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बार-बार मेहनत के बाद भी सफलता न मिले तो क्या करें? गीता में बताए श्री कृष्ण के ये संदेश दिखाएंगे नई दिशा

Updated: Mon, 17 Aug 2026 07:53 PM (IST)

मेहनत के बाद भी सफलता न मिलने पर भगवत गीता के उपदेश जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। श्री कृष्ण के कर्म, समत्व भाव और अहंकार त्याग के संदेश निराशा में भी आशा जगाते हैं।

बार-बार असफलता से निराश न हों, गीता के ये संदेश बदल देंगे जीवन (Picture Credit: AI Generated)

बार-बार असफलता से निराश न हों, गीता के ये संदेश बदल देंगे जीवन (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवत गीता के कई ऐसे संदेश हैं जो आपके जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। कई बार हमें ऐसा लगता है कि हमारी मेहनत के बाद भी सफलता हासिल नहीं हो रही है। क्या ईश्वर हमसे नाराज हैं? क्या हमारा जीवन व्यर्थ है? क्या अब जीवन में कभी भी अच्छा समय नहीं आएगा?

ऐसे न जाने कितने सवाल अनायास ही हमारे मन में आते हैं और हमारा आत्मविश्वास टूटने लगता है। यही नहीं जीवन का उद्देश्य ही समाप्त होता दिखाई देता है। ऐसे में मन से टूटने के बजाय आपको ईश्वर का ध्यान करते हुए भगवत गीता के कुछ उपदेशों को याद करना चाहिए।

गीता हमें सिखाती है कि कैसे कठिन परिस्थितियां जीवन का अंत न होकर हमें और ज्यादा मजबूत बनाती हैं और एक नई  शुरुआत का संकेत देती हैं। अगर आपको भी जीवन में बार-बार निराशा हो रही है तो आप गीता के कुछ श्लोकों का स्मरण जरूर करें।

कर्म करो फल की इच्छा मत करो

भगवान श्री कृष्ण ने भगवत गीता के अध्याय दो 47 श्लोक में कहा है कि-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

इस श्लोक का एक सरल अर्थ है- हे अर्जुन तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है उसके फल पर कभी नहीं है। इसलिए कर्म के फल को ही अपना उद्देश्य मत बनाओ और फल की चिंता करके अपने कर्तव्य से पीछे भी मत हटो।

यह श्लोक हमें इस बात की शिक्षा देता है कि व्यक्ति को हमेशा अपने कर्म पर ध्यान देने की जरूरत होती है। हम सभी पूरी मेहनत करते हैं, लेकिन जब परिणाम हमारी इच्छा के अनुसार नहीं आता है तो हम निराश हो जाते हैं।

यही नहीं हमें ऐसा भी लगने लगता है कि हमारी मेहनत बेकार हो गई, लेकिन भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि यदि तुमने अपना कर्म पूरी ईमानदारी, पूरी निष्ठा और पूरे मन से किया है तो वह कभी व्यर्थ नहीं जाता है और उसका फल अवश्य ही कभी न कभी मिलेगा।

सफलता और असफलता में समान भाव रखें

भगवान श्री कृष्ण भगवत गीता के अध्याय दो के 48 श्लोक में कहते हैं-

'योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते'॥

इसका अर्थ यह हुआ कि- हे अर्जुन अपने मन को स्थिर रखते हुए आसक्ति का त्याग करके अपना कर्तव्य करो सफलता और असफलता दोनों में समान भाव रखो यही समत्व योग कहलाता है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण मनुष्य जीवन का एक बहुत बड़ा रहस्य बताते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि सफलता हमें खुशी देगी और असफलता दुख देगी, लेकिन श्री कृष्ण कहते हैं कि यदि हमारी खुशी केवल सफलता पर और हमारा दुख केवल असफलता पर निर्भर करेगा, तो हमारा मन कभी भी स्थिर नहीं रह पाएगा।

जो व्यक्ति केवल जीत में खुश होता है और हार में पूरी तरह टूट जाता है, उसका मन हमेशा परिस्थितियों का गुलाम बना रहता है और उसे कभी जीवन में सफलता नहीं मिलती है। इसलिए जीवन में सफलता मिले या असफलता आपको समान भाव रखते हुए सबकुछ ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।

अहंकार को छोड़कर मेरी शरण में आओ

भगवान श्री कृष्ण ने गीता के 18 वे अध्याय के 66 वे श्लोक में कहा है कि-

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

इस श्लोक का अर्थ यह है कि- हे अर्जुन सब प्रकार की चिंताओं और अहंकार को छोड़कर मेरी शरण में आओ मैं तुम्हें सभी पापों और भय से मुक्त कर दूंगा। जो हुआ है उसका शोक मत करो। यह संदेश भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन को देते हैं और वर्तमान समय में यह आम लोगों के लिए प्रासंगिक है।

जब जीवन में ऐसी परिस्थितियां आ जाएं जहां आपको सभी रास्ते बंद दिखाई दें। उस समय ईश्वर पर भरोसा रखो यही नहीं ऐसी स्थिति में सभी चिंताओं और घमंड को छोड़कर मेरी यानी ईश्वर की शरण में आओ। जल्द ही आपको किसी भी कठिनाई से बाहर आने में मदद मिलेगी और सफलता हासिल होगी।

अगर आपके जीवन में भी बार-बार यह समय आता है जब आपको जीवन व्यर्थ लगता है और आपकी लाख कोशिशों के बाद भी सफलता नहीं मिलती है तब आप गीता में बताई इन बातों पर अमल करके जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।