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क्या है चीन की मैग्लेव तकनीक? 5.3 सेकेंड में हासिल की 800 Kmph की रफ्तार, बनाया नया रिकॉर्ड

Updated: Fri, 14 Aug 2026 10:13 PM (IST)

चीन ने मैग्लेव तकनीक में एक नया रिकॉर्ड बनाया है, जहां एक प्रायोगिक वाहन ने 5.3 सेकंड में 800 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार हासिल की।

चीन ने मैग्लेव तकनीक में बनाया नया रिकॉर्ड (फोटो-रॉयटर्स)

चीन ने मैग्लेव तकनीक में बनाया नया रिकॉर्ड (फोटो-रॉयटर्स)

HighLights

  1. चीन ने मैग्लेव तकनीक में 800 किमी प्रति घंटा की रफ्तार हासिल की।

  2. प्रायोगिक वाहन ने 5.3 सेकंड में यह रिकॉर्ड बनाया।

  3. अगली पीढ़ी के परिवहन और रॉकेट लॉन्च में उपयोग संभव।

डिजिटल डेस्क, बीजिंग। चीन ने मैग्लेव तकनीक में एक और बड़ी छलांग लगाते हुए महज 5.3 सेकेंड में 800 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार हासिल की है।

हुबेई स्थित ईस्ट लेक लैबोरेटरी के एक किलोमीटर लंबे टेस्ट ट्रैक पर करीब 1.1 टन वजनी प्रायोगिक वाहन ने यह उपलब्धि हासिल की।

5.3 सेकेंड में 800 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, वाहन करीब 600 मीटर की दूरी पर 800 किमी प्रति घंटा की अधिकतम रफ्तार तक पहुंच गया और करीब आठ सेकेंड की पूरी परीक्षण यात्रा के बाद सुरक्षित रूप से रुका।

यह पिछले छह महीनों में इस लैबोरेटरी का तीसरा रिकॉर्ड है। इससे पहले जून 2025 में टेस्ट वाहन ने 650 किमी प्रति घंटा और जुलाई 2025 में करीब 700 किमी प्रति घंटा की रफ्तार हासिल की थी।

खास बात यह है कि ये उपलब्धियां किसी यात्री ट्रेन की नियमित सेवा में नहीं, बल्कि छोटी दूरी के प्रायोगिक ट्रैक पर हासिल की गई हैं।

यात्री ट्रेन नहीं, अगली पीढ़ी की तकनीक पर नजर

800 किमी प्रति घंटा की रफ्तार सुनने में भले ही भविष्य की यात्री ट्रेन जैसी लगे, लेकिन चीन का मौजूदा प्रयोग सीधे तौर पर यात्रियों को इतनी रफ्तार से सफर कराने के लिए नहीं है।

शोध का बड़ा उद्देश्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रोपल्शन और लेविटेशन की क्षमता को समझना है। लैबोरेटरी ने इसे अगली पीढ़ी के मैग्लेव परिवहन के साथ-साथ एयरोस्पेस इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लांच, ड्रोन और लो-एल्टीट्यूड इकोनामी जैसे क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी बताया है।

800 किमी प्रति घंटा पर सबसे बड़ी चुनौती

इतनी तेज रफ्तार पर ट्रैक में मामूली असमानता भी बड़ी समस्या पैदा कर सकती है। वाहन को एक साथ लेविटेशन, पोजिशनिंग और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रोपल्शन के बीच बेहद सटीक तालमेल में रखना पड़ता है।

चीन के इस परीक्षण में हाई-पावर ऊर्जा आपूर्ति, वायरलेस कम्युनिकेशन, लाइनर मोटर के सटीक नियंत्रण और हाई-स्पीड स्थिरता जैसी तकनीकों को भी परखा गया।

यही वजह है कि 800 किमी प्रति घंटा की प्रायोगिक रफ्तार को सीधे यात्री सेवा से जोड़ना जल्दबाजी होगी। मैग्लेव ट्रैक को बेहद सीधा और समतल रखना पड़ता है और पारंपरिक रेल नेटवर्क के साथ इसकी अनुकूलता भी सीमित है।

रॉकेट लॉन्च में हो सकता है इस्तेमाल

यहीं इस प्रयोग का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। जमीन पर आधारित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लांच सिस्टम अगर किसी वाहन को शुरुआती चरण में ही बहुत अधिक गति दे सके, तो भविष्य में राकेट या अन्य एयरोस्पेस वाहनों के टेक-ऑफ में इसकी भूमिका तलाशना संभव है।

इससे शुरुआती चरण में राकेट इंजन पर पड़ने वाला दबाव और ईंधन की जरूरत कम करने की संभावना पर शोध किया जा सकता है।

रफ्तार से भरी मैग्लेव तकनीक

मैग्लेव यानी मैग्नेटिक लेविटेशन में ट्रेन को चुंबकीय बल की मदद से गाइडवे के ऊपर उठाया जाता है और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम उसे आगे बढ़ाता है।

पहियों और रेल के बीच संपर्क न होने से घर्षण कम होता है, जिससे पारंपरिक पहिया-रेल प्रणाली की तुलना में बहुत अधिक गति हासिल करने की संभावना बढ़ती है।

तीन देशों में चलती है मैग्लेव ट्रेन

चीन: शंघाई मैग्लेव दुनिया की सबसे प्रसिद्ध हाई-स्पीड वाणिज्यिक मैग्लेव सेवाओं में है, जो पुडोंग एयरपोर्ट और लोंगयांग रोड के बीच चलती है।

जापान: जापान में लिनिमो मैग्लेव सेवा नियमित रूप से चलती है। चुओ शिंकानसेन प्रोजेक्ट टोक्यो-नागोया के बीच हाई-स्पीड सुपरकंडक्टिंग मैग्लेव विकसित कर रहा है।

दक्षिण कोरिया: इंचियोन एयरपोर्ट की मैग्लेव सेवा चुंबकीय लेविटेशन का व्यावसायिक इस्तेमाल करती है।

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