चिराग पासवान का UP चुनाव वाला दांव, अपनों के ही खिलाफ क्यों ताल ठोक रहे मोदी के 'हनुमान'?
चिराग पासवान ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सभी 403 सीटों पर लड़ने की घोषणा की है, जिसका ...और पढ़ें

UP चुनाव में चिराग पासवान का 403 सीटों वाला दांव

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चिराग पासवान ने कभी खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताकर राजनीति में अपनी निष्ठा की नई परिभाषा गढ़ी थी। लेकिन छह साल बाद, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख उसी राजनीति का एक नया पहलू सामने रख रहे हैं।
हाल ही में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, मैं अपनी सरकार के खिलाफ भी खड़ा हो सकता हूं, मैं गठबंधन का हिस्सा तो हूं...लेकिन मैं बीजेपी नहीं हूं।
यूपी चुनाव में उतरने की घोषणा
एनडीए में शामिल होने के बावजूद अपने वैचारिक और रणनीतिक अस्तित्व को अलग बनाए रखने का यह नया तेवर अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में उतरने जा रहा है। एलजेपी ने घोषणा की है कि वह 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ेगी और सभी 403 सीटों पर सांगठनिक तैयारी शुरू कर चुकी है।
भले ही अभी यह तय नहीं है कि पार्टी अकेले चुनावी मैदान में उतरेगी या किसी गठबंधन का हिस्सा बनकर, लेकिन चिराग पासवान के इस कदम ने हिंदी पट्टी के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप में अहम राज्य में नई हलचल पैदा कर दी है।
मोदी के हनुमान क्यों दिखा रहे ताकत?
चिराग पासवान का बिहार से बाहर निकलकर उत्तर प्रदेश की 403 सीटों पर दावेदारी करना सिर्फ चुनावी घोषणा नहीं है, बल्कि एनडीए के अंदर अपनी मोलभाव करने की क्षमता को बढ़ाना और एक राष्ट्रीय नेता के रूप में खुद को स्थापित करना है।
2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 5 में से 5 सीटें जीतकर 100 प्रतिशत स्ट्राइक रेट दर्ज करने वाले चिराग अब बिहार के 19 विधायकों और केंद्रीय कैबिनेट पद के दम पर केंद्र में एक अहम शक्ति हैं। यूपी में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराकर वे यह संदेश देना चाहते हैं कि एलजेपी सिर्फ बिहार तक सीमित क्षेत्रीय दल नहीं है।
नागालैंड विधानसभा चुनाव में 2 सीटें जीतकर 8.6 प्रतिशत वोट हासिल करने के बाद, यूपी जैसे बड़े राज्य में सांगठनिक विस्तार और उनके राष्ट्रीय विस्तार की रूपरेखा के लिए बड़ा पड़ाव है।
क्या है वोट बैंक का गणित?
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का जनाधार लगातार खिसक रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा को केवल 9.4 प्रतिशत वोट मिले और कोई सीट हासिल नहीं हुई। बहुजन राजनीति में पैदा हुए इस खालीपन को चिराग पासवान एक बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं।
हालांकि, यूपी का दलित समीकरण बिहार से अलग है, जहां पासी, वाल्मीकि और खटीक जैसे गैर-जाटव समुदायों का अपना अलग इतिहास है, लेकिन चिराग अपने युवा और आधुनिक अक्स के जरिए इस असंतुष्ट वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रयागराज में आयोजित उनके 'यूथ बोले तो' अभियान को मिला जनसमर्थन इसी रणनीति का हिस्सा है, जहां उन्होंने युवाओं के लिए परीक्षाओं के रद होने पर यात्रा खर्च और रहने के रिइम्बर्समेंट को कानूनी अधिकार बनाने की मांग उठाई।
गठबंधन सहयोगी बनाम 'वोट-कटवा' मॉडल
अगर बीजेपी 2027 के चुनाव में एलजेपी को सम्मानजनक सीटें नहीं देती है, तो चिराग 2020 का बिहार मॉडल यूपी में दोहरा सकते हैं। उत्तर प्रदेश में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच बेहद सीधा और कड़ा मुकाबला होता है, जहां कुछ हजार वोटों का अंतर भी सीट का फैसला कर देता है।
अगर एलजेपी अकेले 403 सीटों पर प्रत्याशी उतारती है, तो वह गैर-जाटव दलित और युवाओं के वोटों को काटकर नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखेगी।
पार्टी की पहचान बचाने के रणनीति
चिराग पासवान जानते हैं कि एनडीए में रहकर भी अगर अपनी बात मुखरता से नहीं रखी गई, तो पार्टी की स्वतंत्र पहचान खत्म हो सकती है। यही वजह है कि चिराग पासवान केंद्रीय मंत्री होते हुए भी वे बिहार में अपराध की घटनाओं का बेबाक बोलते हैं।
हाल ही में उन्होंने कहा था कि मुझे शर्म आती है कि जब मैं सोचता हूं कि मैं ऐसी सरकार का हिस्सा हूं जिसके तहत ऐसी घटनाएं हो रही हैं। अपराधियों में कानून का डर होना चाहिए। इसी तरह, एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका पर भी वे बिना झिझक अपनी राय रखते हैं।
चिराग पासवान का यूपी दांव केवल सीटें जीतने तक सीमित नहीं है। यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या वे बिहार से बाहर अपना जनाधार बढ़ा सकते हैं। मोदी के हनुमान की छवि से बाहर निकलकर, चिराग पासवान खुद को एनडीए के भीतर एक ताकत के रूप में पेश कर रहे हैं।
