होमवर्क AI कर रहा है और बच्चा फोन में लगा है? साइकोलाजिस्ट ने बताया कैसे लौटाएं बच्चों की एकाग्रता
पढ़ाई हो या खाना, हर वक्त आंखों के सामने है स्मार्टफोन। हर मिनट आते तरह-तरह के नोटिफिकेशन इसमें बढ़ा देते हैं मुसीबत।

क्या आपका बच्चा भी AI से कर रहा है होमवर्क? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 'अभी तो बताया था फिर कैसे याद नहीं रहा? अगर समझ न आए तो दोबारा पूछो, लेकिन सवाल पूरा हल भी करो।' सातवीं कक्षा में पढ़ रहे वेदांश को होमवर्क करने में मदद कर रहे उसके चाचू समझा तो रहे हैं, मगर वेदांश का मन पास रखे स्मार्टफोन पर बार-बार आ रहे नोटिफिकेशन में लगा हुआ है।
चाचू का फोन वेदांश भी खूब इस्तेमाल करता है। उसी फोन पर उसका स्कूल का ग्रुप बना हुआ है, जिसमें सहपाठियों की चर्चा से लेकर स्कूल के नोटिस भी आते रहते हैं। चैटजीपीटी और एआई टूल्स के इस जमाने में बच्चे होमवर्क और स्कूल प्रोजेक्ट्स के लिए पूरी तरह तकनीक पर निर्भर होने लगे हैं।
इसके साथ ही, ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान मोबाइल और टैबलेट पर बार-बार आने वाले नोटिफिकेशंस उनका ध्यान भटकाते हैं। आज माता-पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे बच्चों की खुद सोचने, सवाल पूछने और समस्याओं को हल करने की क्षमता और एकाग्रता को कैसे बनाए रखें, साथ ही उन्हें तकनीक का सही इस्तेमाल सिखाएं।
सोचने के लिए करें प्रेरित
जब बच्चे के सामने कोई कठिन असाइनमेंट आता है, तो असफल होने या काम को जल्दी करने के लालच में वे तुरंत एआई की शरण में चले जाते हैं। एआई उन्हें तुरंत बना-बनाया काम दे देता है, जिससे वे सीखने के संघर्ष से बच जाते हैं।
ऐसे में बच्चे को एआई इस्तेमाल करने से डांटने या रोकने के बजाय यह समझें कि बच्चा किस क्षेत्र में अटक रहा है। बच्चे से कहें कि आओ मैं यह आपको समझाता/सिखाता हूं।
बच्चों को बताएं कि एआई एक सहायक उपकरण है, जो जानकारी दे सकता है, लेकिन सोचने और समझने का दिमाग बच्चे का अपना ही होना चाहिए। परीक्षा बच्चे की होगी, एआई की नहीं।
भटकाते हैं नोटिफिकेशंस
बार-बार स्क्रीन देखने और इंटरनेट मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से बच्चों में एकाग्रता की अवधि कम हो रही है। वे किसी भी तरह की धीमी प्रक्रिया से ऊबने लगे हैं और हर चीज का तुरंत परिणाम चाहते हैं। इससे बचने का एक तरीका यह भी है कि बच्चों को इंटरनेट का फ्री और अनियंत्रित एक्सेस कतई न दें। जब बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल करें, तो उनके पास किसी बड़े का होना जरूरी है।
इसके अलावा खाना खाते समय और सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल पूरी तरह बंद रखें। हां, सिर्फ हर बात पर रोक लगाना भी कोई उपाय नहीं है। उनके स्क्रीन टाइम का एक तय समय और जगह निर्धारित करें। यह भी तय करें कि उस दौरान किस तरह का कंटेंट देखा जा सकता है।
काम आएंगे ये अभ्यास
स्कूल से आने के बाद और शाम को खेलने जाने के बीच का समय बच्चे फोन या टीवी में ही बिताते हैं। ऐसे में बच्चों को दिमाग शांत करने का समय ही नहीं मिल पाता। इसलिए इस समय का एक सही और तय रूटीन बच्चों की दिमागी एकाग्रता को दोबारा बहाल करने में मदद करता है। स्कूल से आने के बाद और खेलने जाने से पहले की गतिविधियों को थोड़ा धीमा करें।
इस दौरान बोर्ड गेम्स, ड्राइंग, पजल्स या बस थोड़ी देर आंखें बंद करके लेटने को कहें। पढ़ाई के तय समय के दौरान घर का माहौल शांत रखें। यदि घर के बाकी लोग बच्चे के सामने टीवी या फोन चलाएंगे, तो बच्चे का मन पढ़ाई से उचट जाएगा।
यदि बच्चे को पढ़ाई में किसी मदद की जरूरत है, तो उनके मन में एआई का उपयोग करके होमवर्क पूरा करने का लालच न आए और उनका ध्यान न भटके।
स्थापित करें डिजिटल हाइजीन'
तकनीक पर पूरी तरह निर्भर होने और उसके सही उपयोग के बीच संतुलन बनाना ही डिजिटल हाइजीन है। बच्चे क्या देख रहे हैं और किसके साथ बैठकर देख रहे हैं, इस पर नजर रखें। बच्चों को केवल हर बात के लिए मना करने से वे भ्रमित या बागी हो जाते हैं। बेहतर होगा कि उन्हें घर के दैनिक कामों में शामिल करें ताकि उन्हें अपनी रुचियों का पता चले और उनका स्क्रीन टाइम स्वाभाविक रूप से घटे। वास्तविक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित करें, यह खेल-कूद, किताब पढ़ना या गार्डनिंग आदि भी हो सकता है।
बना रहे संतुलित तालमेल
आज के समय में बच्चों को गैजेट्स से पूरी तरह दूर रखना व्यावहारिक नहीं है। बच्चों की उम्र के हिसाब से सही तकनीक और टूल्स की जानकारी देना ही सही संतुलन लाता है। माता-पिता स्कूल से संवाद बनाए रखें और समझें कि दिए गए प्रोजेक्ट्स में कितनी तकनीक की जरूरत है और कहां भटकाव की संभावना है।
यदि बच्चे को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग या रिसर्च का काम मिला है, तो स्कूल के साथ मिलकर अपने घर के कम्प्यूटर-लैपटाप व स्मार्टफोन में सुरक्षित ब्राउजिंग और वेबसाइट फिल्टर्स लगाएं। स्कूल द्वारा आयोजित इंटरनेट सेफ्टी और डिजिटल एडिक्शन से जुड़ी कार्यशालाओं में जरूर शामिल हों। यदि आप खुद आइटी या टेक एक्सपर्ट हैं, तो स्कूल के साथ मिलकर अन्य बच्चों को भी जिम्मेदार इंटरनेट उपयोग की जानकारी दें।
साइकोलाजिस्ट गीतिका कपूर, गुरुग्राम
