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पिथौरागढ़: सेना की ‘सद्भावना’ से खिलने लगा चीन सीमा पर वीरान होता गर्ब्यांग गांव, टेंट होमस्टे से शुरू हुआ रिवर्स पलायन

Published: Sun, 20 Sep 2026 06:01 AM (IST)

पिथौरागढ़ के चीन सीमा पर स्थित गर्ब्यांग गांव को भारतीय सेना ने अपनी पहल से फिर से आबाद करना शुरू ...और पढ़ें

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HighLights

  1. भारतीय सेना ने गर्ब्यांग गांव में टेंट आधारित इको होमस्टे विकसित किए।

  2. सेना की पहल से गांव में रिवर्स पलायन शुरू हुआ, 180 लोग लौटे।

  3. कैलाश मानसरोवर मार्ग पर पर्यटन से रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।

तेज सिंह गुंज्याल, धारचूला (पिथौरागढ़)। भारत चीन और नेपाल सीमा पर स्थित पिथौरागढ़ का गर्ब्यांग गांव कभी अपनी समृद्धि के लिए छोटा विलायत के नाम से मशहूर था। धीरे-धीरे भू धंसाव की मार ने इसे वीरानी की तरफ धकेल दिया। चीन सीमा के निकट सामरिक महत्व के गांव को बचाने के लिए भारतीय सेना ने अनूठी पहल शुरू की। पक्के घरों के बजाय टेंट आधारित इको होमस्टे विकसित किए।

इसके साथ ही ऐसी तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिनकी वजह से गांव आबाद होने लगा है। सेना की सीमांत गांव के लिए रिवर्स पलायन की यह पहल रंग लाने लगी है। सेना ने टेंट आधारित होम स्टे संचालित करने का जिम्मा स्थानीय ग्राम समिति को सौंपा है। कालापानी क्षेत्र में भी होम स्टे तैयार कर ग्रामीणों को सौंपा है।

स्वरोजगार की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए सेना ने एक सामुदायिक केंद्र और एक पालीहाउस भी बनाकर दिया है। इतना ही नहीं, ग्रामीणों की सेहत की चिंता करते हुए सेना समय-समय पर मेडिकल कैंप आयोजित करती है। अन्य सामुदायिक गतिविधियों में भी ग्रामीणों की सहभागिता सुनिश्चित की जाती है। कैलास मानसरोवर के साथ आदि कैलास व ओम पर्वत यात्रा मार्ग पर होने के कारण यह गांव पर्यटन रोजगार का बड़ा जरिया बन रहा है।

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस गांव में करीब 10 होम स्टे हैं। चीना सीमा स्थित लिपुलेख तक सड़क बनने और सेना के सदभावना अभियान ने क्षेत्र में उम्मीद की किरण जगाई है। जनशून्य होने की स्थिति में पहुंच चुके गांव में इस समय करीब 180 लोग निवास कर रहे हैं। इस गांव में स्वयं ग्रामीणों के भी दो होमस्टे हैं।

1970 से बढ़ी गर्ब्यांग की मुश्किलें गर्ब्यांग की बर्बादी का कारण भौगोलिक अस्थिरता और काली नदी का कटाव रहा। 1970 के आसपास गांव में बड़े पैमाने पर भू धंसाव होने लगा। काली नदी ने गांव की जड़ों को काटना शुरू कर दिया। कभी व्यास घाटी का सबसे अधिक आबाद रहने वाले भव्य मकान तिरछे हो गए और खेत जमींदोज होने लगे।

इसी प्राकृतिक आपदा और सुविधाओं के अभाव में लोगों को अपना पुश्तैनी गांव छोड़कर हल्द्वानी, पिथौरागढ़ और तराई क्षेत्रों में भारी पलायन करना पड़ा। कभी समृद्ध था यह गांव वर्ष 1962 से पूर्व तक चीन और नेपाल सीमा पर स्थित गर्ब्यांग गांव अपने वैभव के लिए जाना जाता था।

जहां पर आज भी पुराने नक्काशी वाले तीन मंजिला मकान इसके उदाहरण हैं। वर्ष 1962 के भारत चीन युद्ध से पहले गर्ब्यांग भारत तिब्बत व्यापार का प्रमुख केंद्र था। यहां के व्यापारी बेहद समृद्ध थे। इसी संपन्नता और आधुनिकता के कारण इसे कुमाऊं का छोटा विलायत कहा जाता था। तब गांव में 300 से अधिक परिवार रहते थे।

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