FCRA कानून पर क्यों मचा घमासान? राष्ट्रहित और विपक्ष के डर का पूरा सच जानिए
FCRA Amendment Bill 2026: विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम संशोधन विधेयक, 2026 पर देश में बहस छिड़ी है, जहां सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बताती है।

विदेशी चंदे पर शिकंजा या राजनीति? फोटो- एआई एडिटेड
HighLights
विदेशी फंड के दुरुपयोग रोकने को FCRA संशोधन।
विपक्ष को नागरिक संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण का डर।
लाइसेंस रद्द होने पर संपत्ति अधिग्रहण का नया प्रावधान।
जागरण टीम, नई दिल्ली। भारत में विदेशी फंड/दान लंबे समय से आ रहा है और इसको रेगुलेट करने के लिए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम है। यह अधिनियम तय करता है कि विदेश से आने वाला पैसा किन लोगों या संगठनों को मिल सकता है और इसका इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
1976 में लाए गए कानून को कई बार संशोधन के जरिये सख्त बनाया गया है। हाल में केंद्र सरकार ने एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश किया और बहस के बाद विधेयक को विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेज दिया गया है।
सरकार का कहना है कि संशोधन विधेयक लाने का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी पैसे का उपयोग देशविरोधी और अवैध गतिविधियों में न हो। वहीं कांग्रेस सहित दूसरे विपक्षी दलों का संशोधन के जरिये सरकार को अनियंत्रित अधिकार मिल जाएंगे और इससे सिविल सोसायटी और अल्पसंख्यक संस्थानों को निशाना बनाया जा सकता है।
एफसीआरए विधेयक में प्रस्तावित संशोधन राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक समरसता को बनाए रखने में मदद करेंगे या ये राजनीतिक हथियार हैं इसकी पड़ताल आज प्रासंगिक है...

FCRA अधिनियम में प्रस्तावित प्रमुख बदलाव
नामित प्राधिकरण का गठन
विधेयक में एक नामित प्राधिकरण बनाने का प्रविधान है। जब किसी संस्था का एफसीआरए लाइसेंस रद, सरेंडर या समाप्त होगा, तो उसकी विदेशी धनराशि और उससे बनाई गई संपत्तियों का नियंत्रण इस प्राधिकरण के पास चला जाएगा।
लाइसेंस समाप्ति पर संपत्तियों का अधिग्रहण
यदि कोई संस्था समय पर नवीनीकरण नहीं कराती, नवीनीकरण खारिज हो जाता है या लाइसेंस सरेंडर कर देती है, तो विदेशी धन या उसके आंशिक/पूर्ण सहयोग से बनी संपत्तियां सरकार द्वारा अधिग्रहित कर ली जाएंगी।
पूजा स्थलों के लिए सुरक्षात्मक क्लॉज
यदि अधिग्रहित की गई संपत्ति कोई पूजा स्थल या धार्मिक स्थान है, तो सरकार और प्राधिकरण के लिए उसका धार्मिक स्वरूप बनाए रखना अनिवार्य होगा।
सजा की अवधि में कमी
विधेयक के तहत नियमों के उल्लंघन पर अधिकतम जेल की सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव है।
प्रतिबंध के दायरे का विस्तार
समाचार या करंट अफेयर्स के प्रसारण से जुड़े किसी भी व्यक्ति द्वारा विदेशी अंशदान लेने पर पूर्ण प्रतिबंध को और व्यापक बनाया गया है।

क्या होगा असर
| क्षेत्र / पक्ष | संभावित असर |
| एनजीओ और ट्रस्ट | एफसीआरए नियमों का पालन न करने या नवीनीकरण छूटने पर संस्थाओं की चल-अचल संपत्ति और बैंक फंड जब्त होने का जोखिम बढ़ जाएगा। |
| पारदर्शिता और जवाबदेही | सरकार का मानना है कि इससे विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग पर लगाम लगेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा व पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। |
| अल्पसंख्यक और धर्मार्थ संस्थाएं | विपक्षी दलों और नागरिक समूहों का तर्क है कि इससे विशेष रूप से स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में काम कर रहे अल्पसंख्यक और धर्मार्थ संगठनों पर अत्यधिक प्रशासनिक दबाव बनेगा। |
अपनी मनमर्जी चाहती हैं विदेशी ताकतें
सामरिक मामलों के एक्सपर्ट सुशांत सरीन कहते हैं कि कई दशकों से ऐसा महसूस किया जा रहा है कि अगर विदेश से पैसा आ रहा है तो यह किस कारण से आ रहा है और उपयोग किस लिए किया जा रहा है। इसका पूरा लेखा- जोखा होना चाहिए। यह सोच सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में है।
हमने देखा है कि विदेश में ऐसी सरकारें और संस्थाएं हैं जो भारत की राजनीति को अपने हितों के हिसाब से प्रभावित करने का प्रयास करती हैं। वे लोगों को उकसाती भी हैं। यह सारा कार्यक्रम एनजीओ के जरिये होता है। ऐसा माना जा रहा है कि कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे पता चले कि विदेश से पैसा किस मकसद से भेजा जा रहा है।
सवाल नंबर- 1: पैसा क्यों आता है?
सवाल उठता है कि क्या पैसा यहां इसलिए आना चाहिए कि लोगों का धर्मांतरण करवाया जा सके। विदेशी ताकतों और संस्थाओं की ऐसी क्या दिलचस्पी है कि वह भारत में धर्मांतरण कराना चाहते हैं। कहा जा रहा है कि विधेयक में प्रस्तावित संशोधन अल्पसंख्यक विरोधी है जबकि यह कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है।
सुशांत सरीन बताते हैं, अक्सर हमने देखा है कि इस पर संशोधन के विरोध करने वाले चुप्पी साध लेते हैं क्योंकि विधेयक में यह कहीं नहीं लिखा है कि यह सिर्फ अल्पसंख्यकों पर या उन्हीं संस्थाओं पर लागू होगा जो अल्पसंख्यकों की हैं। कानून तो सभी लोगों पर लागू होगा। अगर किसी बहुसंख्यक संगठन के लिए विदेश से पैसा आ रहा है तो उसके लिए भी नियम समान रूप से लागू होंगे।
सवाल नंबर-2: विदेशियों की धर्मांतरण में दिलचस्पी क्यों है?
दूसरा अहम सवाल यह है कि विदेश में जो लोग हैं उनकी भारत में धर्मांतरण कराने को लेकर इतनी दिलचस्पी क्यों है। अगर किसी सामाजिक कार्य के लिए पैसा आ रहा है तो यह देखा जाना चाहिए कि उनके अंदर भारत को लेकर इतना दर्द क्यों है।
यह देखा गया है कि पैसा उन्हीं देशों से आ रहा है, जिन्होंने भारत को लंबे समय तक उपनिवेश बना कर रखा और अब भी वे यहां पर अपनी मनमर्जी चलाना चाहते हैं।
उनकी सरकारें तो हम पर ऐसे ऐसे प्रतिबंध लगाती हैं कि आप उनके साथ व्यापार भी न कर सकें और उन्हीं सरकारें के समर्थक यहां सामाजिक कल्याण के काम के लिए पैसा भेज रहे हैं। यहां विरोधाभाष साफ दिखता है।
वहीं जेडी वेंस जिनके बारे में माना जा रहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से एफसीआरए को लेकर बात की है, उन्हीं की सरकार के प्रतिनिधि भारत पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाते हैं।
अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों को आप वापस भेज रहे हैं, लेकिन भारतीयों के लिए आपके दिल में बड़ा दर्द उभर रहा है। समय के साथ विदेशी पैसों के प्रवाह को लेकर चीजें बदल गई हैं और भारत दुनिया की एक बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। ऐसे में विदेशी ताकतें हमारी तरक्की में बाधा डालना चाहती हैं।
ऐसे में इससे बचाव के लिए सरकार को एफसीआर कानून में मौजूद ऐसे लूपहोल को खत्म करना होगा जिसका फायदा विदेशी ताकतें और स्थानीय संगठन उठाते रहे हैं। हालांकि यह सही है कि इस पर सरकार को आम सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए।
एफसीआरए एक्ट में प्रस्तावित बदलाव पर सार्वजनिक रूप से पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। न ही सरकार ने चीजों को स्पष्ट करने का खास प्रयास किया है। सरकार को ऐसे कड़े नियम बनाते समय पूरी स्पष्टता रखनी चाहिए ताकि जनसेवा करने वाले निर्दोष संगठनों को नुकसान न पहुंचे। - वीरेन्द्र शर्मा अध्यक्ष, प्रहरी
प्रस्तावित संशोधन को लेकर क्यों फैल रहीं फैली अफवाहें?
प्रहरी अध्यक्ष वीरेन्द्र शर्मा के मुताबिक, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के सही इस्तेमाल और दुरुपयोग को लेकर शुरुआत से ही सवाल उठते रहे हैं। समय-समय पर हर सरकार ने कानून में बदलाव करके इसे सख्त और पारदर्शी बनाने की कोशिश की है।
मौजूदा सरकार की मंशा और संशोधनों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ संस्थाएं और व्यक्ति विदेशी फंड का दुरुपयोग करते हैं।
क्या किसी देश की सरकार को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह देशविरोधी तत्वों को बाहर से मिलने वाली आर्थिक मदद रोके? जवाब यकीनन ‘हां’ होगा। हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत इसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और भौगोलिक विविधता है। इस एकता को नुकसान पहुंचाने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। भारत के स्वभाव में ही मिलजुलकर रहना शामिल है।
इसके बावजूद, कभी-कभी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जिनसे लगता है कि कुछ असामाजिक तत्वों को बाहर से शह मिल रही है। ऐसे लोगों या संस्थाओं पर सख्ती का कोई देशभक्त विरोध नहीं करेगा। हालांकि, जब कानून के संशोधनों में स्पष्टता और गहराई की कमी होती है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
ज्यादातर पैसा उन्हीं देशों से आ रहा है, जिन्होंने भारत को लंबे समय तक उपनिवेश बना कर रखा और वे अब भी यहां अपनी मनमर्जी चाहते हैं। एनजीओ इसका जरिया बनते हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह काननू में मौजूद लूपहोल को खत्म करे, जिससे विदेशी पैसे का दुरुपयोग न किया जा सके। - सुशांत सरीन, विशेषज्ञ, सामरिक मामले
एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को कुछ लोग अल्पसंख्यक विरोधी बता रहे हैं, जबकि इसका असर सभी धर्मों के संगठनों पर पड़ता है। इस मुद्दे पर जनता के बीच न तो पर्याप्त चर्चा हुई और न ही सरकार ने लोगों की शंकाओं को दूर करने का कोई खास प्रयास किया।
नए संशोधन के अनुसार, यदि किसी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द होता है, समाप्त होता है, संगठन उसे सरेंडर करता है या नवीनीकरण खारिज हो जाता है, तो उसकी विदेशी राशि और उससे बनी संपत्तियों को सरकार द्वारा गठित अथारिटी जब्त कर लेगी।

कई सवाल भी हैं..जिनके जवाब जरूरी हैं?
विधेयक में कहा गया है कि यदि निर्माण किसी धार्मिक स्थल का है, तो उसके मूल स्वरूप में बदलाव नहीं होगा और धार्मिक गतिविधियां पहले की तरह चलती रहेंगी, लेकिन यहीं पर कई व्यावहारिक सवाल खड़े होते हैं।
- यदि किसी निर्माण में विदेशी फंड के साथ-साथ स्थानीय लोगों का चंदा भी लगा हो, तो अथारिटी क्या फैसला करेगी? इस अथॉरिटी में कौन-कौन लोग शामिल होंगे?
- क्या किसी एक धर्म के धार्मिक स्थल का प्रबंधन दूसरे धर्म के सदस्यों द्वारा किया जाना व्यावहारिक और स्वीकार्य होगा? क्या यह हमारी विविधता और सामाजिक सौहार्द के अनुकूल होगा?
- यदि अथॉरिटी किसी शिक्षण संस्थान या स्वास्थ्य केंद्र को अपने नियंत्रण में लेती है, तो वहां काम करने वाले शिक्षकों, कर्मचारियों और पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य का क्या होगा?
- क्या ये संस्थान अपने मूल सेवा-भाव से काम करते रहेंगे या इनके काम का तरीका बदल जाएगा?
गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एफसीआरए के तहत आने वाले 85 प्रतिशत से अधिक फंड का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्म और सामाजिक विकास के कार्यों में होता है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जो सीधे आम जनता के जीवन से जुड़े हैं। इसलिए, सरकार को ऐसे कड़े नियम बनाते समय पूरी स्पष्टता रखनी चाहिए ताकि जनसेवा करने वाले निर्दोष संगठनों को नुकसान न पहुंचे।
