सात राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए विपक्ष की क्या है रणनीति? भाजपा ने बदली सियासी पिच
विपक्ष पेपर लीक जैसे मुद्दों से हटकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मैदान में भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है। राम मंदिर चढ़ावा चोरी, वंदे मातरम और मनु स्मृति जैसे विषयों पर दोनों पक्षों के बीच अगले साल के सात राज्यों के चुनावों में रणनीतिक कौशल की परीक्षा होगी।
-1787579404806_m.webp)
भाजपा और विपक्ष की रणनीति।
HighLights
विपक्ष सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दों पर भाजपा को घेरने की कोशिश में।
राम मंदिर, वंदे मातरम, मनु स्मृति जैसे मुद्दे चुनावी केंद्र में।
सात राज्यों के चुनावों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर रणनीतिक कौशल की परीक्षा।
जितेंद्र शर्मा, नई दिल्ली। पेपर लीक के मुद्दे पर भाजपा को बैकफुट पर धकेलने का प्रयास करते-करते विपक्ष मुकाबले के उस मैदान तक पहुंच गया, जहां पैर जमाना भाजपा के लिए अब तक आसान ही रहा है। राम मंदिर चढ़ावा चोरी की अधिक चर्चा निश्चित ही भगवा खेमे के माथे पर बल डाल सकती है।
हालांकि, जिस तरह से कांग्रेस ने वंदे मातरम और महिलाओं के अधिकारों के सहारे मनु स्मृति को लेकर अपना रुख दिखाया है, उसने उन आसार को मजबूत कर दिया है कि अगले वर्ष होने जा रहे सात राज्यों के चुनावों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच रणनीतिक कौशल की परीक्षा हो सकती है।
समझिए क्या है विपक्ष की योजना?
इन विषयों को उठाए जाने के पीछे विपक्षी रणनीतिकारों का ध्येय भाजपा को उसी के अस्त्रों से हराने का प्रयास हो सकता है, जबकि सत्ता पक्ष के तेवर संदेश दे रहे हैं कि ये उसके लिए मुफीद पिच है, जिस पर वह आसानी से विपक्ष को मुस्लिम तुष्टिकरण के कठघरे में खड़ा कर सकता है।
अगले साल इन राज्यों में होने है चुनाव
अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं। राजनीतिक दलों की सक्रियता दिखा रही है कि उन्होंने चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। छात्र आंदोलन के विषय पर विपक्ष ने सरकार को घेरने का प्रयास किया और संसद नहीं चलने दी।
विपक्ष ने शुरू की ऐसी तैयारी
उधर, समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के साथ राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण को प्राथमिकता में रखकर खास तौर पर उत्तर प्रदेश में भाजपा उसके ही पुराने एजेंडे पर पस्त करने की रणनीति बुनना शुरू की। इससे उत्साहित विपक्ष धीरे-धीरे भाजपा की ही पुरानी पिच पर आ खड़ा हुआ। सत्ताधारी दल को सबसे बड़ा मौका वंदे मातरम के सहारे मिल गया।
संसद में कानून पारित होने के बाद स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम का पूर्ण गायन रोकने का विषय जब भाजपा ने उठाया तो पहले कांग्रेस नेताओं ने इसे खारिज करने का प्रयास किया, फिर रणनीतिकारों ने संभवत: इस मुद्दे में अपने लिए चुनावी लाभ की गुंजाइश देखी और कांग्रेस कार्यसमिति में एलान कर दिया कि कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में दो पद ही गाएगी।
तो यहां से मिला भाजपा को मौका
यहां से भाजपा को आक्रामकता के साथ कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाने का मजबूत मौका मिल गया। इसी तरह नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुणे में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम में जिस तरह से महिला अधिकारों की बात करते हुए मनु स्मृति को निशाने पर लिया, वहां से भी कांग्रेस पर सांप्रदायिक भेदभाव के आरोप मढ़े जाने लगे।
उधर, समाजवादी पार्टी राम मंदिर चढ़ावा चोरी को प्राथमिक मुद्दा बनाए हुए है। उस पर भाजपा की ओर से याद दिलाया जा रहा है कि अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां सपा सरकार ने ही चलवाई थीं। इंटरनेट मीडिया पर अचानक बढ़ी भाजपा नेताओं की सक्रियता इशारा कर रही है कि इन विषयों पर विपक्ष को घेरना उसके लिए कहीं आसान है।
'भारतीय जनमानस के लिए विकास और विरासत दोनों जरूरी'
दिल्ली विश्वविद्यालय के सीनियर प्रोफेसर और सामाजिक-राजनीतिक चिंतक प्रो. निरंजन कुमार कहते हैं कि भारतीय जनमानस के लिए विकास और विरासत दोनों महत्वपूर्ण हैं।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इन मुद्दों पर विपक्ष की इस तरह की प्रतिक्रिया को मुस्लिम तुष्टिकरण के रूप में जनता के बीच स्थापित करने में भाजपा को अधिक परेशानी नहीं होगी, जिसकी परिणति ध्रुवीकरण के रूप में सामने आएगी तो भाजपा को लाभ मिलना स्वाभाविक है। ऐसा पिछले कई चुनावों में देखने को मिला भी है।
वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. स्मिता अग्रवाल का मानना है कि यह सिर्फ भावनात्मक मुद्दे हैं, इनका चुनाव पर बहुत असर नहीं पड़ेगा। ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता में रखने को वह विपक्ष की कमजोरी मानती हैं। कहती हैं कि देश का युवा आर्थिक प्रगति, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर बात करना चाहता है, लेकिन सरकार को विपक्ष के मुद्दे पसंद आएंगे।
