जिंदगी पर भारी इलाज! सरकारी अस्पतालों में बुनियादी ढांचे की कमी, प्राइवेट हॉस्पिटल्स में महंगी व्यवस्था
देश की स्वास्थ्य प्रणाली सरकारी अस्पतालों में बुनियादी ढांचे की कमी और निजी अस्पतालों में महंगे व मनमाने इलाज के दोहरे संकट से जूझ रही है।

मरीजों को करना पड़ रहा है दोहरे संकट का सामना। (फोटो- एएनआई।)
HighLights
सरकारी अस्पतालों में बुनियादी ढांचे और क्षमता की कमी।
निजी अस्पतालों में महंगा इलाज और मनमानी बिलिंग।
टेलीमेडिसिन, मोबाइल क्लीनिक, सरकारी अस्पताल मजबूत करना समाधान।
जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। इलाज एक मूलभूत आवश्यकता है। एक लोक-कल्याणकारी लोकतंत्र में यह अपेक्षा की जाती है कि सरकार सभी नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी। हालांकि, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 176वीं रिपोर्ट निराशाजनक तस्वीर पेश करती है।
रिपोर्ट बताती है कि देश में मरीजों को इलाज की उपलब्धता और लागत के मोर्चे पर दोहरे संकट का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर जहां सरकारी अस्पताल मांग के अनुरूप सेवाएं देने में असमर्थ हैं, वहीं दूसरी ओर निजी अस्पतालों में मरीजों को घटिया स्तर के इलाज और मनमाने बिलों से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि देश की स्वास्थ्य प्रणाली सभी को किफायती दरों पर बेहतर इलाज उपलब्ध कराने में सक्षम कैसे बनेगी? इसी विषय की पड़ताल आज का मुख्य मुद्दा है...
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का संतुलन दो परस्पर विरोधी समस्याओं के कारण बिगड़ चुका है। सरकारी अस्पतालों में बुनियादी ढांचे की कमी है और वे मांग के अनुरूप लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने में सक्षम नहीं है और निजी अस्पतालों का खर्च इतना अधिक है देश की ज्यादातर जनता इसे वहन नहीं कर सकती है।
निजी अस्पतालों की महंगी व्यवस्था
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सरकारी अस्पतालों की स्थिति
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स्वास्थ्य खर्च: भारत बनाम विकसित देश
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कम सरकारी बजट: भारत का कुल सरकारी स्वास्थ्य खर्च जीडीपी का लगभग 1.5% से 2 प्रतिशत ही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 का लक्ष्य इसे 2.5 प्रतिशत करने का था। इसके विपरीत, विकसित देश औसतन जीडीपी का 9 से 11 प्रतिशत केवल सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं।
नागरिकों का स्वास्थ्य पर खर्च: विकसित देशों में नागरिकों को अपनी जेब से कुल खर्च का मात्र 10-12 प्रतिशत ही देना पड़ता है क्योंकि बाकी का खर्च सरकारी बीमा या नेशनल हेल्थ सर्विस उठाती है। भारत में परिवारों को इलाज का लगभग 40 प्रतिशत अपनी जेब से देना पड़ता है।
टेलीमेडिसिन से कम होगी सरकारी अस्पतालों में भीड़
पूर्व आईएएस ओपी अग्रवाल का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में भीड़ बहुत है। ज्यादातर मामले मामूली स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े होते हैं। इसके लिए आनलाइन व्यवस्था की जा सकती है, जिसे टेलीमेडिसिन कहते हैं। इस तरह से डाक्टरों का समय भी बरबाद नहीं होगा और अस्पातलों में भीड़ भी कम होगी। इसके अलवा ग्रामीण इलाकों में मोबाइल क्लीनिक की व्यवस्था की जानी चाहिए।
अगर दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं पर गौर करें तो अमेरिका में कोई सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था नहीं है। सारी स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र में हैं लेकिन वहां सबके लिए मेडिकल इन्श्योरेंस की व्यवस्था है। वहां नियोक्ता मेडिकल इन्श्योरेंस कराता है। संस्थान या कंपनी से नहीं जुड़ा है या बुजुर्ग है और रिटायर हो गया है। उसका इन्श्योरेंस कराने वाला कोई नहीं है तो उसके लिए सरकार की मेडिकेयर स्कीम है, जिसमें कई लोगों को इन्श्योरेंस मिलता है।

वहां व्यवस्था है कि आप निजी क्षेत्र में इलाज करा लें और उसकी इन्श्योरेंस कवरेज होती है। अमेरिका में यह व्यवस्था है। वहीं कनाडा में पूरा स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र के जिम्मे है। दोनों विकसित देश हैं लेकिन व्यवस्थाएं अलग हैं। हमारे यहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र को मिला देते हैं। अब निजी क्षेत्र में डॉक्टर को वेतन अच्छा मिलता है तो अच्छे डॉक्टर प्राइवेट में चले जाते हैं। सरकारी क्षेत्र में अच्छे डॉक्टर रहते नहीं हैं।
वहीं नर्सिंग या पैरामेडिकल स्टाफ होता है उसका वेतन निजी क्षेत्र में कम है और सरकारी क्षेत्र में अच्छा है। यह एक तरह का असंतुलन है। यह एक समस्या है। दूसरी तरफ यह देखा गया है कि लोगों को जो 60-70 प्रतिशत मामले आते हैं वे बहुत मामूल स्वास्थ्य समस्याएं हैं जैसे किसी को बुखार है, सिर में दर्द है। इसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था कर दें, जिसे टेलीमेडिसिन कहते हैं।
आज के समय में यह हो सकता है। इस तरह से ज्यादातर मामलों में डॉक्टरों का समय भी बरबाद नहीं होगा। इसके बाद अगर डॉक्टर कहता है कि आपको तो अस्पताल में देखना पड़ेगा और कई टेस्ट कराने पड़ेंगे तो ऐसे मामलों में मरीज को अस्पताल जाना पड़ेगा। इससे सरकारी अस्पताल में भीड़ कम हो जाएगी।
आज समस्या यह है कि सरकारी अस्पतालों में भीड़ बहुत होती है। दूसरी समस्या यह है कि डॉक्टर दूर दूराज की पोस्टिंग पर जाना नहीं चाहते हैं। यह एक जमीनी सच्चाई है। इसका समाधान यही है कि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए मोबाइल क्लीनिक की व्यवस्था की जाए। इससे सीएचसी स्तर पर जो भीड़ का दबाव है वह भी कम होगा और लोगों को उनके गांव में मेडिकल केयर मिलेगी।
निजी क्षेत्र में एक बड़ी समस्या मनमानी बिलिंग की है। इसका समाधान यह हो सकता है कि सबसके लिए मेडिकल इन्श्योरेंस की व्यवस्था हो और इलाज का बिल सीधे इन्श्योरेंस कंपनी को भेजा जाए न कि मरीज को। अमेरिका में इसी तरह की व्यवस्था है। वहां अस्पताल इलाज का बिल इन्श्योरेंस कंपनी को भेजता है और इंश्योरेंस कंपनी इस बिल का भुगतान करती है।
अगर इन्श्योरेंस कंपनी कहती है कि बिल में कुछ चीजें इन्श्योरेंस में कवर नहीं है तभी मरीज को बिल के उस हिस्से का भुगतान करना होता है। लेकिन अमेरिका में यह व्यवस्था है कि अस्पताल बिल का भुगतान होने तक मरीज को अस्पताल में रोक नहीं सकते हैं। भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं है। अगर ऐसी व्यवस्था हो जाए तो निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक लगाई जा सकती है।
मजबूत सरकारी अस्पताल बनाएंगे निजी अस्पतालों पर दबाव
लोक नीति विशेषज्ञ डॉ. चंक्रकांत लहरिया का कहना है कि निजी अस्पतालों पर दबाव बनाने का सबसे सही तरीका यह है कि सरकारी अस्पतालों को मजबूत किया जाए। जब किसी जिले के सरकारी अस्पताल में सही डॉक्टर, नर्स, जांच मशीनें और आइसीयू की सुविधा होगी, तो लोग वहां इलाज कराएंगे। इससे निजी अस्पतालों को भी अपने दाम और इलाज की गुणवत्ता में सुधार करना पड़ेगा।
भारत में सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर चल रही बहस ज्यादातर निजी अस्पतालों पर केंद्रित रही है। संसद की स्वास्थ्य समिति ने अपनी रिपोर्ट में इलाज के भारी खर्च, विदेशी निवेश और कड़े नियमों की जरूरत पर चिंता जताई है। यह सही भी है, लेकिन अगर हमारी नीतियां सिर्फ निजी अस्पतालों को नियंत्रित करने तक सीमित रहेंगी, तो समस्या का आधा समाधान ही हो पाएगा।
असली चुनौती यह नहीं है कि निजी क्षेत्र का इलाज महंगा है बल्कि यह है कि सरकारी अस्पतालों में सही विकल्प न होने के कारण आम लोगों को मजबूरन निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है। निजी और सरकारी अस्पतालों में इलाज के खर्च में बहुत बड़ा अंतर है। इसी वजह से कोई बीमारी अचानक परिवार के लिए आर्थिक संकट बन जाती है।
रेट तय करना, अग्रिम बिल देना और पारदर्शी नियम बनाना मरीजों की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। लेकिन सिर्फ दाम तय कर देने से समस्या खत्म नहीं होती। अगर कमरे का किराया कम किया जाएगा, तो अस्पताल जांच, दवाइयों या आइसीयू के नाम पर बिल बढ़ा देते हैं।
इसी तरह विदेशी निवेश रोकने भर से इलाज सस्ता नहीं होगा, क्योंकि देश के निजी अस्पताल भी मुनाफा कमाने के लिए ही चलते हैं। निजी अस्पतालों पर दबाव बनाने का सबसे सही तरीका यह है कि सरकारी अस्पतालों को मजबूत किया जाए। जब किसी जिले के सरकारी अस्पताल में सही डॉक्टर, नर्स, जांच मशीनें और आईसीयू की सुविधा होगी, तो लोग वहां इलाज कराएंगे। इससे निजी अस्पतालों को भी अपने दाम और इलाज की गुणवत्ता में सुधार करना पड़ेगा।
एक अच्छा सरकारी अस्पताल ही निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने की सबसे बड़ी ताकत है। भारत को सिर्फ निजी अस्पतालों के नियम ही नहीं बनाने हैं, बल्कि सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों, डॉक्टरों और स्टाफ की कमी को भी तुरंत दूर करना होगा। गांवों और छोटे शहरों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को भी बेहतर बनाना होगा ताकि बीमारी शुरुआती दौर में ही ठीक हो सके।
विकसित भारत का सपना केवल बड़े-बड़े निजी अस्पतालों से पूरा नहीं हो सकता। देश के हर आम नागरिक को अपने शहर में ही सही और सस्ता इलाज मिलना चाहिए। देश को निजी और सरकारी दोनों तरह की व्यवस्थाओं की जरूरत है। बीमा योजनाएं पैसे देकर मदद तो कर सकती हैं, लेकिन वे नए अस्पताल या डॉक्टर खड़े नहीं कर सकतीं।
इसलिए, भारत को एक संतुलित रास्ते पर चलना होगा। जहां निजी क्षेत्र पर सही नियम लागू हों और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी मजबूत हो कि आम जनता को उस पर पूरा भरोसा हो।
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