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लैब-ग्रोन हीरे से घटेगी AI चिप्स की गर्मी, चीन कर रहा बड़े पैमाने पर उत्पादन

Updated: Mon, 10 Aug 2026 01:42 PM (GMT+05:30)

AI चिप्स की अत्यधिक गर्मी को नियंत्रित करने के लिए लैब-ग्रोन हीरे समाधान के रूप में उभरे हैं, क्योंकि वे उत्कृष्ट ऊष्मा सुचालक हैं।

लैब-ग्रोन हीरे से घटेगी AI चिप्स की गर्मी(प्रतीकात्मक तस्वीर)

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डिजिटल डेस्क, बीजिंग। एआई की दुनिया में इन दिनों सबसे बड़ी चुनौती ताकतवर प्रोसेसरों से निकलने वाली अत्यधिक गर्मी को नियंत्रित करना है। एआई चिप्स हर सेकंड में खरबों कैल्क्युलेशन करते हैं, जिससे भयंकर ऊष्मा पैदा होती है। अगर इस गर्मी को समय रहते कम न किया जाए, तो चिप की स्पीड धीमी हो जाती है, बिजली की खपत बढ़ जाती है और प्रोसेसर जल्दी खराब हो सकता है।

आभूषणों की शान बढ़ाने वाले लैब-ग्रोन डायमंड यानी कृत्रिम हीरे इस तकनीकी समस्या का सबसे बड़ा समाधान बनकर उभरा हैं। हीरा हीट का सबसे बेहतरीन सुचालक होता है। सिलिकॉन और तांबे जैसी धातुओं के मुकाबले यह कहीं अधिक तेजी से गर्मी सोखकर उसे बाहर निकाल सकता है।

इसी खूबी के कारण लैब में तैयार किए गए इन खास हीरों का इस्तेमाल अब हीट स्प्रेडर के रूप में हो रहा है, ताकि एआई प्रोसेसर बिना गर्म हुए पूरी क्षमता के साथ काम कर सकें। दुनिया भर की इस नई जरूरत को पूरा करने के लिए चीन ने बड़े पैमाने पर इन हीरों का उत्पादन तेज कर दिया है।

सिंथेटिक हीरों के बाजार में चीन का बढ़ता दबदबा

कृत्रिम हीरों के उत्पादन में चीन आज दुनिया का निर्विवाद सरताज बन चुका है और उसकी इस सफलता के पीछे दशकों की मेहनत है। चीन ने 1960 के दशक में ही सिंथेटिक डायमंड तकनीक पर शोध शुरू कर दिया था और साल 1963 में अपना पहला कृत्रिम हीरा सफलतापूर्वक तैयार कर लिया था।

वर्तमान स्थिति की बात करें तो वर्ष 2024 में चीन ने लगभग 2.2 करोड़ कैरेट लैब-ग्रोन हीरों का उत्पादन किया है। यह आंकड़ा पूरी दुनिया के कुल उत्पादन के 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है।

इस विशाल उत्पादन में चीन के हुबेई प्रांत में स्थित झोंगिजिंग डायमंड जैसी कंपनियों का अहम योगदान है, जो अकेले ही हर साल करीब 6 लाख कैरेट कच्चे कृत्रिम हीरों का निर्माण करती हैं।

ज्वेलरी से निकलकर हाई-टेक इंडस्ट्री तक पहुंचा दायरा

लैब-ग्रोन हीरों की उपयोगिता अब केवल चमक-दमक या कंप्यूटर चिप्स को ठंडा रखने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि कई अन्य अत्याधुनिक क्षेत्रों में भी इनकी मांग आसमान छू रही है। इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) सेक्टर में इन हीरों का इस्तेमाल पावर इलेक्ट्रॉनिक्स को ज्यादा कुशल बनाने, बैटरी की क्षमता सुधारने और फास्ट चार्जिंग तकनीक को विकसित करने के लिए किया जा रहा है।

इसके अलावा, अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में भी इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। रॉकेट, सैटेलाइट्स और ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम जो अंतरिक्ष या रक्षा अभियानों में बहुत अधिक रेडिएशन का सामना करते हैं, उन्हें सुरक्षित और कारगर बनाए रखने में कृत्रिम हीरे बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।