नागों की देवी 'मनसा' का भगवान शिव से क्या है संबंध? जानें जन्म की पौराणिक कथा
देवी मनसा को भगवान शिव की मानस पुत्री माना जाता है, जिनके जन्म की कथाएं विभिन्न पुराणों में मिलती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शिव के दिव्य तेज से जन्मी मनसा को माता पार्वती ने एक श्राप दिया था।

नागों की देवी मनसा की कथा ! (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। इनमें से एक हैं देवी मनसा, जिन्हें नागों की देवी भी कहा गया है। इनका भगवान शंकर से गहरा रिश्ता है। माता मनसा के जन्म और भगवान शिव से उनके संबंध को लेकर अलग-अलग पुराणों विभिन्न कथाएं मिलती हैं। इसका विस्तृत वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड के अध्याय 45 और 46 में मिलता है। पुराण में दोनों का क्या संबंध बताया गया है, चलिए जानते हैं।
भगवान शिव की मानस पुत्री मानी जाती हैं
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता मनसा को भगवान शिव की मानस पुत्री कहा जाता है। 'मानस पुत्री' का अर्थ ऐसी संतान से होता है, जिसका जन्म सामान्य शारीरिक प्रक्रिया से न होकर मन या संकल्प से होता है। इसके पीछे एक कथा प्रचलित है। जिसमें बताया गया है कि कैसे मनसा देवी का जन्म हुआ था।
मान्यता अनुसार माता मनसा को भगवान शिव की पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कहा जाता है। हालांकि, सभी धार्मिक ग्रंथों में उनके जन्म की कथा एक जैसी नहीं मिलती है।
शिव के दिव्य तेज से जन्म की कथा
कथा के अनुसार, एक समय में भगवान शिव ध्यान में लीन थे और उन्हें तब ही देवी पार्वती के बहुत ही मनोहर स्वरूप का अनुभव हुआ, इस अनुभव से उनका वीर्य जमीन पर जा गिरा जिससे मनसा देवी का जन्म हुआ ।
कथा में आगे कहा जाता है कि देवी मनसा का जन्म होने के बाद उनकी रक्षा नागों और सर्पियों ने की। वासुकी नाग ने उन्हें अपनी पुत्री की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया। धीरे-धीरे वह दिव्य स्वरूप एक सुंदर नाग-कन्या के रूप में प्रकट हुईं, जिसे आगे चलकर मनसा देवी के नाम से जाना गया।
भगवान शिव ने पुत्री के रूप में स्वीकार किया
कथा के अनुसार, जब मनसा देवी बड़ी हुईं तब वासुकी नाग ने उन्हें बताया कि वह महादेव की पुत्री हैं और उन्हें उनके पास ले गए। जब भगवान शिव ने इस कन्या को देखा तो उन्होंने उसे अपनी मानस पुत्री के रूप में स्वीकार किया।
माता पार्वती ने क्यों दिया था उन्हें श्राप ?
श्रीमद् देवीभागवत पुराण के स्कंध 9 और अध्याय 48 में इस बात का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि जब देवी पार्वती ने मनसा देवी को देखा तो महादेव और उनके मध्य विवाद हो गया। देवी पार्वती उन्हें अपनी सौतेली पुत्री मानती थीं। क्योंकि मनसा देवी का जन्म शिव जी के मन से हुआ था, इसलिए माता पार्वती के लिए उन्हें अपनाना आसान नहीं था। इसलिए उन्होंने देवी को श्राप दिया था कि उनकी पूजा हमेशा अधूरी ही मानी जाएगी।
मनसा देवी को विषहरी माता के नाम से भी जाना जाता है और आज भी इनकी पूजा में दाएं की जगह बाएं हाथ का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि हिंदू धर्म में बाएं हाथ से की गई पूजा को अधूरा माना गया है।
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