Krishna Janmashtami 2026: जन्मभूमि के साथ करें इन मंदिरों के दर्शन, लुभाती हैं कान्हा की लीलाएं
Krishna Janmashtami 2026 जन्माष्टमी के पावन पर्व पर मथुरा और वृंदावन के प्रमुख कृष्ण मंदिरों के दर्शन का महत्व बताया ...और पढ़ें

Krishna Janmashtami 2026 मथुरा के मंदिर।
HighLights
श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर 5253वां जन्मोत्सव भव्यता से मनाया जाएगा
बांकेबिहारी मंदिर में बालक रूप में ठाकुरजी की सेवा-पूजा होती है
प्रेम मंदिर में श्रीकृष्ण की मनमोहक ब्रजलीलाओं का जीवंत चित्रण है
डिजिटल डेस्क, मथुरा/आगरा। Krishna Janmashtami 2026 अजन्मे के जन्म महोत्सव का दर्शन, श्रवण और आयोजन परम् पुण्यप्रद है। भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के कारागार में जन्म लेकर न केवल वसुदेव-देवकी को बंधन मुक्त किया बल्कि उस काल में पृथ्वी पर फैले समस्त अत्याचारियों का अंत कर दिया। उनका अवतार दुष्टों का संहार, सज्नों का परित्राण, अधर्म का विनाश और धर्म का अभ्युत्थान करने के लिए हुआ था।
जन्माष्टमी का पर्व मथुरा के बिना अधूरा है। मथुरा का नाम आते ही याद आती है श्रीकृष्ण जन्मस्थान की। कंस कारागर में भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया और फिर पूरे ब्रज की धरा पर अपनी लीलाएं रची। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर अगर आप मथुरा आ रहे हैं तो इन मंदिरों के दर्शन भी जरूर करें। जहां आपको कान्हा द्वारा रची गई लीलाओं के दर्शन मंत्रमुग्ध कर देंगे। इस आर्टिकल के जरिए आपको बताते हैं वे कौन-कौन से मंदिर हैं जहां आप दर्शन कर सकते हैं।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि केशव देव मंदिर
मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर जन्माष्टमी का उल्लास देखते ही बनता है। यहां लाखों भक्त दर्शन करने आते हैं। इस बार यहां 5253वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा। इस बार ठाकुरजी का शृंगार, पोशाक, मंदिर की साज-सज्जा, व्यवस्थाएं नयनाभिराम व अभूतपूर्व होंगी। ठाकुरजी 'पंचरत्न' पोशाक धारण करेंगे। इसमें कामधेनु गाय, पाञ्चजन्य शंख, अमृत कलश, एरावत हाथी, कल्पवृक्ष को उकेरा गया है। रत्न-जड़ित मुकुट, बांसुरी, कंठा आदि शृंगार सामग्री ठाकुरजी धारण करेंगे। भगवती योगमायाजी दिव्य स्वर्ण मुकुट धारण करेंगी। कंस कारागार श्रीगर्भ-गृह को लगभग 200 किलो चांदी से सजाया जाएगा। इस बार नव निर्मित रजत-कमल में विराजमान श्रीगोपाल का जन्माभिषेक होगा।

बांकेबिहारी मंदिर वृंदावन
स्वामी हरिदास के लड़ैते ठाकुर बांकेबिहारीजी की आज भी सेवा पूजा बालक के रूप में होती है। संगीत सम्राट स्वामी हरिदास की संगीत साधना से प्रसन्न होकर ठाकुर बांकेबिहारी निधिवन राज मंदिर में प्रकटे थे। वृंदावन की कुंज गलियों में स्थित इस मंदिर में दर्शन के लिए रोजाना हजारों कृष्ण भक्त पहुंचते हैं। ठाकुरजी के दर्शन के बाद यहां की गलियों में बनी दुकानों से लोग पेड़े का प्रसाद लेते हैं और चाट-लस्सी का मजा लेते हैं। श्रीबांकेबिहारी मंदिर में ठाकुरजी का मुरली बजाते हुए का विग्रह है।

अनूठा है वृंदावन का प्रेम मंदिर
भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली श्रीवृंदावनधाम स्थित प्रेम मंदिर अत्यंत भव्य धार्मिक एवं आध्यात्मिक परिसर है। लगभग 30,000 टन इटैलियन संगमरमरों और विशेष कूका रोबोटिक मशीनों द्वारा नक्काशीकृत इस भव्य मंदिर के अधिष्ठात्र भगवान श्रीकृष्ण एवं अधिष्ठात्री देवी राधारानी हैं। लगभग 50 एकड़ भूमि में बना यह अद्वितीय मंदिर मनोरम बगीचों एवं फव्वारों से घिरा है, जहां शाम के वक्त लाइटिंग देखने का अहसास अत्यंत अद्भुत है। 1008 ब्रजलीलाओं के साथ ही भारतवर्ष की प्राचीन समृद्ध इतिहास को अत्यंत खूबसूरती के साथ उकेरा गया है। मंदिर के सामने लगभग 73,000 वर्ग फीट, मीनार-रहित तथा गुंबदनुमा बने यहां के सत्संग हॉल में लगभग 25,000 लोग एक साथ जमा हो सकते हैं।

प्रेम मंदिर में देखने को मिलती हैं कान्हा की लीलाएं
प्रेम मंदिर की बाहरी दीवारों पर श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वर्णित श्रीकृष्ण लीलाओं का जीवंत चित्रण मन को मोह लेता है। मंदिर के भूमितल की बाहरी दीवारों पर श्रीकृष्ण की मनमोहक ब्रजलीलाओं के दर्शन होते हैं। प्रथम तल की बाहरी दीवारों पर मथुरा एवं द्वारका की लीलाएं क्रमबद्ध रूप से चित्रित हैं। कुब्जा-उद्धार, कंस-वध, देवकी-वसुदेव की कारागृह से मुक्ति, सान्दीपनी मुनि के गुरुकुल में जाकर कृष्ण-बलराम का विद्याध्ययन, रुक्मिणी-हरण, सोलह हजार एक सौ आठ रानियों का वरण, नारद जी द्वारा श्रीकृष्ण की गृहस्थावस्था के दर्शन, श्रीकृष्ण का अपने अश्रुओं द्वारा सुदामा के चरण पखारना, सुदामा एवं उनके परिवार का एक रात्रि में काया-पलट, कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण का गोपियों से पुनर्मिलन, रुक्मिणी आदि द्वारिका की रानियों का श्रीराधा एवं गोपियों के साथ मिलन, श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव को अंतिम उपदेश एवं दर्शन तत्पश्चात स्वधाम-गमन आदि लीलाएं भी चित्रित की गई हैं।

मथुरा का द्वारिकाधीश मंदिर
मथुरा का द्वारिकाधीश मंदिर 1814 में सेठ गोकुल दास पारीख ने बनवाया था, जो ग्वालियर रियासत का खजांची थे। मथुरा के प्रमुख घाटों में एक विश्राम घाट के किनारे ये मंदिर है। भगवान कृष्ण को अक्सर ‘द्वारकाधीश’ या ‘द्वारका के राजा’ के नाम से पुकारा जाता था और उन्हीं के नाम पर इस मंदिर का नाम पड़ा है। इस मंदिर के निर्माण के लिए एक काजी और एक चतुर्वेदी की जमीन भी लेनी पड़ी थी। काजी को जमीन के बराबर चांदी के सिक्के और मोती और चतुर्वेदी से झोली फैलाकर जमीन दान में मांगी थी।
श्रीद्वारिकाधीश मंदिर के निर्माता गोकुलदास पारीख बड़ौदा राज्य के सीनौर ग्राम निवासी थे। वह द्वारिकाधीश प्रभु के अनन्य भक्त थे। श्रीधारिकाधीश प्रभु के अनुग्रह से ही ग्वालियर प्रवासकाल में सपने में दर्शन हुआ और अपार संपत्ति के साथ श्रीद्वारिकाधीश प्रभु राजधिराज का देव विग्रह प्राप्त हुआ। वह इस विग्रह को लेकर मथुरा आ गए। पहले इस विग्रह को वृंदावन के भतोरपा बगीचा पर रखा गया। इसके बाद जूना मंदिर प्रयागघाट पर रखा गया।
इस्कॉन मंदिर
वृंदावन स्थित इस्कॉन मंदिर श्रद्धालुओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है। श्रील प्रभुपाद, गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के ऐसे संत जिनका नाम दुनिया धर्म में सनातन धर्म की ध्वजा को स्थापित करने के लिए लिया जाता है। उन्होंने 14 बार विश्व भ्रमण कर दुनिया भर में 800 इस्कान मंदिर स्थापित किये। उनके हरे कृष्णा अभियान ने विदेशियों को सनातन संस्कृति से जोड़ा। उनके कदम जहां-जहां पड़े, वहां-वहां हरेरामा-हरेकृष्णा मंत्र गुंजायमान हो उठा। अभय चरण डे यानी अभय चरणाविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद को श्रील प्रभुपाद के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म कोलकाता में सितंबर 1896 में हुआ। उन्होंने 1959 में सन्यास लिया और वृंदावन में रहकर श्रीमदभागवत पुराण का अनेक खंड़ों में अंग्रेजी में अनुवाद किया। उन्होंने न्यूयार्क में इंटरनेशनल सोसाइटी फार कृष्णा कान्शियसनेस (इस्कान) की स्थापना की। 1966 से 1977 तक विश्वभर का 14 बार भ्रमण किया।

रंगजी मंदिर
वृंदावन में दक्षिण भारत की शैली में बना श्रीरंगजी मंदिर काफी प्राचीन है। यूपी के मथुरा में दक्षिण भारतीय परंपरा का रंगनाथ मंदिर उत्तर भारत का सबसे पहला दिव्यदेश है। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के मंदिरों के बीच रामानुज संप्रदाय की पताका फहरा रहे इस मंदिर के निर्माण का श्रेय श्रीरंगदेशिक स्वामी को जाता है। लेकिन मंदिर निर्माण में मथुरा के सेठ लक्ष्मीचंद और उनके भाइयों की भूमिका अहम रही है।

