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चोल वंश का वो शासक जिसने इंडोनेशिया में भेजी थी नौसेना; पूरी कहानी

Published: Thu, 24 Sep 2026 07:30 PM (IST)

राजेंद्र चोल ने चोल साम्राज्य को दक्षिण भारत से बंगाल तक फैलाया और श्रीलंका व मालदीव पर भी विजय प्राप्त की।

चोल साम्राज्य की कहानी (जागरण ग्राफिक्स)

चोल साम्राज्य की कहानी (जागरण ग्राफिक्स)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। इतिहास के पन्नो में चोल साम्राज्य का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इतिहासकारों के मुताबिक चोल वंश एक ऐसा राजवंश था जिसका साम्राज्य इंडोनेशिया तक फैला था।

लगभग वर्ष 850 के आसपास दक्षिण भारत में पांड्यों और पल्लवों के बीच चल रहे संघर्ष का लाभ उठाकर एक अज्ञात राजा विजयालय ने तंजावुर (तंजौर) पर कब्जा कर लिया।

इसी के साथ चोल राजवंश की नींव पड़ी। सन 907 में चोल वंश के राजा पारांतक प्रथम गद्दी पर बैठे। उन्होंने 48 वर्षों तक शासन किया, परंतु बाद के कमजोर चोल राजाओं के कारण चोल वंश का पतन होता चला गया।

कैसे हुआ चोल वंश का उदय?

सन 985 में जब राजराजा चोल प्रथम ने गद्दी संभाली, तब चोल वंश का पुनरुत्थान आरंभ हुआ। राजराजा चोल प्रथम और उनके पुत्र राजेंद्र चोल के नेतृत्व में चोल साम्राज्य एशिया की एक प्रमुख सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक शक्ति बन गया। एक समय ऐसा आया जब उनका साम्राज्य दक्षिण में मालदीव से लेकर उत्तर में बंगाल की गंगा नदी के तट तक फैला हुआ था।

रिचर्ड ईटन ने अपनी किताब इंडिया इन द पर्शियनेट एज में लिखा है, 'चोलों को ‘तंजावुर के महान चोल’ कहा जाने लगा। दक्षिण के पूरे तट पर उनके कंट्रोल को आज भी ‘कोरोमंडल’ के नाम से याद किया जाता है। ‘कोरोमंडल’ शब्द ‘चोलमंडल’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है - चोल साम्राज्य का क्षेत्र।'

श्रीविजय राज्य से दुश्मनी कैसे हुई?

ग्यारहवीं शताब्दी तक खमेर और चोल व्यापारियों का बंगाल की खाड़ी से सटे राज्यों की अर्थव्यवस्था पर काफी हद तक कंट्रोल हो चुका था। चोल और खमेर दोनों को यह अहसास हो गया था कि उनके हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

उसी काल में खमेर साम्राज्य भी बहुत विशाल और प्रभावशाली हो चुका था। मौजूदा कंबोडिया, थाईलैंड और वियतनाम के कई क्षेत्रों पर उनका शासन था। कंबोडिया का प्रसिद्ध अंगकोरवाट मंदिर भी इन्हीं खमेर राजाओं ने बनवाया था।

वाई सुब्बायारालु अपनी किताब 'साउथ इंडिया अंडर द चोलाज' में लिखते हैं, 'कई शिलालेखों में चोल और खमेर के बीच मित्रतापूर्ण संबंधों मिलते हैं। दोनों राज्यों को चीन की बढ़ती जनसंख्या और विलासिता की वस्तुओं में उसकी रुचि से भारी व्यापारिक लाभ हुआ था।' दोनों का एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था- श्रीविजय राज्य।

श्रीविजय के राजा बौद्ध थे और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर उनका कंट्रोल था। वे चीन की ओर जाने वाले सभी जहाजों पर कर वसूलते थे। जो जहाज कर नहीं देते थे, उन पर श्रीविजय की नौसेना हमला करके उन्हें नष्ट कर देती थी।

कैसे हुई श्रीविजय की हार?

श्रीविजय के राजाओं की कूटनीति ने चोल वंश के राजा को नाराज कर दिया था। श्रीविजय के राजा चोल शासकों को मित्रतापूर्ण संदेश भेजते थे, पर साथ ही मौजूदा तमिलनाडु के नागपट्टिनम बंदरगाह में बौद्ध मठ बनवाने के लिए धन भी भेज रहे थे। दूसरी ओर, वे चीनी राजाओं से यह कह रहे थे कि चोल छोटे राजा हैं और उनके कंट्रोल में हैं।

चोल राजा राजेंद्र चोल ने सन 1015 में चीन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए। तब उन्हें श्रीविजय की इस दोहरी नीति का पता चला। इसके बाद उन्होंने वहां के राजा विजयतुंगवर्मन को अपनी सैन्य शक्ति दिखाने का निर्णय लिया।

सन 1017 की लड़ाई में राजेंद्र चोल की जीत हुई और उन्होंने विजयतुंगवर्मन को बंदी बना लिया। बाद में विजयतुंगवर्मन ने अपनी बेटी का विवाह राजेंद्र चोल से करके उनकी अधीनता स्वीकार कर ली।

क्यों कुख्यात था राजवंश

राजेंद्र चोल पूरे एशिया में एक बड़ी ताकत बन चुके थे। अपनी सैन्य जीतों के दौरान हिंसा का सहारा लेने के कारण वे कुख्यात हो गए थे। उनके दुश्मनों ने उन पर युद्ध के नियमों को तोड़ने का आरोप लगाया।

चालुक्यों का कहना था कि उन्होंने युद्ध के दौरान पूरे राज्य को तबाह कर दिया था और 'ब्राह्मणों और महिलाओं की हत्या तक से भी नहीं हिचके थे।'

अनिरुद्ध कणिसेट्टी अपनी पुस्तक लॉर्ड्स ऑफ द डेकन, सदर्न इंडिया फ़्रॉम चालुक्याज टू चोलाज में लिखते हैं, 'श्रीलंका के इतिहास में भी दर्ज है कि राजेंद्र चोल के सैनिकों ने उनके साथ बहुत क्रूरता की।

उन्होंने राजसी परिवार की महिलाओं का अपहरण कर लिया था और अनुराधापुरम के शाही खजानों को लूट लिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने बौद्ध मठों में स्तूपों को तोड़कर वहां रखे खजानों पर कब्जा कर लिया था।'

श्रीलंका और मालदीव पर कब्जा?

सन 1014 में राजराजा की मौत के बाद राजेंद्र चोल ने गद्दी संभाली। सबसे पहले उन्होंने अपने पड़ोसियों पांड्यों और चेरों से निपटा। इसके बाद सन 1017 में उन्होंने श्रीलंका पर आक्रमण किया।

उस समय के शिलालेखों से पता चलता है कि हमले का उद्देश्य वहां की सत्ता हथियाना नहीं, बल्कि अधिक-से-अधिक सोना और अन्य कीमती सामन लाना था। फिर भी, इसका परिणाम यह हुआ कि पहली बार पूरे श्रीलंका द्वीप पर चोलों का कंट्रोल हो गया।

एक साल बाद, 1018 में, राजेंद्र चोल ने नौसैनिक अभियान चलाकर मालदीव और लक्षद्वीप पर कब्जा कर लिया और दोनों क्षेत्रों को चोलों का उपनिवेश बना दिया। सन 1019 में उन्होंने उत्तरी कर्नाटक और दक्षिणी महाराष्ट्र में सैन्य अभियान भेजे। सन 1021 में उन्होंने चालुक्य और कल्याण पर विजय प्राप्त की, जिनका उस समय पूरे दक्षिण भारत पर कोन कंट्रोल था।

कैसे पड़ा गंगईकोंड चोलपुरम नाम?

सन 1022 में राजेंद्र चोल अपना साम्राज्य लगभग 1000 मील दूर गंगा के किनारे और उससे आगे तक ले गए। रास्ते में उन्होंने ओडिशा और बंगाल के शक्तिशाली पाल वंश के राजा महिपाल को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए मजबूर किया।

रिचर्ड ईटन लिखते हैं, 'राजेंद्र बंगाल से काफी कीमती आभूषण, उनकी पवित्र देवताओं की मूर्तियां और पीपों में गंगा का पवित्र पानी लेकर अपने राज्य वापस लौटे।

इस उपलब्धि की याद में उन्होंने ‘गंगईकोंड’ की उपाधि धारण की। उन्होंने ‘गंगईकोंड चोलपुरम’ को अपनी नई राजधानी बनाया। गंगईकोंड का अर्थ होता है- गंगा को जीतने वाला।

जानी-मानी इतिहासकार रोमिला थापर अपनी किताब अर्ली इंडिया में लिखती हैं, 'विजय के बाद गंगा का पानी दक्षिण ले जाना उत्तर पर दक्षिण की जीत का प्रतीक था।

इंडोनेशिया तक फैला साम्राज्य

राजेंद्र ने अपनी नई राजधानी में शिव को समर्पित एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जो 250 वर्षों से अधिक समय तक शैव भक्ति और चोल वास्तुकला का प्रतीक बना रहा।

उन्होंने राजधानी में एक विशाल कृत्रिम झील भी बनवाई, जिसकी लंबाई 16 मील और चौड़ाई तीन मील थी। इसी झील में बंगाल से लाया गया गंगा का पानी डाला गया।

हालांकि राजेंद्र बहुत दिनों तक उत्तर पर अपना नियंत्रण बरकरार नहीं रख सके। मालदीव और श्रीलंका में विजय अभियान के बाद राजेंद्र बहुत उत्साहित थे।

वे एक और बड़े विदेशी अभियान की योजना बनाने में जुट गए। इस बार उन्होंने इंडोनेशिया के सुमात्रा तक अपनी नौसेना भेजने का अभूतपूर्व निर्णय लिया।

नौसेना की श्रीविजय पर एक और जीत

इससे पहले सन 1017 में राजेंद्र चोल और श्रीविजय के राजा के बीच भिड़ंत हो चुकी थी, जिसमें राजेंद्र की नौसेना विजयी रही थी। इसका जिक्र मलेशिया के नगर कटाह के एक शिलालेख में मिलता है, जिसमें राजेंद्र को ‘कटाह का विजेता’ कहा गया है।

लेकिन सन 1025 में राजेंद्र चोल ने श्रीविजय से लड़ने के लिए अपनी पूरी नौसेना भेज दी। पॉल मुनोज ने अपनी पुस्तक अर्ली किंगडम्स में लिखा है, 'इस अभियान में जीत के बाद जिस समझौते पर हस्ताक्षर हुए, उसी के अंतर्गत अंगकोर के राजा सूर्यवर्मन ने राजेंद्र चोल को कीमती उपहार भेंट किए।

राजेंद्र चोल ने इस अभियान के लिए बहुत बड़ा नौसैनिक दल भेजा था, जो चोलों के मुख्य बंदरगाह नागपट्टिनम में एकत्रित हुआ था।'

विलियम डेलरिंपल अपनी पुस्तक द गोल्डन रोड में लिखते हैं, “इस अभियान के लिए सैनिकों और यहाँ तक कि हाथियों को भी जहाजों में लादा गया था। चोलों ने श्रीलंका के एक बंदरगाह से अपने अभियान की शुरुआत की थी।

कई दिनों की समुद्री यात्रा के बाद उन्होंने सुमात्रा, थाईलैंड के बंदरगाह टकुआ पाह और मलेशिया में केदाह पर अचानक हमला बोल दिया। यह किसी भी दक्षिण एशियाई राज्य का अपने देश से बाहर सबसे लंबी दूरी का सैन्य अभियान था।'

राजेन्द्र चोल के अभिलेख

इस अत्यंत महत्वाकांक्षी और सफल अभियान के बाद राजेंद्र का प्रभाव पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में फैल गया। इस विजय से गौरवान्वित होकर राजेंद्र चोल ने सन 1027 में इसका पूरा वर्णन तंजावुर के मंदिर की एक दीवार पर लिखवा दिया।

विजय और संगीता सखूजा अपनी पुस्तक राजेंद्र चोला, फर्स्ट नेवल एक्सपिडिशन टू साउथ-ईस्ट एशिया में लिखते हैं, 'इन अभिलेखों में जिन छह स्थानों का उल्लेख है, उनमें से चार सुमात्रा में, एक मलय प्रायद्वीप में और एक निकोबार द्वीप में हैं।

हो सकता है कि राजेंद्र उस स्थान से भी गुजरे हों, जिसे आज सिंगापुर कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि वहां भी एक शिलालेख मिला है, जिसमें राजेंद्र चोल की कई उपाधियों में से एक का उल्लेख है।'

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