में रहने वाले लोगों की जीवन का एक ही उद्देश्य है कि भगवान राम उनके मन में बस जाएं।
130 साल पहले रखी गई थी इस समाज की नींव
रामनामी समाज के लोगों को देखकर लग सकता है कि यह परंपरा सदियों पुरानी होगी, पर इसकी नींव आज से लगभग 130 साल पहले 1890 में रखी गई थी। उस समय युवक परशुराम ने निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया और राम का वास मूर्ति में न मानकर स्मरण करने को अपनाया। बताते चलें कि आज इस समाज के ज्यादातर लोग सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिले के बिलाईगढ़ तक ही सिमट रह गए हैं।
भगवान श्री राम का ननिहाल है छत्तीसगढ़
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि प्रभु राम की माता कौशल्या का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर में चंदखुरी गांव नामक गांव में हुआ था। त्रेता युग में इस स्थान को 'दक्षिण कौशल' कहा जाता था। यही वजह है कि यहां माता कौशल्या को समर्पित इकलौता मंदिर भी है।
