'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर बैठक रद, जेपीसी और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच नहीं होगी चर्चा
एक राष्ट्र, एक चुनाव पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच प्रस्तावित बैठक रद कर दी गई है।

एक राष्ट्र एक चुनाव पर जेपीसी और सुप्रीम कोर्ट की बैठक रद (फाइल फोटो- सोशल मीडिया)
HighLights
जेपीसी और सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' बैठक रद।
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा के कारण बैठक को अनुचित माना।
अर्थशास्त्रियों ने जेपीसी के समक्ष 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का समर्थन किया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। एक राष्ट्र, एक चुनाव पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच होने वाली प्रस्तावित बैठक को अंततः रद कर दिया गया है। समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में इस अनौपचारिक बैठक के लिए सहमति दी थी, लेकिन बाद में इसे अनुचित मानते हुए रद कर दिया। इसके बाद इस मुद्दे पर सियासी चर्चा तेज हो गई है।
सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव विपक्षी द्रमुक सांसद पी. विल्सन द्वारा लाया गया था। हालांकि, बाद में यह महसूस किया गया कि प्रस्तावित संविधान संशोधन भविष्य में सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक समीक्षा का विषय बन सकता है, इसलिए प्रशासनिक स्तर पर इस मुद्दे पर चर्चा करना उचित नहीं होगा।
हालांकि, भाजपा के वरिष्ठ सांसद और जेपीसी अध्यक्ष चौधरी ने 1950 के दशक के पुराने उदाहरणों का हवाला देते हुए न्यायाधीशों से परामर्श के निर्णय का बचाव किया। उन्होंने कहा कि समिति को सितंबर के अंत में संसद सचिवालय के माध्यम से बैठक की पुष्टि मिली थी, लेकिन बाद में उठे कुछ सवालों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद कर दिया।
चौधरी ने कहा कि संसदीय समितियों द्वारा संवैधानिक मामलों पर न्यायाधीशों से बातचीत करने के पूर्व उदाहरण रहे हैं, क्योंकि मकसद उनकी विशेषज्ञता का लाभ उठाने का ही रहा है। बहरहाल, कोर्ट के निर्णय के बाद मामले को आगे न बढ़ाने का फैसला लिया गया। दूसरी ओर, द्रमुक सांसद विल्सन ने बैठक रद होने पर निराशा जताई और कहा कि यह एक महत्वपूर्ण अवसर था।
एक राष्ट्र, एक चुनाव के समर्थन में आए अर्थशास्त्री
एक अन्य बैठक में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन, एस. महेंद्र देव और एस. गुरुमूर्ति सहित कई प्रख्यात अर्थशास्त्रियों ने जेपीसी के समक्ष एक साथ चुनाव का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि बार-बार होने वाले चुनावों के कारण वित्तीय आवंटन पूंजीगत व्यय के बजाय राजस्व व्यय पर केंद्रित हो जाता है। (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
