विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यूपी में बुलडोजर पर सियासत का नया मोड़, रायबरेली में अखिलेश का स्वागत; मेरठ में बीजेपी अध्यक्ष ने बनाई दूरी

Published: Sat, 26 Sep 2026 01:39 AM (IST)

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में बुलडोजर अब भाजपा और सपा दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण सियासी प्रतीक बन गया ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. यूपी में बुलडोजर बना भाजपा-सपा की चुनावी राजनीति का प्रतीक।

  2. अखिलेश यादव ने 'वोट का बुलडोजर' का नया नारा दिया।

  3. भाजपा इसे कानून-व्यवस्था, सपा अत्याचार का प्रतीक बता रही।

दिलीप शर्मा, लखनऊ। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में भाजपा के पक्ष में मजबूत राजनीतिक प्रतीक के तौर पर पहचान बना चुका बुलडोजर अब सियासी संदेशों में समाजवादी पार्टी की रणनीति की नई राह पर भी दौड़ रहा है। बुलडोजर कार्रवाई पर लगातार सवाल उठाकर उसे पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) पर अत्याचार का प्रतीक साबित करने की कोशिश में जुटे सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने रायबरेली दौरे पर इसे नई दिशा दी। बुलडोजर से हुए स्वागत से अपनी बढ़त का माहौल बनाते हुए कहा कि अबकी बार ‘वोट का बुलडोजर’ चलेगा।

कुछ दिन पहले मेरठ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के स्वागत के लिए बुलडोजर खड़े किए गए थे, लेकिन वह वहां रुके नहीं और इस पर नाराजगी जताने की खबर सामने आई। हालांकि ऐसा नहीं कि बुलडोजर भाजपा की रणनीति से गायब है, परंतु वह फिलहाल इस प्रतीक से थोड़ी दूरी जरूर बनाए है।

21-22 सितंबर के दौरे में नितिन नवीन के लिए मेरठ के सिवाया टोल प्लाजा पर बुलडोजर खड़े किए गए थे। वह वहां नहीं रुके तो फिर आगे उनके स्वागत कार्यक्रमों में बुलडोजर दिखाई नहीं दिए। बताया गया कि उन्होंने बुलडोजर खड़े करने पर नाराजगी भी जताई। उनके इस रुख को मेरठ के सेंट्रल मार्केट प्रकरण का प्रभाव बताया गया। वहीं बुलडोजर कार्रवाई के मामले न्यायालयों में लगातार पहुंच रहे हैं और वहां से कई बार सरकार को निर्देश भी जारी हुए हैं।

हालांकि बुलडोजर से दूरी की भाजपा की अभी कोई आधिकारिक रणनीति सामने नहीं आई है। भाजपा ने वर्ष 2022 के चुनाव में बुलडोजर को अपराध और अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कार्रवाई व कानून-व्यवस्था के संदेश से जोड़ा था। ‘बुलडोजर बाबा’ जैसे नारों ने इसे नया रंग दिया था।

सपा उसी प्रतीक की दिशा बदलने की कोशिश कर रही है। बुलडोजर को सत्ता के कथित दुरुपयोग के प्रतीक के तौर पर पेश करने की कोशिश है। सपा प्रमुख कई आपराधिक घटनाओं को लेकर बुलडोजर न चलने के सवाल उठाते रहे हैं। इस बार सपा, भाजपा को उसके प्रमुख मुद्दों-प्रतीकों पर ही घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके तहत ही वह बुलडोजर को लेकर अपने आरोपों को चुनावी नैरेटिव में बदलना चाहती है।

इसीलिए बुलडोजर का स्वागत में उपयोग कर चुनौती दी जा रही है। वहीं भाजपा नेताओं के संबोधनों में बुलडोजर अभी भले ही गायब हो, परंतु माना जा रहा है कि वह अपने इस प्रमुख प्रतीक को नहीं छोड़ेगी। साफ है कि इस बार राजनीति का बुलडोजर दो राहों पर है और अभी चुनावी तस्वीरों में इसकी मौजूदगी रहेगी।

यह भी पढ़ें- 5 साल की नौकरी में करोड़ों की संपत्ति: घूसखोरी में पकड़े गए शामली के खनन अधिकारी पर कसा शिकंजा