सिर्फ वेदों के रक्षक नहीं, ज्ञान के देवता हैं हयग्रीव; जानें क्यों खास है उनका स्वरूप
राक्षसों द्वारा वेद चुरा लिए जाने पर भगवान विष्णु ने हयग्रीव का रूप धरकर उनसे युद्ध कर वेदों को संरक्षित किया था। हयग्रीव जयंती (27 अगस्त) ज्ञान और वेद-वाणी के संरक्षण का स्मरण कराती है
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ज्ञान के देवता हयग्रीव: वेदों के संरक्षक और विवेक के प्रेरक स्वरूप
पं. जगजीतन पांडेय (महामंत्री, धर्म संघ शिक्षा मंडल, वाराणसी)। अंधकार का सबसे भयावह रूप वह नहीं, जिसमें आंखें कुछ देख न सकें, उससे भी अधिक भयावह वह अंधकार है, जिसमें मनुष्य देखना, समझना और सत्य-असत्य के बीच भेद करना ही भूल जाए। ज्ञान का लोप केवल पुस्तकों का लोप नहीं होता, वह विवेक के क्षय की भूमिका भी बनता है। भारतीय ज्ञान परंपरा ज्ञान को केवल सूचना-संग्रह नहीं मानती, वह मनुष्य की चेतना का आलोक है। इसीलिए वेदों की रक्षा का अर्थ केवल कुछ ग्रंथों को बचा लेना नहीं, उस ज्ञान-परंपरा की रक्षा करना है, जो मनुष्य को उसके कर्तव्य, धर्म और आत्मस्वरूप का बोध कराती है। भगवान हयग्रीव इसी ज्ञान-संरक्षण की विराट अवधारणा के दिव्य प्रतीक हैं।
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाई जाने वाली हयग्रीव जयंती पर हयग्रीव की आराधना ज्ञान और वेद-वाणी के संरक्षण का स्मरण कराती है। इसी तिथि को रक्षाबंधन भी मनाया जाता है। रक्षा का अर्थ केवल शरीर, संबंध, बाहरी अस्तित्व की रक्षा ही नहीं, ज्ञान, संस्कृति और मनुष्य के विवेकशील चेतना की रक्षा भी है, जो भगवान हयग्रीव ने की।
हयग्रीव भगवान विष्णु का अश्वमुख रूप हैं। संस्कृत में ‘हय’ का अर्थ अश्व और ‘ग्रीव’ का संबंध ग्रीवा अथवा मुख से है। वैष्णव परंपरा में उनका स्वरूप ज्ञान, विद्या और वेदों के अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित है। श्री वेदांतदेशिक अपने हयग्रीवस्तोत्र में "ज्ञानानंदमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम्। आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे॥" कहते हुए वंदना करते हैं। अर्थात हम उन भगवान हयग्रीव की उपासना करते हैं, जो ज्ञान और आनंदस्वरूप, निर्मल स्फटिक के समान प्रकाशमान तथा समस्त विद्याओं के आधार हैं। ज्ञान और आनंद का एक साथ उल्लेख भारतीय अध्यात्म की उस दृष्टि को उद्घाटित करता है, जिसमें वास्तविक ज्ञान मनुष्य को अहंकार और अशांति की ओर नहीं, आंतरिक निर्मलता की ओर ले जाता है। जानकारी बढ़ जाना ज्ञान नहीं है। ज्ञान वह है, जो दृष्टि को विस्तृत करे, विवेक को जाग्रत करे और जीवन को अधिक उत्तरदायी बनाए। हयग्रीव को केवल एक विशिष्ट अवतार-रूप में नहीं, छंदोमय और वैदिक वाणी से संबद्ध दिव्य सत्ता के रूप में देखा गया है।
प्रचलित कथाओं में हयग्रीव से संबंधित प्रमुख भाव वेदों के रक्षण और पुनःप्राप्ति का है। महाभारत के शांतिपर्व में भी नारायण के अश्वशिरा स्वरूप द्वारा मधु-कैटभ का संहार कर वेदों को ब्रह्मा को पुनः प्रदान करने का वर्णन मिलता है। यह कथा ज्ञान के प्रति भारतीय समाज की निष्ठा को व्यक्त करती है। श्रीमद्भागवत महापुराण में ब्रह्मा भगवान के हयशिरा स्वरूप का स्मरण करते हैं-सत्रे ममास भगवान् हयशीरषाथो साक्षात् स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः। हयग्रीव केवल युद्ध करने वाले देवस्वरूप नहीं हैं। वे वाणी, छंद, यज्ञ और देवत्व की व्यापक ज्ञान-चेतना से संबद्ध हैं। उनके रूप में ज्ञान सृजनशील भी है और रक्षक भी। ज्ञान की रक्षा का अर्थ उसे तिजोरी में बंद कर देना नहीं, उसे जीवित रखना, समझना और पीढ़ियों तक संप्रेषित करना है। कोई भी समाज केवल भौतिक संसाधनों से दीर्घजीवी नहीं होता।
उसकी वास्तविक शक्ति उसकी स्मृति, ज्ञान-परंपरा और प्रश्न करने की क्षमता में निहित होती है। जब ज्ञान विकृत होता है, तब समाज का विवेक भी भ्रमित होने लगता है। विद्या का अंतिम प्रयोजन मनुष्य की दृष्टि को विस्तृत करना है। वह बाह्य जगत का परिचय तो देती ही है, साथ ही भीतर के अज्ञान, मोह और भ्रम को भी पहचानने की क्षमता प्रदान करती है। बोध का आग्रह केवल अधिक जानने का आग्रह नहीं, यथार्थ को अधिक स्पष्ट रूप से देखने की साधना है। हयग्रीवोपनिषद् कहता है- सर्ववेदमयाचिन्त्य सर्वं बोधय बोधय॥ यह हयग्रीव भगवान को 'विद्याराज' की संज्ञा देता है।
बहुत कुछ जान लेना और सही को समझ लेना अलग बातें हैं। असंख्य शब्दों के बीच सत्य की पहचान, मतों की भीड़ में विवेक का संरक्षण और आकर्षक असत्य के सामने प्रमाण के प्रति निष्ठा, ये आधुनिक युग के अपने ज्ञान-रक्षण हैं। भगवान हयग्रीव की लीला यह बताती है कि ज्ञान को केवल अर्जित नहीं करना चाहिए। उसे शुद्ध, जीवंत और लोकहितकारी बनाए रखना भी आवश्यक है। ज्ञान केवल संग्रह की वस्तु नहीं। उसे विस्मृति, विकृति और विनाश से बचाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। ज्ञान का अभाव केवल अज्ञान नहीं उत्पन्न करता, वह मनुष्य को उसके अपने बौद्धिक और नैतिक आधार से भी विच्छिन्न करता है।
