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अमेरिका में पिया डांडिया ने रचा इतिहास, फ्लोरिडा से संसद पहुंचने वाली पहली भारतीय-अमेरिकी बनीं

Published: Wed, 04 Nov 2026 09:59 AM (IST)

पिया डंडिया ने फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट का चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया है। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी असकर को हराया।

भारतवंशी पिया डांडिया ने जीता फ्लोरिडा हाउस (फोटो-रॉयटर्स)

भारतवंशी पिया डांडिया ने जीता फ्लोरिडा हाउस (फोटो-रॉयटर्स)

HighLights

  1. पिया डंडिया ने फ्लोरिडा कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट 22 चुनाव जीता।

  2. फ्लोरिडा से पहली भारतीय-अमेरिकी प्रतिनिधि सभा सदस्य।

  3. शिक्षा और आर्थिक अवसरों पर केंद्रित चुनाव अभियान।

डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। भारतीय मूल की डेमोक्रेट पिया डंडिया ने फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट का चुनाव जीत लिया है। इस चुनाव में उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी असकर को हराया।

दक्षिण फ्लोरिडा में 2026 के अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन के दौरान पिया डांडिया और केसी असकर के बीच यह मुकाबला सबसे चर्चित चुनाव में से एक था।

मंगलवार, 3 नवंबर को घोषित नतीजों के मुताबिक, हाई स्कूल की पूर्व प्रिंसिपल डंडिया को 51.9 प्रतिशत वोट मिले। उनके प्रतिद्वंद्वी असकर को 49.1 प्रतिशत वोट मिले।

भारतवंशियों के खास पिया डांडिया की जीत

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिया डंडिया की जीत भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लिए एक अहम पड़ाव है। वह फ्लोरिडा से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) के लिए चुनी जाने वाली पहली भारतीय-अमेरिकी बन गई हैं। वहीं अमेरिकी कांग्रेस के लिए चुनी जाने वाली वह 10वीं भारतवंशी हैं।

पिया डांडिया के चुनाव प्रचार का मुख्य फोकस शिक्षा, किफायती जीवन और आर्थिक अवसरों पर था। चुनाव जीतने के बाद अब वह फ्लोरिडा के नए सिरे से तय किए गए 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट का प्रतिनिधित्व करेंगी।

पिया डांडिया का जयपुर से कनेक्शन

पिया डंडिया का जन्म और पालन-पोषण पाम बीच काउंटी में हुआ, लेकिन वह पहली पीढ़ी की भारतीय-अमेरिकी हैं। इनके माता-पिता 1980 में जयपुर से आकर यहां बस गए थे।

भारतवंशी डांडिया पूर्व शिक्षिका हैं और हार्लेम में हाई स्कूल की प्रिंसिपल रह चुकी हैं। उन्होंने 'व्हाइट हाउस फेलो' के रूप में भी काम किया है और एप्पल (Apple) कंपनी में भी अपनी सेवाएं दी हैं।

डांडिया ने एक हाई स्कूल की स्थापना की, जिसका मकसद कम आय वाले छात्रों के जीवन की दिशा बदलना था, ताकि उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता की राह पर लाया जा सके। उनके हाई स्कूल से पास होने वाले सभी छात्रों को कॉलेज में दाखिला मिला, जबकि उनमें से 86 प्रतिशत छात्र कम आय वाले परिवारों से आते थे।

चुनाव अभियान की वेबसाइट के मुताबिक, 28 साल की उम्र में वह अपने स्कूल की संस्थापक प्रिंसिपल बनीं, जिससे वह देश की सबसे कम उम्र की हाई स्कूल प्रिंसिपलों में से एक बन गईं।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

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