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नीला ड्रम हत्याकांड: 64 दिन की पड़ताल और 22 लोगों की गवाही, मौत की दहलीज तक ऐसे पहुंचे साहिल-मुस्कान

Published: Wed, 14 Oct 2026 11:42 PM (GMT+05:30)Updated: Thu, 15 Oct 2026 01:58 AM (GMT+05:30)

सौरभ राजपूत हत्याकांड का मुकदमा 64 दिनों तक चला, जिसमें पुलिस ने बिना प्रत्यक्षदर्शी के साक्ष्यों और 22 गवाहों के ...और पढ़ें

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HighLights

  1. 64 दिन चला सौरभ राजपूत हत्याकांड का मुकदमा।

  2. पुलिस ने बिना प्रत्यक्षदर्शी के साक्ष्य जुटाए।

  3. नीला ड्रम और 22 गवाह बने अहम कड़ी।

जागरण संवाददाता, मेरठ। सौरभ राजपूत हत्याकांड का मुकदमा 64 दिन तक चला। पुलिस की विवेचना, साक्ष्यों का संकलन और गवाहों की अदालत में पेशी इस मुकदमे के अहम पड़ाव रहे। सौरभ की गुमशुदगी और उसकी हत्या की आशंका से शुरू हुई पुलिस की पड़ताल ने धीरे-धीरे उस खौफनाक वारदात की परतें खोलीं, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया।

मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था, इसलिए पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी हत्या का मकसद सामने लाना और घटनास्थल से लेकर आरोपितों की यात्रा तक की हर कड़ी को साक्ष्यों से जोड़ना।

पुलिस को जब सौरभ की गुमशुदगी और उसकी हत्या की आशंका की शिकायत भाई बबलू ने की थी। तब साहिल और मुस्कान फरार मिले। इसके बाद पुलिस ने उनकी वापसी का इंतजार किया। मुस्कान और साहिल के हिमाचल से घर लौटे। तब पुलिस ने हिरासत में ले लिया और केस के पर्दाफाश से लेकर विवेचना पूरी होने तक कड़ी से कड़ी मिलाई।

तत्कालीन एसएसपी डा. विपिन ताडा ने बताया कि मेरठ से मनाली-कसौल तक घटना की कड़ियां जोड़ीं गई। वारदात के बाद मुस्कान और साहिल मनाली और कसौल गए थे। पुलिस ने मेरठ से उनके जाने और वापस लौटने तक की गतिविधियों की पड़ताल की।

कैमरों में दर्ज गतिविधियों से लेकर घटनाक्रम से जुड़े लोगों तक को जांच का हिस्सा बनाया। उन कड़ियों को जोड़ा गया। जांच में आया कि हत्या से पहले की तैयारी, वारदात और उसके बाद की गतिविधियों की तस्वीर स्पष्ट की गई।

चाकू-गंडासे से ड्रम और सीमेंट तक बने साक्ष्य

हत्या में इस्तेमाल किए गए चाकू और गंडासे की खरीद से लेकर शव को छिपाने के लिए ड्रम और सीमेंट खरीदने तक की कड़ियों को विवेचना में शामिल किया गया। नींद की गोलियों के लिए पर्चा लिखने वाले डाक्टर और संबंधित दुकानदारों तक को गवाह बनाया गया। पुलिस ने घटनाक्रम से जुड़े लोगों के बयान दर्ज किए और साक्ष्यों को चार्जशीट का हिस्सा बनाया। साथ ही मां रेनू और भाई बबलू व दोस्त सौरभ की गवाही भी अहम मानी गई।

चार्जशीट में 22 गवाहों को एक-एक करके उचित समय पर अदालत में पेश कराया गया। प्रत्यक्षदर्शी के अभाव में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहियों की अहमियत और बढ़ गई थी। पुलिस की कोशिश थी कि घटनाक्रम की प्रत्येक कड़ी अदालत के सामने रखी जाए, ताकि किसी महत्वपूर्ण तथ्य के छूटने की गुंजाइश न रहे।

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इस मामले की विवेचना और अभियोजन से जुड़े कार्यों में तत्कालीन एसएसपी डा. विपिन ताडा, एसपी सिटी आयुष विक्रम सिंह, विवेचक आरके पचौरी, थाने के पैरोकार दिलशाद अहमद और शिवकुमार सिंह की अहम भूमिका रही।

वहीं, जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) कृष्ण कुमार चौबे और सौरभ की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने अदालत में मुकदमे की कार्रवाई को आगे बढ़ाया।