इस राज्य में 7 लाख बुजुर्गों ने दी साक्षरता परीक्षा; 60 से 70 वर्ष के बुजुर्ग बने छात्र; पोते-बेटे लेकर पहुंचे एग्जाम सेंटर
महाराष्ट्र में 'उल्लास' कार्यक्रम के तहत 7 लाख बुजुर्गों ने साक्षरता परीक्षा दी, जिसमें 60-70 वर्ष के शिक्षार्थी शामिल थे। ...और पढ़ें

HighLights
महाराष्ट्र में आयोजित हुई साक्षरता परीक्षा FLNAT
60 से 70 साल के बुजुर्ग हाथ में पेन थामकर बने स्टूडेंट।
एजुकेशन डेस्क, नई दिल्ली। महाराष्ट्र में रविवार को बुजुर्गों के लिए साक्षरता परीक्षा का आयोजन किया गया जिसमें 7 लाख बुजुर्गों ने भाग लिया। 'न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम' के तहत 'उल्लास' (ULLAS - Understanding of Lifelong Learning for All in Society) नाम से इस परीक्षा का आयोजन किया गया। इन सभी बुजुर्गों ने परीक्षा को 'दूसरे मौकों के जश्न' यानी कि Second Chance में बदल दिया।
पोते ने सिखाई बुनियादी चीजें, सेंटर पर भी लेकर गए
कोल्हापुर की रहने वाली मंगल बबन माने की आयु 65 वर्ष हो गई है। उनका सपना सरकारी अधिकारी बनने का था। लेकिन गरीबी और परिस्थितियों के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई। दशकों बाद, उन्होंने बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता मूल्यांकन परीक्षा (Foundational Literacy and Numeracy Assessment Test - FLNAT) दी। सबसे बड़ी बात यह कि उनको आगे की शिक्षा किसी शिक्षक ने नहीं बल्कि उनके पोते ने दी।
माने ने कहा, "मेरे पोते ने मुझे मराठी अक्षर सिखाए और शब्द सीखने में मेरी मदद की। उसने मुझे 1 से 100 तक गिनती भी सिखाई। अब मैं बुनियादी जोड़-घटाव कर सकती हूं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं अब अपना नाम खुद लिख सकती हूं।"
साइंस ग्रेजुएट शशांक बोरसे 68 वर्षीय दादा को लेकर गए परीक्षा सेंटर
महाराष्ट्र के नासिक में साइंस ग्रेजुएट शशांक बोरसे अपने 68 वर्षीय दादाजी को गर्व से परीक्षा केंद्र तक लेकर आए। इन बुजुर्ग दादाजी ने अपना पूरा जीवन खेतों में बिता दिया ताकि आने वाली पीढ़ियां पढ़ाई कर सकें। रविवार को छात्र बनने की बारी उनकी अपनी थी।
दोनों की कहानियों ने मिलकर पूरे राज्य में चलाए गए इस अभियान की भावना को दर्शाया। कार्यक्रम के जरिए लगभग 7 लाख बुजुर्ग शिक्षार्थियों ने FLNAT परीक्षा दी।
इसके अलावा महाराष्ट्र सतारा की रहने वाली विमल कानू जो कि अब 60 वर्ष की हो गई हैं, उनके लिए पिछले साल असफल होने के बाद यह परीक्षा एक दूसरा मौका थी। उन्होंने कहा, "पहले मैं अंगूठा लगाती थी। अब मैं अपना हस्ताक्षर (साइन) खुद करती हूं।"
