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नेपाल में बाढ़ का कहर: सिल्ट में दब गई रोजी-रोटी, भुखमरी का सता रहा डर

Published: Sat, 05 Sep 2026 08:30 AM (IST)

नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में बाढ़ ने लोगों की आजीविका, व्यापार और कृषि भूमि को तबाह कर ...और पढ़ें

बाढ़ का पानी उतरने के बाद दुकान सहेजते बैरेनी बाजार के दुकानदार। जागरण

बाढ़ का पानी उतरने के बाद दुकान सहेजते बैरेनी बाजार के दुकानदार। जागरण

HighLights

  1. बाढ़ ने नेपाल में आजीविका और व्यापार तबाह किए।

  2. कृषि योग्य भूमि मलबे से पट गई, अनुपजाऊ हुई।

  3. स्थानीय लोग सरकारी मदद को नाकाफी बता रहे।

विश्वदीपक त्रिपाठी, महराजगंज। मलबे से पटा पेट्रोल पंप। काठमांडू-मुग्लिंन हाई-वे पर गल्छी गांव पालिका में स्थित इस पंप पर कभी वाहनों की लंबी कतार लगी रहती थी। अब इसे पहचानना मुश्किल है। चारों तरफ दो से तीन फीट तक सिल्ट जमा है। मशीनें रेत में दबी हैं। समीप में उदास बैठे हैं पंप मालिक दीपक कार्की। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि पंप के पुनः संचालन की प्रक्रिया कहां से शुरू करें। कहते हैं, ''इस बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया। उपजाऊ भूमि, घर और रोजी-रोटी का जरिया सब चला गया। परिवार का जीवन-यापन कैसे होगा, समझ में नहीं आ रहा है।''

दीपक कार्की का यह दर्द महज बानगी भर है। यह पीड़ा नेपाल के बाढ़ प्रभावित रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिले के हर चेहरे पर पढ़ी जा सकती है। बाढ़ ने सिर्फ घर नहीं, लोगों की पूरी आर्थिकी बदल दी है। बैरेनी कस्बे में सुनीता दहाल अपने मकान के सामने उदास बैठी हैं। एक ही भवन में दुकान और मकान दोनों था। नीचे बेकरी की दुकान, ऊपर परिवार का आशियाना। बाढ़ में भूतल पूरी तरह मलबे में डूब गया।

बेकरी की भट्ठी, फ्रिज, सामान सब सिल्ट में दब गए हैं। बाढ़ के बाद से वह गजुरी में अपनी बहन के यहां स्वजन के साथ रह रहीं हैं। जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की चिंता हुई तो घर पहुंचीं, पर घर अब घर नहीं रहा।

वह कहती हैं, ''इसी दुकान से घर-परिवार चलता था। बच्चे इसी से पढ़ते थे। अब सब तबाह हो गया है। बच्चों की परवरिश कैसे होगी, समझ नहीं आ रहा है।'' फिर अपनी बेकरी की तरफ देखती हैं। सिल्ट के बीच एक जला हुआ ट्रे दिखता है। उसे उठाते हुए कहती हैं, ''इसी में ब्रेड बनाती थी। अब फिर से शुरू करना होगा, पर कहां से करूं, पता नहीं।''

यही कहानी बैरेनी बाजार के हर घर की है। किसी की किराना दुकान थी, किसी की मोबाइल रिपेयरिंग, किसी की चाय की गुमटी। त्रिशूली महज 10 मिनट में सब बहा ले गई। अब दुकानों में जमा दो-दो फीट सिल्ट निकालना ही सबसे बड़ी चुनौती है। अकेले एक परिवार के बस की बात नहीं। यहां के लोग कहते हैं कि सरकारी मदद नाकाफी है। सिल्ट हटाने के लिए जेसीबी चाहिए, दुकान के लिए पूंजी चाहिए, जो नहीं है।

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गल्छी के होटल व्यवसायी रमेश गुरुंग बताते हैं कि हाई-वे बंद होने से पर्यटन भी ठप है। काठमांडू जाने वाले पर्यटक अब नहीं आ रहे। ऐसे में दोहरी मार पड़ रही है। श्री बागेश्वरी माध्यमिक विद्यालय बैरेनी के शिक्षक सूर्य प्रसाद निमाल कहते हैं कि इस बाढ़ ने रसुवा, धादिंग और नुवाकोट की स्थानीय अर्थव्यवस्था को 10 साल पीछे धकेल दिया है। कृषि भूमि पर तीन फीट तक बालू जमा है। भूमि दो-तीन साल तक उपजाऊ नहीं होगी। दुकानें तबाह हैं, हाई-वे क्षतिग्रस्त हैं। इन सभी को सही करने में समय लगेगा। बाढ़ का पानी उतर गया है, पर रोजी-रोटी का संकट अब शुरू हुआ है।

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