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टीचर्स डे 2026: 'गुरु गोबिंद दोऊ खड़े...' पढ़ें गुरु की महिमा बताने वाले कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे और उनके अर्थ

Published: Fri, 04 Sep 2026 05:00 PM (IST)Updated: Sat, 05 Sep 2026 09:45 AM (IST)

संत कबीर दास के दोहे जो गुरु के महत्व को ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताते हैं, खासकर शिक्षक दिवस के ...और पढ़ें

टीचर्स डे 2026 प्रसिद्ध दोहे

टीचर्स डे 2026 प्रसिद्ध दोहे

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान ईश्वर से भी श्रेष्ठ यानी उंचा माना जाता है और इस भावना को जितनी अधिक गहराई से संत कबीर दास ने कहा है, शायद ही किसे ने कहा हो।

उनके मुताबिक जीवन में गुरु की भूमिका होना बेहद जरूरी है क्योंकि वह अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का उजाला दिखाता है। हर साल की तरह इस साल भी 5 सितंबर को टीचर्स डे है।

टीचर्स डे के मौके पर कबीर के दोहे जो गुरु की महिमा और शिष्य समर्पण की बात करती है। आइए पढ़ते हैं गुरु से संबंधित 10 प्रसिद्ध दोहे को।

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

अर्थ- गुरु और गोविंद दोनों सामने खड़े हों तो पहले किसके चरण छुने चाहिए? कबीर कहते हैं कि पहले गुरु के क्योंकि गोविंद तक का रास्ता तो गुरु ने ही दिखाया है।

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

अर्थ- गुरु कुम्हार और शिष्य कच्चा घड़ा है। कुम्हार बाहर से चोट मारकर घड़े गढ़ता है पर अंदर से हाथ का सहारा भी देता रहता है। गुरु की डांट में भी करुणा छिपी होती है।

सब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय॥

अर्थ- सारी धरती को कागज सब वनों को कमल और सातों समुद्रों को स्याही बना दूं, तब भी गुरु के गुण के गुण पूरे नहीं लिखे जा सकते हैं।

गुरु बिन ज्ञान न ऊपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥

अर्थ- गुरु के बिना न ज्ञान उपज सकता है और न ही मुक्ति मिलती है। न सच्चाई दिखता है और न ही दोश मिटते हैं।

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥

अर्थ- मानव शरीर काम, क्रोध, मोह, लोभ जैसे विषय विकारों और वासनाओं रूपी विष की बेल की तरह है। इसके विपरीत गुर ज्ञान और मोक्ष रूपी अमृत के समान है। यदि अपना सिर देकर भी सच्चा ज्ञान मिल जाए तो उसे भी काफी सस्ता सौदा समझना चाहिए।

कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर॥

अर्थ-जो गुरु को साधारण मनुष्य समझते हैं वे अंधे होते हैं, हरि रूठ जाएं तो गुरु शरण देता है,पर गुरु रूठ जाए तो कहीं भी ठिकान नहीं मिलता है।

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