हर वक्त बेचैन रहते हैं तो सिर्फ ध्यान नहीं, अपने व्यवहार में भी करने होंगे ये बदलाव
सांसारिक जीवन में साधन भी आवश्यक हैं और साधना भी। आध्यात्मिक जीवन की साधना हमारे भीतर आंतरिक परिवर्तन लाती है ...और पढ़ें
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ब्रह्मा कुमारी शिवानी: तनावमुक्त जीवन के लिए ध्यान के साथ व्यवहारिक आध्यात्मिकता
HighLights
आंतरिक बदलाव और आध्यात्मिक मूल्यों को व्यवहार में अपनाना जरूरी
केवल ध्यान नहीं, शुद्ध विचार और कर्म भी महत्वपूर्ण हैं
ईमानदारी और नैतिकता से ही सच्ची सुख-शांति मिलती है
ब्रह्मा कुमारी शिवानी, प्रेरक वक्ता। आज ऐसा कोई परिवार बड़ी मुश्किल मिलता है, जिसमें सभी सुखी, स्वस्थ और आनंद से रहते हो। क्योंकि यह दुख, अशांति, तनाव व निराशा से भरा समय है। इसे कलियुग कहा जाता है। वास्तव में हम कलियुग में हैं इसलिए दुखी नहीं है, बल्कि सच यह है कि हम दुखी हैं, इसलिए कलियुग में है। अगर हमें अपनी स्थिति में सुधार लाना है तो हमें अपनी विश्वास प्रणाली से बाहर आना होगा। हमें अपने निजी चुनाव इस आधार पर करने होंगे कि हम जीवन में क्या चाहते हैं। अगर प्रसन्नता, अच्छी सेहत और सुंदर संबंध हमारी प्राथमिकता में हैं, तो हमें इन सबका निरंतर ध्यान रखना होगा। हमें बाहरी सुविधाओं का त्याग करने की आवश्यकता नहीं है, हमें अपने भीतर से बदलाव लाना है।
कुछ लोगों का मानना है कि मोबाइल फोन और इंटरनेट जैसी सुविधाएं तनाव की वजह हैं, परंतु वे तो सुविधा का माध्यम हैं। एक मोबाइल फोन अपने आप में तनाव की वजह नहीं है। यह तब समस्या बनता है, जब हम इसका दुरुपयोग करते हैं। आध्यात्मिकता हमें सिखाती है, 'साधन भी इस्तेमाल करो, साथ में साधना भी करो।' अर्थात हमें सभी सुख-सुविधाओं का आनंद लेना चाहिए, परंतु अपने आंतरिक संसार का त्याग नहीं करना चाहिए। इस आंतरिक बदलाव की यात्रा पर हम अकेले हो सकते हैं, चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, परंतु अगर हमारी पहल सही हुई, तो हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ेगी।
अगर हमारे तरीके सही नहीं हुए तो हमारे आत्मा की शक्ति घटती जाएगी। ईश्वर हमें सिखाते हैं, 'सत्य की नाव हिलती है, डोलती है, लेकिन कभी डूबती नहीं'। हमें सदा सच के रास्ते पर चलना चाहिए। अपने मूल्यों का पालन करना चाहिए, ताकि हमारी संकल्प शक्ति बढ़ती रहे। हमें न केवल आर्थिक मामले में, बल्कि लोगों से पेश आते हुए भी मूल्यों का साथ देना चाहिए और हमेशा दूसरों से विशुद्ध ऊर्जा के साथ मेलजोल रखना चाहिए।
अगर हम दूसरों की बेचैनी या अशांति का कारण बनते हैं तो कोई दवा, लत या तकनीक हमें सच्ची सुख-शांति की अनुभूति नहीं करा सकते है, क्योंकि व्यावहारिक जीवन व आध्यात्मिकता साथ-साथ चलते हैं। अगर मैं ध्यान का अभ्यास करती हूं और लोगों से गुस्से से पेश आती हूं तो मैं वैसे ही भारी ऊर्जा पैदा करूंगी और पूरे दिन में, बदले में वही मेरे पास लौटकर आएगी। अगर मैं अगली सुबह ध्यान करना चाहूं तो भी सफल नहीं हो सकती। दूसरों पर चिल्लाने वाला अगले दिन सही तरह से ध्यान नहीं कर सकता। यही वजह है कि हमें ध्यान के माध्यम से अपने आध्यात्मिक कल्याण करने के साथ-साथ, अच्छे कर्मों के माध्यम से व्यावहारिक संतुलन व समरसता भी साधना होगा।
ध्यान करना उस परम सत्ता परमात्मा से अपना आत्मिक नाता जोड़ना और सकारात्मक शक्तियों से भरपूर होना है। हमें उस परम शक्ति से संपर्क साधना सीखना होगा। उनकी पवित्र ऊर्जा हमारे भीतर प्रवाहित होकर हमें भरपूर करेगी। परंतु अगर हमारा मन सारा दिन नकारात्मक सोच और कर्मों में लिप्त होगा, तो हमारे अंदर वह रूहानी शक्ति नहीं भरेगी, जो हमें तनावमुक्त, सुखी, समृद्ध व सफल जीवन के लिए आवश्यक है। हमें रूहानी ऊर्जा के रिसाव को अर्थात व्यर्थ अनावश्यक संकल्पों के प्रवाह पर निगरानी रखनी होगी और उसे समाप्त करना होगा।
इस व्यर्थ सोच-विचार की नकारात्मक ऊर्जा को रोकने का एक ही उपाय है कि हम अपने व्यवसाय या काम को पूरी ईमानदारी और नैतिकता के साथ करें। अगर हम ईमानदारी नहीं रखते हैं तो इसका अर्थ हुआ कि आध्यात्मिकता हमारी जीवन शैली का अंग नहीं बनी है। अगर हम सकारात्मक ऊर्जा का रिचार्ज करने के बजाय उसका डिस्चार्ज अधिक करते रहे तो हमारे पास ऊर्जा का संग्रह नहीं रहेगा। आध्यात्मिकता का व्यावहारिक जीवन से गहरा नाता है। वह हमारे लिए तभी कारगर होगी, जब हम न केवल ध्यान के समय, बल्कि सारा दिन स्वयं को चार्ज कर सकें, अपनी ऊर्जा में बढ़ोतरी कर सकें।
जब हम किसी ध्यान शिविर या पूजा स्थल जाते हैं या किसी संत महात्मा से मिलते हैं तो हमें अच्छा लगता है। परंतु ऐसा कब तक होता है? जब हम घर वापस जाते हैं तो हम फिर से वही व्यक्ति हो जाते हैं। अगर हम अपने दैनिक जीवन में उन्हीं स्पंदनों को प्रकट नहीं करते, जिन्हें हम आध्यात्मिक तल पर अनुभव करते हैं, तो हमारी शांति और प्रसन्नता का अनुभव अस्थायी हो जाता है। फिर हम तभी बेहतर महसूस कर सकेंगे, जब हम किसी सकारात्मक संगति में या किसी अच्छे स्थान पर होंगे।
ध्यान का मतलब यह नहीं है कि आप केवल ध्यान करते हुए ही शांत और अच्छा महसूस करें। आपको इस दौरान आध्यात्मिक शक्ति का संग्रह भी करना है, ताकि उसे दिन में अपने कामों के समय उपयोग किया जा सके, ताकि हम हमेशा शांतचित्त रहें। अगर हम मोबाइल पर उतनी देर तक बात कर सकें, जितनी देर तक वह चार्जिंग पर लगा है, तो उसका कोई लाभ नहीं है। हम सारा दिन चार्जर के पास नहीं बैठ सकते। ठीक इसी तरह, हम हमेशा ध्यान नहीं कर सकते। ध्यान की केवल वही विधि उपयुक्त है, जो हमें शेष दिन के लिए भी सशक्त बना सके। अगर हम केवल डाक्टर के संपर्क में रहने तक ही सेहतमंद रहें, तो ऐसे उपचार से क्या लाभ?
हर रोज सुबह ध्यान और आध्यात्मिक नियमों का पालन हमें सशक्त बनाता हैं। इससे हमे ऐसे साधन मिलते हैं, जिन्हें दिन में हम अपने प्रत्येक विचार, शब्द व कर्म में प्रयुक्त कर सकते हैं, फिर चाहे वह हमारा निजी जीवन हो या फिर व्यावसायिक। जब हम शुद्ध विचार और कर्म उत्पन्न करते हैं, तो इससे हमारी आत्मा की शक्ति बढ़ती है। और यह दैनिक अभ्यास हमें स्थिर रखता है। संकट के समय में भी हम अपने भावों के मालिक बने रहते हैं। इसलिए सदैव अच्छा सोचें, सबके कल्याण का सोचें, सभी को दुआएं दें, क्योंकि जो हम संकल्प करते हैं, वह तरंगित होकर दूसरों तक पहुंचते हैं। हम पुरानी बातों को क्षमा करें और भूल जाएं। उन्हें गांठ बांधकर न रखें। यही आंतरिक परिवर्तन की यात्रा है।
