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    'मेरा बच्चा मेरी हर बात मानता है'- इस बात पर गर्व करने से पहले जान लें इसके छिपे नुकसान

    Updated: Sun, 02 Aug 2026 10:31 AM (IST)

    माता-पिता बच्चों को सिखाएं अपनी सीमाओं को तय करना और सही जगह पर 'ना' कहना ताकि उनमें विकसित हो आत्म-सम्मान और खुद पर भरोसा। ...और पढ़ें

    कहीं आपका बच्चा भी पीपल प्लीजर तो नहीं बन रहा? (Picture Courtesy: Freepik)

    कहीं आपका बच्चा भी पीपल प्लीजर तो नहीं बन रहा? (Picture Courtesy: Freepik)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर समाज में उस बच्चे को 'सबसे अच्छा' माना जाता है जो बड़ों की हर बात बिना कोई सवाल पूछे मान लेता है। माता-पिता भी गर्व से कहते हैं - 'मेरा बच्चा बहुत सीधा है, कभी पलटकर जवाब नहीं देता।'

    लेकिन कभी सोचा है कि हर बात में 'हां' कहने की यह आदत बच्चे के मानसिक और व्यक्तिगत विकास पर क्या असर डाल रही है? जब आप बच्चे को केवल 'अच्छा व्यवहार' करने की सीमा में बांध देते हैं, तो जाने-अनजाने उससे अपने विचार रखने की क्षमता छीन लेते हैं। 

    खो न जाए आवाज 

    जब हम बच्चों को हर बात पर चुपचाप हां कहना सिखाते हैं, तो यह उनकी मानसिक प्रोग्रामिंग का हिस्सा बन जाता है। वे यह मान लेते हैं कि उन्हें अपनी राय रखने या बात कहने का कोई अधिकार नहीं है। जब ऐसे बच्चे बड़े होते हैं और किसी ऐसी परिस्थिति में पहुंचते हैं जहां उन्हें आवाज उठानी चाहिए, तो वे चुप रह जाते हैं। यह पुराना डर और प्रोग्रामिंग उनके स्वभाव में इस तरह बस जाती है कि बड़े होने पर इसे बदलना बेहद मुश्किल हो जाता है। 

    कहीं यह डर तो नहीं 

    एक बच्चा जो वास्तव में सहयोग दे रहा है और एक ऐसा बच्चा जो सिर्फ माता-पिता का प्यार या स्वीकृति खोने के डर से 'हां' कह रहा है- दोनों में बहुत बारीक अंतर होता है। अगर आप बच्चे से किसी काम में मदद मांगें और वह तुरंत अपने मनपसंद खेल या दोस्त के घर जाने का प्लान छोड़कर 'हां' कह दें, तो यह बात मानने की आदत नहीं, बल्कि इस बात का डर भी हो सकता है कि 'ना' कहने पर आप उससे नाराज हो जाएंगे या उसे बुरा बच्चा समझा जाएगा।

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    माता-पिता को घर का माहौल ऐसा बनाना चाहिए, जहां बच्चा बिना किसी डर के अपनी बात रख सके। 'बात काटना' गलत है, लेकिन अपनी बात सही तरीके से रखना बिल्कुल सही है। यदि बच्चा अपनी बात पर बहस करे या तर्क दे (बिना चिल्लाए या जिद किए), तो यह स्वस्थ मानसिकता व सशक्त व्यक्तित्व की निशानी है। इस संवाद में हेल्दी डिबेट का पुट होना जरूरी है।  

    वैलिडेशन न बने संस्कार 

    जब बच्चे में हमेशा दूसरों की स्वीकृति, हर काम के बाद बाहरी तारीफ (लाइक या शाबाशी) पाने की इच्छा रहती है तो वह धीरे-धीरे अपनी इच्छाएं दबाता चला जाता है। इस तरह चूंकि उसे हमेशा दूसरों से निर्देश मिलने की आदत होती है, इसलिए वह जीवन में दिशाहीन महसूस कर सकता है और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता खो देता है। ऐसे बच्चे भविष्य में किसी भी गलत रिश्ते या परिस्थिति में आसानी से फंस सकते हैं, क्योंकि वे हमेशा किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में रहते हैं जो उनकी जिंदगी की कमान संभाल सके। 

    ऐसे पहचाने मानसिक थकान 

    अक्सर माता-पिता यह देखकर खुश होते हैं कि उनका बच्चा हर बात पर 'हां' कह रहा है और सबकी बात मानता है, लेकिन इसके पीछे का सच भावनात्मक थकावट हो सकता है। हर कोई ऐसे बच्चे की पीठ थपथपाता है कि 'कितना अच्छा बच्चा है!', लेकिन अंदर ही अंदर यह स्थिति बच्चे की भावनाओं को दीमक की तरह चाट रही होती है।

    माता-पिता को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि यदि बच्चा बिना किसी भावना या जोश के प्रतिक्रिया दे रहा है या बिना किसी ऊर्जा या उत्साह के बस औपचारिकता निभा रहा है तो इसका मतलब है कि वह इमोशनल बर्नआउट से गुजर रहा है।

    अगर बढ़ चुके हैं कदम 

    यदि जाने-अनजाने में आपका बच्चा दूसरों को खुश करने की आदत का शिकार हो चुका है और उसका आत्मविश्वास कम हो गया है, तो इसे अकेले सुधारने का दबाव न लें। ऐसी स्थिति में किसी बाल मनोचिकित्सक या काउंसलर से सलाह लेना सबसे समझदारी भरा कदम है। विशेषज्ञ सही दिशा दिखा सकते हैं कि कैसे आप अपने व्यवहार में बदलाव लाकर बच्चे के खोए हुए आत्मविश्वास को वापस ला सकते हैं। 

    ऐसे तय करें सीमाएं

    कई अभिभावकों को लगता है कि अगर बच्चे को 'ना' कहने दिया तो वह विद्रोही हो जाएगा। माता-पिता बच्चों के मार्गदर्शक होते हैं। ऐसे में हेल्दी बाउंड्रीज तय करना और सम्मान बनाए रखना दोनों एक साथ संभव हैं:  

    • बच्चे को भरोसा दिलाएं कि आप उसकी बात सुनने के लिए मौजूद हैं। 
    • बच्चे के सामने यह मानने में कोई बुराई नहीं है कि कभी-कभी मम्मी या पापा भी गलत हो सकते हैं।  
    •  जब बच्चों को यह विश्वास हो जाता है कि अपनी राय व्यक्त करने पर उन्हें डांटा नहीं जाएगा, तो वे अधिक आत्मविश्वासी बनते हैं।  

    बच्चों की हर जिद पर 'हां' कहना भी सही पैरेंटिंग नहीं है। उन्हें यह भी सिखाएं कि दूसरों की बात का सम्मान करते हुए अपनी सीमाओं को कैसे तय करना है। यदि बच्चा कोई चीज मांगता है, तो पहले नियमों को स्पष्ट करें। जैसे- 'पहले खाना खत्म करो, उसके बाद ही हम कुकी या केक देने के बारे में सोचेंगे'। 

    (टीजे सिद्धू, पैरेंटिंग इन्फ्लूएंसर)