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अमेरिका में ग्रीन कार्ड की राह और कठिन, विप्रो, इंफोसिस, टीसीएस समेत आठ आईटी कंपनियों को झटका

Published: Fri, 09 Oct 2026 01:47 AM (GMT+05:30)Updated: Fri, 09 Oct 2026 02:22 AM (GMT+05:30)

अमेरिकी श्रम विभाग ने काग्निजेंट, इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी जैसी प्रमुख आइटी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पर्म) कार्यक्रम से निलंबित कर दिया है।

अमेरिका ने भारत से जुड़ी आईटी कंपनियों को PERM प्रक्रिया से बाहर किया

अमेरिका ने भारत से जुड़ी आईटी कंपनियों को PERM प्रक्रिया से बाहर किया

HighLights

  1. विप्रो, इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो, एचसीएल, काग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट और एडोब सूची में 

  2. नए आवेदन स्वीकार नहीं होंगे, लंबित मामलों पर भी कार्रवाई रुकी 

  3. अमेरिकी श्रम मंत्री ने विदेशी कर्मचारियों से नौकरियां जाने का लगाया आरोप

जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही भारतीय आइटी पेशेवरों को निशाने पर ले रहे राष्ट्रपति ट्रंप के प्रशासन ने बुधवार, 8 अक्टूबर 2026 को ऐसा कदम उठाया है, जिससे भारत-अमेरिका संबंधों में और खटास बढ़ने की आशंका है।

अमेरिकी श्रम विभाग ने काग्निजेंट, इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी जैसी प्रमुख आइटी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पर्म) कार्यक्रम से निलंबित कर दिया है।

संघीय जांचों के हवाले से माइक्रोसॉफ्ट और एडोब जैसी दिग्गज कंपनियों पर भी यही रोक लगाई गई है। यह कार्यक्रम कंपनियों को एच-1बी वीजा पर काम कर रहे कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया आगे बढ़ाने में मदद करता है।

व्हाइट हाउस में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और श्रम सचिव कीथ सान्डरलिंग ने प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगाया कि ये कंपनियां एच-1बी और ग्रीन कार्ड के जरिए अमेरिकी नौकरियां छीन रही हैं।

हालांकि, यह कदम नई पर्म अर्जियां स्वीकार नहीं करने और लंबित अर्जियों की प्रक्रिया रोकने तक सीमित है। यानी इन कंपनियों में एच-1बी वीजा पर काम कर रहे आईटी इंजीनियरों पर फिलहाल कोई सीधा खतरा नहीं है।

ट्रंप प्रशासन के इन फैसलों पर देर रात तक भारत सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया था। ट्रंप प्रशासन का यह फैसला एक लाख डॉलर की नई एच-1बी फीस और ‘प्रोजेक्ट फायरवाल’ जैसी कार्रवाइयों के बाद आया है। इससे भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव बढ़ने की संभावना है।

भारतीय आईटी कंपनियों के हजारों एच-1बी कर्मचारी, जिनके स्थायी निवास का सामान्य रास्ता इन्हीं कंपनियों के जरिये आगे बढ़ता था, अब ग्रीन कार्ड की पाइपलाइन रुकने से अनिश्चितता में पड़ गए हैं।

दूसरी ओर, आइटी कंपनियों के लिए अमेरिका में चलने वाली परियोजनाओं की दीर्घकालिक योजना बनाना भी मुश्किल हो सकता है। इससे भारत के आइटी सेवा निर्यात पर भी असर पड़ने की आशंका है। अमेरिका ने यह कदम ऐसे समय उठाया है, जब दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता एक तरह से अटक गई है।

प्रशासन के अनुसार, 2009 से इन कंपनियों ने करीब 30 लाख विदेशी श्रमिकों के लिए आवेदन किया और 2.3 लाख से अधिक एच-1बी वीजा मंजूरियां तथा एक लाख से अधिक स्थायी श्रम प्रमाणन प्राप्त किए। प्रशासन का दावा है कि इससे सैकड़ों हजारों नौकरियां अमेरिकी श्रमिकों से छिन गईं।

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने विशेष रूप से माइक्रोसाफ्ट को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि कंपनी ने पिछले साल करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि उसे करीब 6,300 एच-1बी वीजा और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड धारकों को पर्म का लाभ मिला।

उनका कहना था कि हर छंटनी किए गए अमेरिकी कर्मचारी के बदले डेढ़ विदेशी ‘बंधुआ’ श्रमिक रखे गए।

गौरतलब है कि ‘पर्म’ अधिकांश रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड का पहला अनिवार्य कदम होता है। इसमें नियोक्ता को यह साबित करना होता है कि योग्य अमेरिकी उम्मीदवार उपलब्ध नहीं है और विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से अमेरिकी मजदूरी या रोजगार के अवसरों को नुकसान नहीं पहुंचेगा।

नौ विश्वविद्यालय भी जांच के दायरे में

वेंस ने हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड समेत नौ विश्वविद्यालयों की भी जांच किए जाने की बात कही। आरोप है कि ये संस्थान अमेरिकी वेतन कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों को ला रहे हैं।

जांच के दायरे में ब्राउन, यूनिवर्सिटी आफ पिट्सबर्ग, यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया डेविस, कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी, एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी और एमआइटी भी शामिल हैं।