विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

CEC ज्ञानेश कुमार के पास इम्युनिटी का बूस्टर, क्यों नहीं हो सकती गिरफ्तारी? Inside Story

Published: Fri, 25 Sep 2026 10:20 PM (IST)Updated: Sat, 26 Sep 2026 02:12 AM (IST)

राहुल गांधी ने चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए उन्हें सरकारी गवाह बनने की सलाह ...और पढ़ें

2023 का कानून चुनाव आयुक्त को गिरफ्तारी से सुरक्षा देता है। (फोटो-AI जेनरेटेड)

2023 का कानून चुनाव आयुक्त को गिरफ्तारी से सुरक्षा देता है। (फोटो-AI जेनरेटेड)

HighLights

  1. राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी का आरोप लगाया।

  2. 2023 का कानून चुनाव आयुक्त को गिरफ्तारी से सुरक्षा देता है।

  3. विपक्ष इस कानून की धारा 16 को लगातार चुनौती दे रहा है।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी का आरोप लगाया है। राहुल गांधी ने चेतावनी देते हुए कहा, समय आएगा, तब हम आपको पकड़ लेंगे। इसके बाद उन्होंने ज्ञानेश कुमार को सलाह देते हुए कथित हेरफेर मामले में सरकारी गवाह बनने की नसीहत दी।

राहुल गांधी ने पहले भी दी थी चेतावनी

राहुल गांधी ने पिछले साल ही तीन सदस्यीय चुनाव आयोग को चेतावनी दी थी। राहुल की चेतावनी के 9 महीने बाद द इंडियन एक्स्प्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के अंदर असहमति का खुलासा हुआ है। जिसके बाद विपक्ष अब अपनी बात सही होने का दावा कर रहा है और ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है। लेकिन गिरफ्तारी की मांग के बीच एक कानूनी प्रावधान दीवार बनकर सामने आ गया है।

गिरफ्तारी के बीच कानूनी प्रावधान बना दीवार

ज्ञानेश कुमार की लगातार हो रही गिरफ्तारी की मांग के बीच अब एक ऐसा प्रावधान सामने आया है जो विपक्ष की मांगों को सिरे से खारिज कर सकता है और ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी के सामने दीवार बनकर खड़ा हो सकता है।

2023 में पारित हुए चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स एक्ट की धारा 16 कहती है कि कोई भी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ उनकी सरकारी ड्यूटी के दौरान किए गए किसी काम के लिए सिविल या क्रिमिनल केस कार्रवाई शुरू या जारी नहीं की जा सकती है

इस एक्ट में साफ तौर पर लिखा है,'भले ही उस समय लागू किसी कानून में कुछ भी कहा गया हो, लेकिन कोई भी अदालत किसी मुख्य चुनाव आयुक्त, चुनाव आयुक्त या पूर्व चुनाव आयुक्त के उस फैसले पर कार्यवाही नहीं कर सकती है जो उसने अपने पद पर रहते हुए लिया हो।'

यह सुरक्षा उस कानून के तहत मिली जिसके जरिए आयुक्तों को चुनने के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। 2023 से पहले चयन की कोई खास प्रक्रिया नहीं थी क्योंकि इससे पहले कोई कानून नहीं बना था। कानून बनने से पहले राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर नियुक्तियां करते थे, जिसमें न्यायपालिका या विपक्ष की कोई भूमिका नहीं होती थी।

कब बना था कानून और क्या है प्रावधान

यह कानून मार्च 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बना था। फैसले में संसद द्वारा कानून बनाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायधीश की एक अंतरिम चयन समिति बनाई गई थी।

उसी साल बाद में बने कानून में CJI को इस चयन समिति से हटा दिया गया और समिति में एक मंत्री को शामिल कर लिया था।

सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस कानून पर हाल ही में हुई सुनवाई में कहा कि इसका मतलब है, 'न्यूट्रल सेलेक्टर अब नहीं रहा।'

असल में उस कमेटी में पीएम और चुने हुए मंत्री मिलकर तीसरे सदस्य लोकसभा में विपक्ष के नेता पर भारी पड़ते हैं। इसका मतलब है कि फैसला बहुमत के आधार पर होता है। राहुल गांधी भी इसे लेकर विरोध दर्ज करा चुके हैं। 

वहीं अगर कमिश्नरों को मिली छूट के प्रावधान की बात करें, तो अगस्त 2023 में जब बिल पेश हुआ था, तब उसमें यह शामिल नहीं था। इसे चार महीने बाद जोड़ा गया और विपक्ष के वॉकआउट और हंगामे के बाद भी यह कानून पास हो गया।

क्या इस कानून में कोई कमी है?

चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स एक्ट 2023 के तहत यह छूट सिर्फ ड्यूटी के दौरान किए गए कामों पर ही लागू होती है। सुप्रीम कोर्ट में वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि वोटर लिस्ट में किसी भी तरह की छेड़छाड़ चुनाव आयुक्त के काम के दायरे में नहीं आती।

इसमें याचिका में कहा गया है, 'मुख्य चुनाव आयुक्त को आपराधिक मुकदमे से कोई व्यक्तिगत छूट नहीं मिलती है' और मांग की है कि ज्ञानेश कुमार की जांच हो और उन पर भी अन्य आरोपी की तरह मुकदमा चलाया जाए।

इसमें 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 32 और रिकॉर्ड में हेरफेर से जुड़े 'भारतीय न्याय संहिता' के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाने की मांग की गई है। याचिका में यह भी बताया गया है कि संविधान सिर्फ राष्ट्रपति और राज्यपालों को ही पूरी छूट देता है।

तीन साल बाद गरमाया मामला

हालांकि कुछ मुद्दे अब गंभीर रूप ले चुके हैं, लेकिन विपक्ष 2023 के कानून और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर पहले से ही आवाज उठाता रहा है। दिसंबर 2025 में एक भाषण के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि सत्ता में आने पर कांग्रेस इस कानून को पिछली तारीख से बदल देगी।

उन्होंने इस प्रावधान को "इम्युनिटी का तोहफा" बताया, जो इससे पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं दिया था। इम्युनिटी का यह कवच मिलने के बाद से ही पूर्व आयुक्तों की राय बंटी हुई है। जहां कुछ लोगों ने राजनीतिक मंशा से दर्ज मामलों से सुरक्षा के तौर पर इसका स्वागत किया, वहीं 2019 में आयोग से इस्तीफा देने वाले अशोक लवासा ने इसे "पूरी तरह हैरान करने वाला" बताया।

अमित शाह ने संसद में दिया था जवाब

गृह मंत्री अमित शाह ने 10 दिसंबर, 2025 को संसद में बहस का जवाब देते हुए कहा, 'हमने सिर्फ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के प्रावधानों को दोहराया है। RPA की धारा 32 और RPA 1951 की धारा 146C के तहत संशोधन में कहा गया है कि चुनाव आयोग का कोई भी अधिकारी, जिसमें चुनाव आयुक्त भी शामिल हैं, चुनाव प्रक्रिया से जुड़े किसी भी मामले में मुकदमे का सामना नहीं करेगा।'

राहुल गांधी ने अमित शाह के इस तर्क को बेतुका बता दिया था।

दिसंबर 2025 में ही राहुल गांधी ने रामलीला मैदान में एक रैली के दौरान तीनों चुनाव आयुक्तों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी थी।

ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बनने की नसीहत

अब दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां सामने आने के बाद राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बनने की नसीहत दी और कहा, 'बीजेपी के नेतृत्व वाली NDA सरकार में जिसने भी वोटर लिस्ट से हेर-फेर की है उसके खिलाफ गवाही दे दें।'

हालांकि राहुल गांधी के इस बयान पर बीजेपी ने पलटवार किया और किसी भी तरह की हेर-फेर से इनकार करते हुए कहा, 'कांग्रेस बार-बार मिल रही हार को पचा नहीं पा रही है।'

ज्ञानेश कुमार को हटाने की पहले भी की कोशिश

विपक्ष इससे पहले भी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए कई दूसरे तरीके आजमा चुकी है। जैसे कि जजों के मामले में होने वाली महाभियोग की प्रक्रिया। हालांकि, अप्रैल में राज्यसभा के चेयरमैन सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने इस तरह के कदम के के लिए लाए गए प्रस्ताव के नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

जनवरी से सुप्रीम कोर्ट NGO 'लोक प्रहरी' द्वारा धारा 16 को चुनौती देने वाली एक अलग याचिका पर सुनवाई कर रहा है लेकिन अब तक उसने इस प्रावधान पर रोक लगाने से इनकार किया है। 

हाल ही में 23 सितंबर को, इसी मामले से जुड़े एक घटनाक्रम में, दो जजों की बेंच का बंटा हुआ फैसला आने के बाद 2023 के कानून को लेकर चल रही बड़ी कानूनी लड़ाई को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया।

कई विपक्षी पार्टी ने राहुल का किया समर्थन

राहुल गांधी के अलावा, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, AAP के अरविंद केजरीवाल और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी उन प्रमुख नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने 'बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए' वोटर लिस्ट में हेरफेर का आरोप लगाया है।

विपक्ष का कहना है कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR प्रक्रिया के तहत अब तक 13 करोड़ से ज्यादा वोटरों के नाम हटाए जा चुके हैं, जो भारत के कुल वोटरों का लगभग 13 प्रतिशत है।

दिल्ली में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा रहा है, जहां SIR से पहले के हर तीन वोटरों में से एक को ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर कर दिया गया, और बाकी बचे लोगों में से एक-तिहाई को 'विसंगतियों' के लिए नोटिस मिले हैं। वहीं कॉकरोच जनता पार्टी भी अब इस मांग में शामिल हो गई है।

यह भी पढ़ें- IAS-IPS से भरा है CEC ज्ञानेश कुमार का परिवार, बेटी-बेटा और दामाद क्या करते हैं?