चीन के हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी, ताइवान ने बनाया 'हेलस्केप' प्लान
ताइवान चीन के संभावित हमले से बचाव के लिए ड्रोन और मानवरहित हथियारों में भारी निवेश कर रहा है। यह रणनीति यूक्रेन युद्ध से प्रेरित है।

चीन के हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी, ताइवान ने बनाया 'हेलस्केप' प्लान

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डिजिटल डेस्क, ताइपे। ताइवान अपने दुश्मन चीन की संभावित हमले से बचने की तैयारी कर रहा है, इसके लिए वह ड्रोन तथा अन्य मानवरहित हथियारों में भारी निवेश कर रहा है। यह रणनीति आंशिक रूप से यूक्रेन युद्ध से प्रेरित है, जहां ड्रोन दुश्मन सेना को खोजने और हमला करने का महत्वपूर्ण हथियार बन गए हैं।
द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, ताइवान की योजना अपने चारों ओर एक ड्रोन हेलस्केप बनाने की है। इसका उद्देश्य ड्रोन का उपयोग करके चीनी सेना का पता लगाना, उनकी हरकतों पर नजर रखना और द्वीप पर उनके पैर जमाने से पहले ही उन पर हमला करना है।
ताइवान के लेफ्टिनेंट जनरल हुआंग वेन-ची ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि ड्रोन और काउंटर-ड्रोन को लेकर हमारे प्रयास काफी देर से शुरू हुए, और शुरुआत में हम बस नई चीजों को आजमा रहे थे।
सैन्य अभ्यास में शामिल हुई नई रणनीति
ताइवान अब इस रणनीति को अपने सैन्य अभ्यासों का हिस्सा बना रहा है। बुधवार को शुरू हुए द्वीप के 10 दिवसीय हान कुआंग सैन्य अभ्यास के दौरान, सैनिकों ने टोह लेने के लिए ड्रोन का उपयोग करने का अभ्यास किया। इसके अलावा, सैनिकों को दुश्मन के ड्रोन का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने का भी प्रशिक्षण दिया गया।
ताइवान, यूक्रेन की डेविड बनाम गोलियत रणनीति पर करीब से नजर रख रहा है, जहां अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन ने दुश्मन सैनिकों को खोजने और उन पर हमला करने में अहम भूमिका निभाई है।
ताइवान भी चीन का मुकाबला करने के लिए इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाना चाहता है, क्योंकि चीन की सेना ताइवान के मुकाबले काफी बड़ी है।
ताइवान पर मंडराता चीन का खतरा
चीन, ताइवान से लगभग 110 मील दूर है और इस स्व-शासित द्वीप को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है। बीजिंग का कहना है कि वह शांतिपूर्ण एकीकरण को प्राथमिकता देता है, लेकिन उसने सैन्य बल के इस्तेमाल से भी इनकार नहीं किया है।
चीन ताइवान के आसपास युद्धपोत, विमान, मिसाइल और ड्रोन सहित अपनी सैन्य क्षमताओं का लगातार विस्तार कर रहा है। चीनी सेना ने तटरक्षक गश्त और सैन्य अभ्यासों को भी बढ़ा दिया है।
यूक्रेन और ताइवान का अध्ययन करने वाले ऑस्ट्रेलिया के सेवानिवृत्त मेजर जनरल मिक रयान ने कहा कि ताइवान को यह एहसास हो गया है कि चीन के साथ संभावित युद्ध में, सभी क्षेत्रों और सभी चरणों में ड्रोन बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
निर्यात का वैश्विक केंद्र बनने का लक्ष्य
ताइवान सरकार चाहती है कि देश एक प्रमुख वैश्विक ड्रोन निर्माण हब बने। उसने 2030 तक प्रति माह 100,000 ड्रोन बनाने का लक्ष्य रखा है, जिनमें से लगभग आधे निर्यात के लिए होंगे। साथ ही, ताइवान चाहता है कि उसकी सेना 2,10,000 से अधिक फ्लाइंग (हवाई) और समुद्री ड्रोन हासिल करे।
ताइवान अन्य देशों को ड्रोन के पुर्जों का एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बनने की भी कोशिश कर रहा है। 2026 के पहले तीन महीनों में इसने 115 मिलियन डॉलर के ड्रोन का निर्यात किया, जो कि 2025 के पूरे वर्ष के कुल ड्रोन निर्यात से भी अधिक है। इसका सबसे बड़ा खरीदार चेक गणराज्य रहा, जबकि इसके कुछ ड्रोन यूक्रेन तक भी पहुंचे हैं।
युद्ध के तरीकों में बदलाव की तैयारी
इन सबके साथ ही, ताइवान को अपने सैनिकों के काम करने के तरीके को भी बदलने की जरूरत है। सैनिकों को तेजी से आगे बढ़ना होगा, ड्रोन से मिली जानकारी को साझा करना होगा और एक ही स्थान पर लंबे समय तक रुकने से बचना होगा, क्योंकि ऐसा करने से वे आसानी से निशाना बन सकते हैं।
ताइपे में इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल डिफेंस एंड सिक्योरिटी रिसर्च के एसोसिएट रिसर्च फेलो, शू ह्सियाओ-हुआंग ने कहा कि सेना की अग्रिम पंक्ति के सैन्य अभियानों में पुराने समय की तुलना में पूरी तरह से बदलाव होना चाहिए।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया है कि यदि आप एक राउंड फायर करते हैं और बिना आगे बढ़े वहीं एक कतार में खड़े रहते हैं, तो आपको दूसरी बार फायर करने का मौका ही नहीं मिलेगा।
ताइवान ने पहले ही अपने सैन्य ढांचे में बदलाव करना शुरू कर दिया है। उसने हाल ही में लिटोरल कॉम्बैट कमांड बनाया है, जो द्वीप की तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ड्रोन, मोबाइल मिसाइलों और तोपखाने को एक साथ लाता है। ताइवान की सरकार ने ड्रोन पर पांच वर्षों में 6.5 अरब डॉलर खर्च करने का प्रस्ताव भी रखा है।
