जवाब देने की जगह बस एकटक देखना… आखिर क्यों बढ़ रहा है ‘Gen-Z Stare’, जिसे लेकर चिंता में पड़े वैज्ञानिक?
सोशल मीडिया पर वायरल 'Gen-Z Stare' असल जिंदगी में घटती बातचीत का संकेत है।

2005 के बाद से 28% घटी हमारी बातचीत, जानिए क्या है 'Gen-Z Stare' की सच्चाई (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सोचिए, आप एक कैफे में जाते हैं और अपना ऑर्डर देते हैं। मगर काउंटर पर खड़ा यंग एम्प्लाई आपको जवाब देने के बजाय बस एक प्लेन, इमोशनलेस लुक देता है। फिर वह बिना एक भी शब्द बोले साइनबोर्ड की तरफ इशारा कर देता है या कभी-कभी एक 'आई रोल'।
सोशल मीडिया पर आजकल ऐसे वीडियो बहुत वायरल हो रहे हैं, Millennials और Gen-Z के बीच इसी खामोश बातचीत का मजाक उड़ाया जा रहा है। इंटरनेट की दुनिया में बिना कुछ बोले बस घूरने की इस आदत को 'Gen-Z Stare' का नाम दिया गया है।
सिर्फ मजाक नहीं, ये एक कड़वी हकीकत है
भले ही सोशल मीडिया पर लोग इसे देखकर हंस रहे हों, लेकिन यह ट्रेंड एक बहुत बड़ी सच्चाई को सामने ला रहा है। सच तो यह है कि अब हम सभी ने असल जिंदगी में एक-दूसरे से बोलकर बात करना काफी कम कर दिया है। यह सिर्फ हवा-हवाई बात नहीं है, बल्कि रिसर्च भी यही इशारा कर रही है।
विज्ञान भी मान रहा है खामोशी का सच
जुलाई महीने में Perspectives on Psychological Science नाम की मशहूर पत्रिका में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट छापी गई। इस अध्ययन में 2,000 से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था। इस रिसर्च ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में लोग अब असल जिंदगी की बातचीत से दूरी बना रहे हैं।
28 प्रतिशत तक कम हुए हमारे शब्द
रिसर्च के आंकड़े आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे। साल 2005 से लेकर 2019 के बीच, लोगों की आपसी बातचीत में इस्तेमाल होने वाले शब्दों में 28 फीसदी की भारी कमी आई है। अगर इसे आसान भाषा में समझें, तो हर बीतते साल के साथ हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में औसतन 300 शब्द कम बोल रहे हैं। यानी हर साल हमारी बातचीत में से दो-तीन मिनट हमेशा के लिए गायब हो रहे हैं।
नई पीढ़ी की चुप्पी ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की चिंता
बोलचाल की यह कमी सबसे ज्यादा उन युवाओं में देखी जा रही है जिनकी उम्र 25 साल से कम है। नई पीढ़ी का यूं चुप रहना और जोर से शब्दों का उच्चारण न करना अब वैज्ञानिकों को डराने लगा है। विशेषज्ञों को इस बात की गहरी चिंता सता रही है कि अगर हम ऐसे ही कम बोलते रहे, तो लंबे समय में यह खामोशी हमारे दिमाग और सोचने-समझने की क्षमता पर कैसा असर डालेगी।
