बिना लिखा-पढ़ी हिरासत में रखने पर हाई कोर्ट का कड़ा रुख, राज्य सरकार भरेगी मुआवजा, पुलिसवालों से होगी रिकवरी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देवरिया के गौरीबाजार थाने में अवैध हिरासत के मामले में राज्य सरकार को मुआवजा देने का ...और पढ़ें

HighLights
अवैध हिरासत पर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को मुआवजा देने का आदेश।
मुआवजा राशि जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूल की जाएगी।
तत्कालीन थाना प्रभारी के आचरण पर अदालत ने सख्त नाराजगी जताई।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देवरिया जिले के गौरीबाजार थाने में चार व्यक्तियों को अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने राज्य सरकार को तीन याचियों को 20-20 हजार रुपये और एक याची को पांच हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
अदालत ने यह भी कहा कि जांच के बाद जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से मुआवजे की राशि वसूल की जाए। तत्कालीन थाना प्रभारी डॉ. महेंद्र कुमार के आचरण पर अदालत की नाराजगी को उनकी सर्विस बुक में दर्ज करने का आदेश दिया गया है।याचीगण महेंद्र गौर व तीन अन्य की ओर से अधिवक्ता अर्चित कुमार श्रीवास्तव और प्रीती चौधरी ने पक्ष रखा।
याचियों का कहना था कि हत्या के एक मामले की जांच के नाम पर पुलिस ने उन्हें बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए हिरासत में रखा। याची संख्या एक महेंद्र गौड़ को दो दिन तक अवैध रूप से थाने में रखा गया, जबकि याची संख्या दो से चार को 13 से 23 अप्रैल तक हिरासत में रखा गया। मजिस्ट्रेट के सामने भी पेश नहीं किया गया। पुलिस का कहना था कि संबंधित लोगों को पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया था और बाद में छोड़ दिया गया।
अदालत ने पाया कि पुलिस के पास दावे के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज नहीं थे। कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज की अनुपलब्धता और थाने के अभिलेखों में आवश्यक प्रविष्टियों की कमी को गंभीरता से लिया। कहा कि पुलिस हिरासत में लाए जाने और छोड़े जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का विवरण जनरल डायरी में दर्ज होना चाहिए।
सीसीटीवी खराब होने की स्थिति में भी वैकल्पिक व्यवस्था के तहत रिकार्ड सुरक्षित रखना आवश्यक है। जब संबंधित अवधि की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं हो और पुलिस के पास हिरासत से रिहाई के संबंध में कोई दस्तावेज न हो, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 के तहत प्रतिकूल अनुमान लगाया जा सकता है।
अदालत ने याचियों की अवैध हिरासत के आरोपों को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को मुआवजा देने का निर्देश दिया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि पुलिस थानों में सीसीटीवी व्यवस्था का लगातार चालू रहना और हिरासत से जुड़े रिकार्ड का संधारण नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक है।
