दुख की सबसे बड़ी वजह क्या है? भगवान दत्तात्रेय की शिष्या पिंगला से सीखें ये बात
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के समक्ष वर्णन किया ...और पढ़ें
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भगवान दत्तात्रेय और पिंगला की शिक्षा: सांसारिक आशाओं से मुक्ति का सूत्र
HighLights
पिंगला ने जाना सांसारिक आशाएं दुख का मूल कारण
बाहरी वस्तुओं से सुख की अपेक्षा अशांति बढ़ाती है
वैराग्य और भगवत्प्रेम से मिलती है परम शांति
आचार्य नारायण दास (महंत, श्रीभरतमिलाप आश्रम, मायाकुंड, ऋषिकेश)। अपने 17वें गुरु के रूप में भगवान दत्तात्रेय ने पिंगला नामक गणिका से जो शिक्षा ग्रहण की, वह आज के युग में भी तनाव का शमन कर आंतरिक शांति के सूत्र प्रदान करती है। भगवान दत्तात्रेय महाराज यदु को उपदेशित करते हैं-
पिंगला नाम वेश्याऽसीद् विदेहनगरे पुरा।
तस्या मे शिक्षितं किंचिन्निबोध नृपनंदन।।
हे राजन! विदेह नगरी में पिंगला नाम की एक गणिका रहती थी। एक रात्रि वह सुंदर वस्त्राभूषणों से सजकर अपने भवन के द्वार पर बैठी किसी व्यसनी धनवान पुरुष की प्रतीक्षा कर रही थी। उसके मन में यह आशा थी कि कोई विषयी ग्राहक आएगा और उस पर विमोहित होकर उसे पर्याप्त धन देगा। अनेक लोग मार्ग से आए और चले गए, किंतु उसकी कामना पूरी नहीं हुई। रात्रि का अधिकांश भाग इसी आशा, व्याकुलता और मानसिक संताप में बीत गया। हमारी अधिकांश मानसिक व्यथाओं का मूल कारण वस्तु या व्यक्ति नहीं, बल्कि उनसे बांधी गई हमारी अनुचित आशा होती है। जब-जब हम सुख का केंद्र किसी बाह्य घटक को बनाते हैं, तब-तब पराधीनता और संताप हमें जकड़ लेता है।
हे राजन! जब सांसारिक आशाएं बार-बार विखंडित होती हैं, तब घोर पश्चाताप और दुख के गहन क्षणों से कभी-कभी व्यक्ति में स्वतः 'विवेक' का उदय होता है। पिंगला के अंतःकरण में सहसा यह विचार जागा- ‘मैं कितनी अज्ञानी हूं! जिस क्षणभंगुर देह और नश्वर मनुष्य से सुख की आशा कर रही हूं, वह और मैं वास्तव में परिवर्तनशील और क्षणभंगुर हैं। यदि यही प्रतीक्षा, यही एकाग्रता और ऐसा ही जागरण मैंने परम पुरुष श्रीहरि के प्रेम के लिए किया होता, तो मुझे शाश्वत सुख और परम पद प्राप्त हो जाता।’ उसके भीतर का सुप्त वैराग्य जाग उठा। उसने अनुभव किया कि संसार से जुड़ी हुई आशा ही उसके समस्त दुखों का मूल है।
आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।
यथा संछिद्य कांताशां प्राप स्वापं गृहे ह्यसौ॥
हे राजन! सांसारिक आशा परम दुख का कारण है और उस व्यर्थ आशा से निवृत्ति ही परम सुख का द्वार है। पिंगला ने कामी पुरुष से मिलने की आशा त्याग दी और उसी क्षण उसे ऐसी असीम शांति मिली, जो उसे इस नश्वर संसार के किसी भी आकर्षण से कभी प्राप्त नहीं हुई थी। उसने अपने अज्ञान को पहचान लिया तथा चिंतन करने लगी-
अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मनः।
या कांतादसतः कामं कामये येन बालिशा॥
अहो! मेरे मोह का विस्तार तो देखो! मैं अजितेंद्रिय और अज्ञानी होकर उस असत् व नश्वर पुरुष से सुख की कामना करती रही, जो स्वयं स्थायी सुख को न पाने और न ही देने में समर्थ है। मुझ मोहावृत्त को धिक्कार है!’ पिंगला के इस प्रसंग से भगवान दत्तात्रेय महाभाग ने महाराज यदु के माध्यम से संपूर्ण मानव को जीवन-दर्शन और प्रबंधन के सूत्र दिए हैं। मनुष्य जितना अधिक बाह्य वस्तुओं, परिस्थितियों और व्यक्तियों से सुख की आशा करता है, उसकी अशांति और निराशा उतनी ही बढ़ती जाती है। धन, संपत्ति और विषय-भोग पांचभौतिक शरीर को केवल क्षणिक सुविधाएं दे सकते हैं, परम शांति नहीं। धन साधन हो सकता है, परंतु जीवन का साध्य अर्थात परमलक्ष्य केवल आत्म-विकास और परमात्मात्वानुभूति है।
मानव शरीर क्षणिक वासनाओं और भोगों में नष्ट करने के लिए नहीं मिला है, अपितु विवेक के जागरण, आत्म-साक्षात्कार और भगवत्प्राप्ति के लिए प्राप्त हुआ है। सांसारिक आकर्षणों से प्राप्त निराशा मनुष्य को जीवन के यथार्थ का बोध कराती है। यही निराशा जब वैराग्य का रूप धारण करती है, तो मन बाह्य भटकाव को छोड़कर अंतरंग परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाता है।
अतः हे राजन! मैंने पिंगला के आत्मग्लानि से विषयविमुख होने की इस घटना से यह शिक्षा ग्रहण की है कि संसार के नश्वर विषय-भोग पतन के हेतु हैं, जबकि भगवत्प्रेम और अनासक्ति ही मनुष्य के कल्याण का चरमोत्कर्ष है।
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