विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

उत्तराखंड: नीचे उफनदी नदी, ऊपर रस्सी से बंधी ट्रॉली... जान जोखिम में डालकर स्कूल जा रहे बच्चे

Updated: Sun, 30 Aug 2026 08:44 AM (IST)

उत्तराखंड के कई गांवों में पुलों के अभाव में ग्रामीण जान जोखिम में डालकर ट्रॉली या बच्चों को कंधों पर ...और पढ़ें

पिथौरागढ़ में ट्रॉली पुल के सहारे नदी पार करते घरुड़ी और मनकोट के ग्रामीण।

पिथौरागढ़ में ट्रॉली पुल के सहारे नदी पार करते घरुड़ी और मनकोट के ग्रामीण।

HighLights

  1. उत्तराखंड में पुलों की कमी, ग्रामीण जान जोखिम में डालकर नदी पार

  2. टोंस नदी पार करते 15 वर्षीय सबीना ने गंवाई जान

  3. स्कूल, अस्पताल, बाजार तक सुरक्षित पहुंच के लिए पुल जरूरी

अश्वनी त्रिपाठी, देहरादून। नदी के किनारे आकर रुकती पहाड़ के कई गांवों की राह। सामने उफनता पानी और नदी पार करने के लिए पुल की जगह रस्सी से लटकी ट्राली। ट्रॉली में बैठकर बच्चे स्कूल तो मरीज अस्पताल पहुंचते हैं। टोंस नदी पार करते समय 15 वर्षीय सबीना अपनी जान भी गंवा चुकी है। पुल के अभाव में ट्राली से नदी पार करने की बेबसी पहाड़ के कई गांवों का सच है।

इन गांवों में बच्चे कंधों पर बैठाकर नदी पार कराए जाते हैं, तो कहीं ग्रामीण ट्रॉली के सहारे नदी के ऊपर झूलते हुए दूसरी ओर पहुंचते हैं। बरसात में नदियों का जलस्तर बढ़ते ही यह विवशता और गहरी हो जाती है।

सल्ला में हर सफर जोखिम भरा

उत्तरकाशी जिले के मोरी विकासखंड का सल्ला गांव इस बेबसी को रोज जीता है। करीब 40 परिवारों को टोंस नदी पार करने के लिए हस्तचालित ट्रॉली का सहारा लेना पड़ता है। जर्जर ट्रॉली और नीचे बहती तेज नदी के बीच हर सफर जोखिम भरा है। मोरी ब्लाक मुख्यालय से महज चार किलोमीटर दूर होने के बावजूद पुल व सड़क के अभाव में ग्रामीणों को जान जोखिम में डालनी पड़ती है। पुराने मामलों में ट्रॉली से बच्चों और युवतियों के घायल होने तथा मौत की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं।

uk small river par

डोबा गांव में शिप्रा नदी पर इस तरह नदी पार करते ग्रामीण।

मालदेवता से डोबा तक यही दर्द

देहरादून-टिहरी सीमा के मालदेवता क्षेत्र में भी ट्राली नदी पार करने का प्रमुख साधन बनी हुई है। नैनीताल के बेतालघाट ब्लाक के डोबा गांव में शिप्रा नदी पर पुल न होने से बरसात में अभिभावक बच्चों को कंधे पर बैठाकर नदी पार कराते हैं। गर्भवती महिलाओं और मरीजों को अस्पताल पहुंचाना भी चुनौती है। पिथौरागढ़ में तल्ला और मल्ला मोरी के बीच पक्का पुल नहीं होने से ग्रामीण अस्थायी लकड़ी के पुल से आवाजाही करते रहे हैं। वर्ष 2020 में पुराना पुल बहने के बाद मानसून में करीब 400 की आबादी प्रभावित हुई थी।

कब तक रस्सी के सहारे चलेगी जिंदगी

मोरी में समस्या केवल पुल के अभाव की नहीं है। टौंस नदी के सांद्रा और खूनीगाड़ पुलों की जर्जर स्थिति भी ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा रही है। खूनीगाड़ पुल तीन गांवों को ब्लाक मुख्यालय से जोड़ता है, जबकि सांद्रा पुल क्षतिग्रस्त होने पर छह गांवों को अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है।

पहाड़ में पुल सिर्फ ढांचा नहीं, स्कूल, अस्पताल और बाजार तक सुरक्षित पहुंच की उम्मीद

उत्तरकाशी के खूनीगाड क्षेत्र में 130 मीटर डबल ट्रॉली रज्जु मार्ग दर्ज है। तत्काल आवागमन के लिए यह सहारा है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। पहाड़ में पुल सिर्फ ढांचा नहीं, स्कूल, अस्पताल और बाजार तक सुरक्षित पहुंच की उम्मीद है। सवाल यही है कि आखिर कब तक ग्रामीणों की जिंदगी पुल के बजाय रस्सी के सहारे चलती रहेगी।

यह भी पढ़ें- शुद्धिकरण प्रकरण के बाद से गरमाई सियासत: उत्तराखंड में अनुसूचित जाति के वोट बैंक पर भाजपा-कांग्रेस की जंग

यह भी पढ़ें- Uttarakhand Weather: मानसून फिर सक्रिय, 2 सितंबर तक भारी बारिश; देहरादून सहित 8 जिलों में आज यलो अलर्ट

प्रदेश में सात ऐसे पुल हैं, जहां वर्तमान में ट्राली अथवा वैकल्पिक साधनों से आवाजाही हो रही है। इन सभी स्थानों पर स्थायी पुल निर्माण की प्रक्रिया चल रही है, ताकि आमजन को सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिल सके।

-

राजेश शर्मा, मुख्य अभियंता, लोक निर्माण विभाग