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'सड़क हादसे में घायल को इलाज से मना नहीं कर सकते अस्पताल', हाईकोर्ट ने 25 साल पुराने मामले में सरकार से मांगा जवाब

Published: Sat, 26 Sep 2026 05:29 AM (IST)Updated: Sat, 26 Sep 2026 06:57 AM (IST)

लखनऊ हाई कोर्ट ने कहा कि सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा सुविधा देना अस्पताल और डॉक्टर की ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. अस्पताल सड़क हादसे में घायल को तत्काल इलाज दें।

  2. मेडिको-लीगल औपचारिकताओं के कारण इलाज में देरी न हो।

  3. हाई कोर्ट ने सरकार से अनुपालन व निगरानी की रिपोर्ट मांगी।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कहा कि सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना अस्पताल और चिकित्सक की जिम्मेदारी है। दुर्घटना के मामले में मेडिको-लीगल औपचारिकताओं या पुलिस कार्रवाई का हवाला देकर इलाज से इनकार अथवा उसमें देरी नहीं की जा सकती।

राज्य सरकार को अस्पतालों में इस व्यवस्था के अनुपालन और उसकी निगरानी से संबंधित विस्तृत जानकारी देने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की पीठ ने अंजू प्रकाश श्रीवास्तव की वर्ष 2000 में दाखिल जनहित याचिका पर यह आदेश दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को 10 दिन में जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा है। 25 वर्षों से जवाब दाखिल नहीं होने पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को 25 हजार रुपये हर्जाना देने का भी निर्देश दिया।

मामले की अगली सुनवाई एक अक्टूबर को होगी। हाई कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक चिकित्सक का सर्वोच्च दायित्व जीवन की रक्षा करना है। सरकारी या निजी अस्पताल में कार्यरत चिकित्सक को दुर्घटना में घायल व्यक्ति को तत्काल उपचार उपलब्ध कराना चाहिए। किसी कानूनी प्रक्रिया या औपचारिकता के कारण इस जिम्मेदारी में देरी नहीं होनी चाहिए। सरकार को अस्पतालों में व्यवस्था के व्यापक प्रचार और प्रभावी अनुपालन की जानकारी भी देनी होगी।

सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को इन निर्देशों का पालन करना है। याचिका के साथ वर्ष 2000 में लखनऊ के एक प्रमुख अस्पताल की तस्वीर भी दाखिल की गई थी। उसमें अस्पताल के बाहर मेडिको-लीगल मामलों, दुर्घटना और जलने के मामलों के मरीजों का उपचार नहीं किए जाने संबंधी सूचना प्रदर्शित थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2016 के सेव लाइफ फाउंडेशन मामले के फैसले और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के 12 मई 2015 के गुड समैरिटन दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया।

इन दिशा-निर्देशों के अनुसार आपात स्थिति में हादसे में घायल को उपचार देने से चिकित्सक का इन्कार पेशेवर कदाचार माना जा सकता है और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी बताने को कहा कि इन निर्देशों के अनुपालन की निगरानी के लिए क्या तंत्र बनाया गया है, अस्पतालों का निरीक्षण हुआ या नहीं, नियमों के उल्लंघन की शिकायत दर्ज कराने और उनके निस्तारण की क्या व्यवस्था है तथा जिलेवार कितनी शिकायतें प्राप्त हुई हैं।

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