परियों का बसेरा और अथाह गहराई… नैनीताल की गुमनाम 'परीताल' झील की कहानी है बेहद रहस्यमयी
उत्तराखंड की परीताल झील की लोककथाएं इसे बेहद रहस्यमयी बनाती हैं।

नैनीताल की रहस्यमयी परीताल झील (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड का नैनीताल बेहद खूबसूरत और मशहूर टूरिस्ट स्पॉट है, इसी झीलों के शहर में एक रहस्यमयी जगह है जिसके बारे में कम लोग जानते हैं। कुमाऊं की वादियों में दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसी यह परीताल नामक झील खूबसूरत होने के साथ-साथ कई रहस्य भी समेटे हुए है। आज भी यह स्थान सदियों पुरानी लोककथाओं के लिए जाना जाता है।
नैनीताल की परीताल झील
नैनीताल में करीब 60 छोटे और बड़े ताल यानी झीलें होने की बात कही जाती है। इनमें आपने भीमताल, राम ताल, लक्ष्मण ताल, सीता ताल और गरुण ताल का नाम तो सुना ही होगा। इन्हीं में से एक है बेहद रहस्यमयी परीताल। बताते चलें कि नैनीताल से 25 किलोमीटर की दूरी पर एक चाफी नामक गांव है, यहीं से 3-4 किलोमीटर के पैदल रास्ते पर परीताल झील है।
इस झील तक पहुंचने का रास्ता थोड़ा एडवेंचर से भरा है क्योंकि इसके रास्ते में चट्टानें और पत्थर पड़ते हैं जिन्हें पार करना किसी चुनौती से कम नहीं।
क्या है लोककथा?
इस जगह को लेकर ऐसी लोककथाएं प्रचलित हैं कि यहां देव परियां आया करती हैं। कहते हैं कि हर पूर्णिमा की रात जब चांद की रोशनी पूरी होती है तो परियां इस झील में नहाने आती हैं। इसी वजह से झील का नाम भी परीताल पड़ा। इस मान्यता को लेकर स्थानीय लोगों में विश्वास इतना ज्यादा है कि पूर्णिमा के समय लोग इस ताल में आने और डुबकी लगाने से सख्त परहेज करते हैं।
लोगों का यह भी कहना है कि स्थानीय लोगों ने इस ताल से पारियों को निकलते भी देखा है। इतना ही नहीं, यह ताल भले ही पुरानी है लेकिन इसकी गहराई का आज तक पता नहीं चल पाया है। इसके आसपास मौजूद काली चट्टानों को शिलाजीत की चट्टानें माना जाता है।
यहां तक कैसे पहुंचे?
अगर आप रोमांच के शौकीन हैं और इस रहस्यमयी जगह जाने का मन बना रहे हैं तो सबसे पहले नैनीताल तक पहुंचना होगा। दिल्ली से नैनीताल तक आएं, फिर भीमताल-पदमपुरी मार्ग से होते हुए खुटानी से मुक्तेश्वर की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित चाफी गांव तक पहुंचें। रहने का ठिकाना यहीं कहीं आसपास देखने के बाद गांव से करीब 3 किलोमीटर की पैदल ट्रेकिंग कर कलशा नदी को पार करके इस ताल तक पहुंचा जा सकता है।
