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स्मार्टफोन बताएगा तस्वीर असली है या AI से बनी, फेक इमेज की पहचान करना होगा आसान

Updated: Mon, 24 Aug 2026 06:47 PM (GMT+05:30)

स्मार्टफोन और कैमरा कंपनियां एआई-जनित फेक तस्वीरों की पहचान के लिए तकनीक विकसित कर रही हैं, जिसमें गूगल और आईफोन भी शामिल हैं।

स्मार्टफोन बताएगा तस्वीर असली है या एआई से बनी (Image AI Generated)

स्मार्टफोन बताएगा तस्वीर असली है या एआई से बनी (Image AI Generated)

HighLights

  1. गूगल के बाद iPhone में भी आ सकता है फोटो की प्रामाणिकता जांचने का फीचर

  2. वेरिफाइड तस्वीर भी पूरी सच्चाई नहीं बताती, संदर्भ और स्रोत पर भरोसा जरूरी

द कन्वर्सेशन, मेलबर्न। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने तस्वीरें बनाने और उनमें बदलाव करने को इतना आसान बना दिया है कि अब असली और नकली तस्वीर में फर्क करना मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि AI से बनी फेक और डीपफेक तस्वीरों के बढ़ते इस्तेमाल ने तकनीकी कंपनियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। इससे निपटने के लिए अब स्मार्टफोन और कैमरा कंपनियां ऐसी तकनीक पर काम कर रही हैं, जो तस्वीर के स्रोत और उसके बनाए जाने की जानकारी को सुरक्षित रख सके।

गूगल ने 2025 में अपने कुछ स्मार्टफोन कैमरों में कंटेंट ऑथेंटिसिटी से जुड़ा सॉफ्टवेयर देना शुरू किया। यह सी2पीए (कोएलिशन फॉर कंटेंट प्रोवेनेंस एंड ऑथेंटिसिटी) जैसे तकनीकी मानक पर आधारित है। निकोन, सोनी और कैनन जैसे कैमरा निर्माता भी इसी तरह की तकनीक अपना रहे हैं। इसका मकसद तस्वीर के साथ उसकी उत्पत्ति और उससे जुड़ी जानकारी को दर्ज करना है, ताकि बाद में यह जांचा जा सके कि तस्वीर कहां और किस डिवाइस से बनाई गई थी।

एपल भी इसी दिशा में आगे बढ़ सकता है। खबरों के मुताबिक, कंपनी के अगले ऑपरेटिंग सिस्टम में 'रेफरेंस इमेज' जैसा फीचर आ सकता है। इसके जरिए तस्वीर के साथ उससे जुड़ा मेटाडाटा सुरक्षित रखा जा सकेगा और उसकी प्रामाणिकता की जांच संभव होगी। तस्वीर को एक यूनिक आइडी भी मिल सकती है, जिससे उसके बनाए जाने के समय और इस्तेमाल किए गए डिवाइस जैसी जानकारी हासिल की जा सकेगी।

लेकिन तकनीक की अपनी सीमाएं

इस तरह की व्यवस्था से AI जनित तस्वीरों की पहचान में मदद मिल सकती है, लेकिन इसे फेक तस्वीरों के खिलाफ पूरी तरह कारगर हथियार मानना जल्दबाजी होगी। मसलन, ऐसे फीचर डिफॉल्ट रूप से बंद हो सकते हैं और यूजर को इन्हें खुद चालू करना पड़ सकता है। इसके अलावा, पहले से खींची गई तस्वीरों पर यह सुविधा लागू नहीं होगी। यूजर को तस्वीर लेते समय ही तय करना होगा कि उसे भविष्य में उसकी प्रामाणिकता साबित करने की जरूरत पड़ सकती है या नहीं।

सबसे बड़ी बात यह है कि वेरिफाइड तस्वीर भी अपने आप में पूरी सच्चाई की गारंटी नहीं है। कैमरा किस कोण से तस्वीर ले रहा है, तस्वीर लेने वाला व्यक्ति ऑब्जेक्ट से कितनी दूरी पर है और तस्वीर के समय वहां क्या परिस्थितियां थीं, इन सबका असर तस्वीर से निकलने वाले अर्थ पर पड़ सकता है। कोई वास्तविक तस्वीर भी अधूरे संदर्भ में लोगों को गुमराह कर सकती है।

इसलिए किसी तस्वीर पर 'वेरिफाइड' का निशान देखकर उसे पूरी तरह सच मान लेना ठीक नहीं होगा। इसी तरह किसी तस्वीर पर ऐसा निशान न होने का मतलब यह भी नहीं कि वह नकली है। तकनीक तस्वीर के स्रोत और उसकी यात्रा के बारे में महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है, लेकिन तस्वीर की पूरी कहानी नहीं बता सकती।

आखिरकार AI के दौर में तस्वीरों पर भरोसा करने के लिए तकनीक के साथ इंसानी समझ भी जरूरी होगी। तस्वीर कहां से आई है, उसे किसने साझा किया है और उस स्रोत पर कितना भरोसा किया जा सकता है—इन सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कंटेंट की प्रामाणिकता साबित करने वाली तकनीक इस समस्या का महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है, लेकिन अकेले इसके सहारे AI के दुरुपयोग को रोकना मुश्किल होगा।

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