उत्तराखंड को क्यों चाहिए 1320 मेगावाट की कोयला आधारित बिजली?आइए जानते हैं
उत्तराखंड में 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली खरीद पर राजनीतिक विवाद गहरा गया है, जबकि राज्य की 71% ऊर्जा नवीकरणीय स्रोतों से आती है।

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अश्वनी त्रिपाठी, देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले 1320 मेगावाट की कोयला आधारित बिजली खरीद पर राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस ने सरकार पर निविदा शर्तों में बदलाव करने का आरोप लगाया है। सरकार आरोपों को खारिज कर रही है।
राजनीतिक विवाद से अलग देखें तो इस फैसले के पीछे एक बड़ा सवाल बिजली की जरूरत का है। आखिर जब उत्तराखंड के ऊर्जा क्षेत्र में करीब 71 प्रतिशत की हिस्सेदारी नवीकरणीय स्रोतों की है, तो 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की जरूरत क्यों पड़ी? इस व्यवस्था से सरकार और उपभोक्ताओं को क्या फायदा होगा?
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बिजली की मांग बढ़ी, हरित ऊर्जा पर्याप्त नहीं
उत्तराखंड की पहचान जलविद्युत व सौर ऊर्जा से है। इन स्रोतों से मिलने वाली बिजली हर समय समान उपलब्ध नहीं रहती। इसीलिए केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने उत्तराखंड को कोयला आधारित बिजली की अतिरिक्त व्यवस्था करने की सलाह दी।
सीईए ने 1181 मेगावाट की जरूरत बताई
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने उत्तराखंड के बिजली पोर्टफोलियो में करीब 1181 मेगावाट अतिरिक्त कोयला आधारित क्षमता की जरूरत बताई। इसके लिए उत्तराखंड में ही थर्मल पावर प्लांट लगाना जरूरी नहीं बताया गया। राज्य चाहे तो बाहर स्थापित परियोजनाओं से दीर्घकालिक बिजली खरीद सकता है।
उत्तराखंड में नहीं लगेगा 1320 मेगावाट का प्लांट
1320 मेगावाट की व्यवस्था को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि उत्तराखंड में थर्मल पावर प्लांट क्यों नहीं लगाया जा रहा है। प्राधिकरण के अनुसार, उत्तराखंड जैसे पर्यावरणीय संवेदनशील राज्य में पावर प्लांट लगाना जरूरी नहीं। राज्य ने दूसरे राज्य में बिजली उत्पादन कर उत्तराखंड को बिजली उपलब्ध कराने का रास्ता चुना है।
दो रास्ते थे, निजी क्षेत्र वाला चुना
ऊर्जा विभाग के सामने दो विकल्प थे। पहला, यूजेवीएनएल के माध्यम से राज्य खुद थर्मल पावर प्लांट स्थापित करे। दूसरा, टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिये निजी क्षेत्र की कंपनी को परियोजना स्थापित करने की जिम्मेदारी दी जाए। राज्य ने प्रतिस्पर्धी बोली का रास्ता चुना।
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सालाना 50 से 70 लाख टन कोयले की जरूरत
1320 मेगावाट बिजली के लिए उत्तराखंड को कोल इंडिया लिमिटेड से कोयला लिंकेंज मिलना तय हुआ है। 1320 मेगावाट बिजली बनाने में सालाना करीब 50 से 70 लाख टन कोयले की जरूरत होगी, कोयले की मात्रा और आपूर्ति की शर्तें आगे की लिंकेंज प्रक्रिया में स्पष्ट होंगी।
25.5 करोड़ टन कार्बन डाइ आक्साइड का उत्सर्जन
1320 मेगावाट का संयंत्र लगाने पर सालाना करीब 65 लाख टन कोयले की खपत होगी। इस हिसाब से 25 साल में करीब 16.4 करोड़ टन कोयला खपेगा। कोयले के विशिष्ट उत्सर्जन मानक को आधार मानें तो इस अवधि में करीब 25.5 करोड़ टन कार्बन डाइ आक्साइड उत्सर्जन होगा।
प्लांट के लिए शुरूआती निवेश 11 हजार करोड़
1320 मेगावाट का अपना कोयला बिजलीघर लगाने में करीब 11 हजार करोड़ रुपये का शुरुआती पूंजी निवेश बैठता है। संयंत्र लगाने पर 25 साल तक कोयला, परिवहन, संचालन, रखरखाव और वित्तीय लागत पर खर्च अलग से होगा।
