भगवान शिव के बारे में

- भगवान शिव महादेव, शंकर, भोलेनाथ, नीलकंठ, रुद्र, त्रिपुरारी, कैलाशपति, पशुपतिनाथ भी कहलाते हैं।
- इनकी पत्नी आदिशक्ति माता पार्वती एवं पुत्र प्रथम पूज्य श्रीगणेश और भगवान कार्तिकेय जी हैं।
- भगवान शिव को कैलाश वासी कहा जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यता के मुताबिक उनका निवास स्थान कैलाश पर्वत है।
- भोलेनाथ की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन सोमवार और तिथि प्रदोष मानी जाती है।
- उनका प्रिय रंग सफेद और नीला है। साथ ही उनके प्रिय भोग में भांग, धतूरा, बेलपत्र शामिल हैं।
- शिव शंकर अपने हाथों में सदैव त्रिशूल और डमरू धारण किए नजर आते हैं। उनकी सवारी नंदी है, जो उन्हें बेहद प्रिय हैं।
- भोलनाथ से जुड़े प्रमुख त्योहारों में महाशिवरात्रि, श्रावण मास (सावन), सावन सोमवार, मासिक शिवरात्रि आदि शामिल हैं।
- इनके प्रसिद्ध मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर, केदारनाथ मंदिर, महाकालेश्वर मंदिर, सोमनाथ मंदिर, अमरनाथ हैं।
- महादेव, अर्धनारीश्वर, नटराज, भैरव, दक्षिणामूर्ति, पशुपतिनाथ, महाकाल, शिवलिंग भगवान शिव के प्रमुख स्वरूप हैं।

शिव चालीसा
।। दोहा ।।
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
अर्थ: माता पार्वती के पुत्र, समस्त शुभता के दाता और परम बुद्धिमान श्री गणेश जी की जय हो! अयोध्यादास प्रार्थना करते हैं हे प्रभु! आप मुझे निर्भयता का वरदान प्रदान करें।
॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
अर्थ: माता पार्वती के स्वामी और दुखीजनों पर दया करने वाले महादेव की जय हो! आप सदा अपने भक्तों और सज्जनों की रक्षा करते हैं।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥
अर्थ: आपके माथे पर सुंदर चंद्रमा चमक रहा है और आपके कानों में नाग रूपी कुंडल बेहद सुशोभित हो रहे हैं।
अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
अर्थ: आपका गोरा रंग है, जटाओं से मां गंगा की धारा बह रही है, गले में मुंडों की माला है और आपने पूरे शरीर पर भस्म लगा रखी है।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥
अर्थ: आपने बाघ की छाल के वस्त्र धारण किए हैं। आपके इस अद्भुत और अलौकिक रूप को देखकर सर्प और मुनिगण भी मोहित हो जाते हैं।
मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
अर्थ: रानी मैना की लाडली बेटी माता पार्वती आपके बाएं अंग में विराजमान हैं, जिनकी सुंदरता और शोभा अनुपम है।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
अर्थ: आपके हाथ में सुशोभित त्रिशूल अत्यंत तेजस्वी दिखता है, जिससे आप हमेशा धर्म के शत्रुओं और दुष्टों का नाश करते हैं।
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
अर्थ: आपके समीप आपके वाहन नंदी और पुत्र गणेश जी ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो विशाल सागर के बीच में सुंदर कमल खिले हों।
कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥
अर्थ: आपके पास कार्तिकेय जी और समस्त शिवगण विराजमान हैं। इस अलौकिक दृश्य के सौंदर्य का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।
देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
अर्थ: जब भी देवताओं पर संकट आया और उन्होंने आपको पुकारा, आपने बिना किसी देरी के उनके सारे दुखों को हर लिया।
किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
अर्थ: जब ताड़कासुर राक्षस ने भारी उपद्रव मचाया, तब सभी देवताओं ने एकजुट होकर आपसे रक्षा की गुहार लगाई।
तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
अर्थ: आपने तुरंत अपने पुत्र कार्तिकेय (षडानन) को भेजा, जिन्होंने पलक झपकते ही उस दैत्य का अंत कर दिया।
आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
अर्थ: आपने अत्यंत बलशाली असुर जलंधर का भी संहार किया था। आपकी यह महान कीर्ति पूरे संसार में प्रसिद्ध है।
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
अर्थ: आपने त्रिपुरासुर से भीषण युद्ध करके उसका अंत किया और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया।
किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
अर्थ: जब राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की, तब आपने गंगा जी को अपनी जटाओं में समेटकर भगीरथ की प्रतिज्ञा पूरी की और उनके पूर्वजों का उद्धार किया।
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
अर्थ: दान देने के मामले में आपके समान उदार कोई नहीं है। आपके भक्त सदैव आपकी महिमा का गान करते रहते हैं।
वेद नाम महिमा तव गाई ।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥
अर्थ: वेदों ने भी आपकी महिमा का वर्णन किया है, फिर भी आपका स्वरूप अकथनीय है। आपका न कोई आरंभ है न अंत, आपके रहस्य को पूरी तरह कोई नहीं जान सकता।
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥
अर्थ: जब समुद्र मंथन के समय भयंकर विष की ज्वाला निकली, तो उससे देवता और दानव दोनों व्याकुल होकर जलने लगे।
कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
अर्थ: तब आपने दया करके उस हलाहल विष को स्वयं पी लिया और सबकी रक्षा की। गले में विष धारण करने के कारण ही आप 'नीलकंठ' कहलाए।
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
अर्थ: जब श्रीराम ने लंका विजय से पूर्व आपका पूजन किया, तो आपकी कृपा से उन्होंने लंका पर जीत हासिल की और विभीषण को वहाँ का राजा बनाया।
सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥
अर्थ: जब श्रीराम हजार कमलों से आपकी आराधना कर रहे थे, तब आपने उनकी भक्ति को परखने के लिए एक लीला रची।
एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
अर्थ: आपने अपनी माया से एक कमल छिपा दिया। तब श्रीराम ने अपने नेत्र (कमल नयन) को ही अर्पण करने का संकल्प कर लिया।
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
अर्थ: श्रीराम की ऐसी अनन्य भक्ति देखकर आप अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें विजय का मनोवांछित वरदान दिया।
जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥
अर्थ: हे अविनाशी और सीमाहीन प्रभु शिव! आपकी सदा जय हो। आप सभी प्राणियों के हृदय में निवास करके उन पर अपनी कृपा बरसाते हैं।
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥
अर्थ: हे प्रभु! मेरे मन के बुरे विचार और काम-क्रोध जैसे विकार मुझे निरंतर परेशान करते हैं, जिससे मेरा मन भटकता रहता है और मुझे शांति नहीं मिलती।
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
अर्थ: हे स्वामी! मैं रक्षा की गुहार लगा रहा हूँ। इस संकट की घड़ी में आकर मेरा उद्धार कीजिए।
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥
अर्थ: अपने त्रिशूल से मेरे आंतरिक व बाहरी शत्रुओं (विकारों) का अंत कर दीजिए और मुझे हर संकट से बाहर निकालिए।
मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥
अर्थ: सांसारिक रिश्ते जैसे माता-पिता या भाई-बहन केवल सुख के साथी होते हैं। जब जीवन में कठिन समय आता है, तो कोई काम नहीं आता।
स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥
अर्थ: हे महादेव! मुझे केवल आपसे ही उम्मीद है। आप ही आकर मेरे इस भारी संकट को दूर कीजिए।
धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
अर्थ: आप निर्धनों को धन-धान्य देते हैं और जो भी भक्त आपसे जिस फल की प्रार्थना करता है, आप उसकी इच्छा अवश्य पूरी करते हैं।
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
अर्थ: हे प्रभु! मुझे तो आपकी सही ढंग से पूजा-स्तुति करना भी नहीं आता। इसलिए मेरी अज्ञानता और भूल-चूक को क्षमा कर दीजिए।
शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
अर्थ: हे भोलेनाथ! आप कष्टों को मिटाने वाले, जीवन में मंगल लाने वाले और सभी बाधाओं को समाप्त करने वाले हैं।
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥
अर्थ: बड़े-बड़े योगी, तपस्वी और मुनि आपका ही ध्यान करते हैं। स्वयं माता सरस्वती और नारद मुनि भी आपके चरणों में शीश झुकाते हैं।
नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
अर्थ: 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र की सदा जय हो। ब्रह्मा जी सहित बड़े-बड़े देवता भी आपके पूर्ण रहस्य को नहीं समझ सके।
जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥
अर्थ: जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा और एकाग्र मन से इस शिव चालीसा का पाठ करता है, महादेव स्वयं उसके सहायक बनते हैं।
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥
अर्थ: यदि कोई व्यक्ति कर्ज के बोझ से दबा हो, तो वह नियमित पाठ करके शिव कृपा से ऋण मुक्त हो सकता है।
पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥
अर्थ: जो निष्ठापूर्वक संतान की कामना से यह पाठ करता है, उसे शिवजी के आशीर्वाद से संतान सुख प्राप्त होता है।
पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
अर्थ: भक्त को चाहिए कि वह प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को किसी विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर विधि-विधान से हवन और पूजन कराए।
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥
अर्थ: जो व्यक्ति नियम से त्रयोदशी (प्रदोष) का व्रत रखता है, उसका शरीर रोगों से मुक्त रहता है और जीवन के क्लेश समाप्त हो जाते हैं।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
अर्थ: धूप, दीपक और भोग अर्पित करके शिवजी की प्रतिमा के समक्ष बैठकर जो यह पाठ करता है,
जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥
अर्थ: उसके कई जन्मों के पाप कट जाते हैं और देह त्यागने के पश्चात उसे शिवलोक (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥
अर्थ: रचयिता अयोध्यादास कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे केवल आपका ही सहारा है। मेरे समस्त दुखों को जानकर उनका निवारण कर दीजिए।
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥
अर्थ: जो भी प्रातःकाल नियमपूर्वक इस चालीसा का पाठ करता है, हे जगदीश्वर! आप उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करें।
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥
अर्थ: मार्गशीर्ष (अघन) महीने की छठी तिथि, हेमंत ऋतु और संवत 1664 (विक्रम संवत) में जन-कल्याण के उद्देश्य से यह शिव चालीसा स्तुति पूर्ण हुई।

भगवान शिव के त्योहार एवं तिथियाँ
| उपवास और त्योहार | तिथि |
|---|---|
| सावन का चौथा सोमवार व्रत | सोमवार, 24 अगस्त 2026 |
| चौथा मंगला गौरी व्रत | मंगलवार, 25 अगस्त 2026 |
| रक्षाबंधन | शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- शिव चालीसा का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?नियमित रूप से शिव चालीसा का पाठ करना कई तरह के फायदेमंद हो सकता है। इससे मन को शांति मिलती है। साथ ही भय से मुक्ति और एकाग्रता भी बढ़ती है। भोलेनाथ आसानी मानने वाले भगवान हैं और शिव चालीसा उनकी कृपा पाने का सबसे सरल उपाय है। इसके पाठ से आर्थिक संकट भी दूर होते हैं, जिससे जीवन सुख-समृद्धि और आरोग्य आता है।
- शिव चालीसा का पाठ कब और कितनी बार करना चाहिए?यूं तो इस चालीसा का पाठ आप रोजाना भी कर सकते हैं, लेकिन सोमवार के दिन विशेष रूप से इसका पाठ फायदेमंद माना जाता है। सोमवार सुबह ब्रह्म मुहूर्त यानी सूर्योदय से पहले या शाम को प्रदोष काल में इसका पाठ सबसे उत्तम माना गया है। आप रोजाना अपनी श्रद्धानुसार 1, 3 या 5 बार इसका पाठ कर सकते हैं। वहीं, किसी खास मनोकामना की पूर्ति के लिए 11 या 40 बार पाठ करना फलदायी माना गया है।
- शिव चालीसा किसने लिखी है?धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शिव चालीसा की रचना मुख्य रूप से संत अयोध्यादास द्वारा मानी जाती है। चालीसा में अंत में उनके नाम का भी वर्णन किया गया है। इसके अलावा ऐसा भी माना जाता है कि इसे मुख्य रूप से शिव पुराण से लिया गया है, जिसकी रचना महर्षि वेद व्यास द्वारा की गई है।
- सावन में शिव चालीसा का पाठ करने का क्या महत्व है?सावन का पूरा महीना भगवान शिव को समर्पित होता है और इस दौरान भोलेबाबा की कृपा पाने के लिए लोग महादेव की आराधना करते हैं। इस दौरान शिव चालीसा का पाठ करना भी काफी फायदेमंद माना जाता है। इससे भोलेनाथ की असीम कृपा मिलती होती है। साथ ही इससे मानसिक शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा भी मिलती है।
- शिव चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र में क्या अंतर है?शिव चालीसा भगवान शंकर की स्तुति में गाई जाने वाली एक रचना है, जिसे कोई भी व्यक्ति बिना किसी खास या कठोर नियम के पढ़ सकता है। वहीं, महामृत्युंजय मंत्र एक बेहद शक्तिशाली बीज मंत्र है, जिसका जिक्र वेदों में भी मिलता है। यह मंत्र मुख्य रूप से अकाल मृत्यु टालने, मोक्ष और आरोग्य के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
- शिव चालीसा में भगवान शिव के किन-किन स्वरूपों और गुणों का वर्णन किया गया है?शिव चालीसा में भगवान शिव की महिमा का वर्णन मिलता है। साथ-ही-साथ इसमें भोलेबाबा के अलग-अलग रूपों के बारे में भी बताया गया है। इसमें महादेव को औघड़ (भक्तों पर दया करने वाले), सर्वशक्तिमान, कल्याणकारी, नीलकंठ, त्रिलोचन (तीन आंखों वाले), गंगाधर और भूतनाथ के रूप में दर्शाया गया है।
ज्योतिष सेवाएं
जन्म कुंडली के गहन अध्ययन से करियर, विवाह, स्वास्थ्य की सटीक भविष्यवाणियाँ और मांगलिक, पितृ दोष आदि का ज्योतिषीय समाधान प्राप्त करें।











