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आज मनाया जा रहा है दही हांडी उत्सव, पढ़ें द्वापर युग से जुड़ी इस परंपरा का असली रहस्य

Published: Tue, 01 Sep 2026 02:27 PM (IST)Updated: Sat, 05 Sep 2026 08:46 AM (IST)

दही हांडी उत्सव भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा है। इस पर्व पर युवा मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर ...और पढ़ें

दही हांडी उत्सव का इतिहास (Picture Credit: AI Generated)

 दही हांडी उत्सव का इतिहास (Picture Credit: AI Generated) 

HighLights

  1. जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है दही हांडी उत्सव।

  2. भगवान श्रीकृष्ण की माखन चोरी लीला से हुई शुरुआत।

  3. युवा मानव पिरामिड बनाकर मटकी फोड़ते हैं, प्रसाद ग्रहण करते हैं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित जन्माष्टमी का पावन पर्व लड्डू गोपाल की आराधना के लिए अधिक शुभ माना जाता है। इसके ठीक अगले दिन यानी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि पर पूरे उत्साह के साथ दही हांडी का उत्सव मनाया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, यह उत्सव आज यानी 5 सितंबर को मनाया जा रहा है। 

इस उत्सव को उत्साह और उल्लास के साथ भगवान श्रीकृष्ण की लीला के रूप में मनाया जाता है। इस खास अवसर पर दही हांडी को फोड़ा जाता है। इस दिन देशभर में खास रौनक देखने को मिलती है। अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर दही हांडी उत्सव की शुरुआत कैसे हुई। आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से इसके पीछे की वजह के बारे में बताते हैं।

dahi handi utsav 2026

(Picture Credit: AI Generated) 

कैसे हुई दही हांडी उत्सव की शुरुआत?

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को माखन अधिक प्रिय था। इसलिए प्रभु के भोग में माखन को शामिल करने का विशेष महत्व है। बचपन के दौरान भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों के घर जाकर माखन और दही खाया करते थे। इसी वजह से लड्डू गोपाल को माखन चोर के नाम से पुकारा जाता है।

गोपियां भगवान श्रीकृष्ण से माखन और दही को बचाने के लिए मटकी को ऊंचे स्थान पर लटकाने लगीं, लेकिन इसके बाद भी भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं की मदद से माखन और दही चुराकर खाया करते थे। इसी लीला से दही हांडी उत्सव की परंपरा की शुरुआत हुई। इस उत्सव को हर साल धूमधाम के साथ मनाया जाता है। श्रीकृष्ण की इस बाल लीला का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में मिलता है। 

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कैसे मनाया जाता है दही हांडी उत्सव?

जन्माष्टमी के अगले दिन मिट्टी की मटकी में दही और माखन भरकर उसे काफी ऊंचाई पर लटकाया जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियां एक मानव पिरामिड बनाती हैं और पिरामिड के सबसे ऊपर पहुंचकर हांडी को तोड़ा जाता है। मटकी फूटते ही उसमें रखा दही और माखन नीचे खड़े गोविंदाओं पर गिरता है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इस दौरान ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं और श्रीकृष्ण के भजन चलाए जाते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।