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इजरायल में बैलेट वोटों की गिनती पूरी, मगर किसी को नहीं मिला बहुमत... नेतन्याहू के सामने अब क्या विकल्प?

By Harsh KatareEdited By: Harsh Katare
Published: Thu, 29 Oct 2026 04:45 PM (IST)Updated: Thu, 29 Oct 2026 05:17 PM (IST)

इजरायल के आम चुनावों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू या उनके प्रतिद्वंद्वी गादी आइसेनकोट में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है।

इजरायल चुनाव में नेतन्याहू को बहुमत नहीं

इजरायल चुनाव में नेतन्याहू को बहुमत नहीं

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डिजिटल डेस्क, यरुशलम। इजरायल में हुए आम चुनावों के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी गादी आइसेनकोट में किसी को भी स्पष्ट बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं है। वहीं अरब पार्टियों ने 18-19 सीटें जीत सकती हैं, यह पार्टियां अब सत्ता पाने के लिए एक बड़ा विकल्प बनकर उभरी हैं।

आम चुनावों में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से सत्ता तक पहुंचने का रास्ता कठिन हो गया है। इसके बाद देश में एक लंबी और जटिल राजनीतिक सौदेबाजियों का दौर शुरू होने की संभावना है।

चुनावी प्रक्रिया और परिणामों का शेड्यूल

इजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति वोटों की गिनती में जुटी हुई है। आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को घोषित किए जाएंगे। इस गिनती प्रक्रिया में देश के भीतर डाले गए वोटों के साथ-साथ इजरायली सैनिकों, राजनयिकों, अस्पतालों और जेलों में मौजूद मतदाताओं के लगभग 5 लाख एब्सेंटी बैलेट (अनुपस्थित मतदाताओं के मत) भी शामिल हैं। बैलेट वोटों की गिनती पूरी की जा चुकी है।

हालांकि, जानकारों का मानना है कि इन मतों से नतीजों में कोई बहुत बड़ा उलटफेर होने की उम्मीद कम ही है।

इजरायली संसद, जिसे नेसेट कहा जाता है, में सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत आवंटित की जाती हैं। नेसेट में प्रवेश पाने और सीटें हासिल करने के लिए किसी भी पार्टी को कुल राष्ट्रीय मतों का कम से कम 3.25 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करना अनिवार्य होता है।

वर्तमान चुनाव में लगभग एक दर्जन पार्टियों के इस आंकड़े को पार करने की संभावना है, जिसके कारण सीटों के अंतिम बंटवारे और गणित को सुलझाने में समय लग रहा है।

क्या है सीटों का गणित?

120 सीटों वाली इजरायली संसद (नेसेट) में किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए न्यूनतम 61 सीटों के बहुमत की आवश्यकता होती है।

स्थानीय मीडिया और शुरुआती रुझानों के अनुमान के मुताबिक:

नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गुट: संसद में लगभग 53 सीटें जीतने की स्थिति में है, जो बहुमत के जादुई आंकड़े से 8 सीटें कम है।

विपक्षी दल (गादी आइसेनकोट के नेतृत्व में): लगभग 48 सीटें हासिल कर रहे हैं।

अरब-नेतृत्व वाले दल: लगभग 18 से 19 सीटें जीतने की राह पर हैं।

चूंकि किसी भी पक्ष को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है, इसलिए इजरायल एक बार फिर गंभीर राजनीतिक अनिश्चितता और गतिरोध के दौर से गुजर रहा है।

विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों से गर्माई सियासत

अंतिम नतीजों से ठीक पहले राजनीतिक माहौल तब और गरमा गया जब केंद्रीय चुनाव समिति के प्रमुख ने शिन बेट (खुफिया एजेंसी) को कथित विदेशी हस्तक्षेप की जांच करने का निर्देश दिया।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तुरंत इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करते हुए बयान दिया कि किसी भी यहूदी दल को अरब-नेतृत्व वाले दलों के साथ सहयोग नहीं करना चाहिए।

दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने नेतन्याहू पर आरोप लगाया कि वे चुनाव परिणामों और जनता की इच्छा को कमजोर करने के लिए इस तरह के हथकंडों का इस्तेमाल कर रहे हैं। डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख यायर गोलान और अरब नेताओं ने इसे जनता को भड़काने वाला अभियान करार दिया है।

राष्ट्रपति की भूमिका

चुनाव के आधिकारिक नतीजे सामने आने के बाद, इज़राइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं से विचार-विमर्श करेंगे। इसके बाद वे उस नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिसके बारे में उन्हें सबसे ज्यादा यह संभावना नजर आएगी कि वह संसद में बहुमत जुटा सकता है।

नामित उम्मीदवार को सरकार के गठन के लिए शुरुआती 28 दिनों का समय मिलता है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा आवश्यकतानुसार 14 दिन और बढ़ाया जा सकता है (यानी कुल 42 दिन)।

इस अवधि के भीतर नेता को अपने सहयोगियों को साधकर नेसेट में बहुमत साबित करना होता है।

सरकार गठन के विकल्प और चुनौतियां?

सरकार बनाने में नेतन्याहू के सामने कई मुश्किलें आ सकती हैं। चुनावों में नेतन्याहू की 'लिकुड' पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन 53 सीटों के साथ वे अपने पारंपरिक दक्षिणपंथी और धार्मिक सहयोगियों के बलबूते बहुमत से दूर हैं। बहुमत तक पहुंचने के लिए उन्हें या तो विपक्ष से कुछ सांसदों को तोड़ना होगा या अन्य छोटे दलों को साथ लाना होगा। लेकिन यह आसान नहीं होगा।

एक विकल्प यह है कि नेतन्याहू और विपक्ष के प्रमुख नेता गादी आइजनकोट मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार बनाएं। इस व्यवस्था में दोनों नेता बारी-बारी से (जैसे दो-दो साल के लिए) प्रधानमंत्री पद साझा कर सकते हैं।

विपक्ष के सामने क्या हैं चुनौतियां?

गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट के पास भी अपने दम पर बहुमत नहीं है। यदि वे लगभग 18-19 सीटें जीतने वाले अरब-नेतृत्व वाले दलों के साथ हाथ मिलाते हैं, तो उनका आंकड़ा बहुमत के पार जा सकता है। हालांकि, वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक जटिलताओं के कारण यह यहूदी-अरब गठबंधन बनाना बेहद कठिन माना जा रहा है।

राष्ट्रीय एकता सरकार का विकल्प

देश के सामने मौजूद गंभीर सुरक्षा चुनौतियों और आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए, एक राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने का विकल्प भी चर्चा में है, ताकि देश को बार-बार होने वाले चुनावों से बचाया जा सके।

इजरायली राजनीतिक इतिहास में जोड़-तोड़ और गठबंधन की राजनीति आम रही है। यदि सभी प्रयास विफल हो जाते हैं और कोई भी नेता तय समयसीमा के भीतर सरकार बनाने में नाकाम रहता है, तो संसद भंग कर दी जाती है और देश में फिर से नए चुनाव कराए जाते हैं।

इजरायल में बनेगी कार्यवाहक सरकार

जब तक नई सरकार का औपचारिक गठन नहीं हो जाता, तब तक मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कार्यवाहक सरकार के प्रमुख के रूप में अपने पद पर बने रहेंगे। हालांकि, कार्यवाहक सरकार के पास नीतिगत और बड़े फैसले लेने की शक्तियां सीमित होती हैं, लेकिन वे प्रशासनिक कामकाज सुचारू रखते हैं।

इजरायल ने पहले भी 2019 से 2022 के बीच राजनीतिक गतिरोध के चलते महज कुछ ही सालों में 5 बार चुनाव देखे हैं। देश इस बार भी इसी तरह के अनिश्चित दौर में फंसने से बचना चाहता है।

गंभीर मुद्दे और सुरक्षा चुनौतियां

इन चुनावों की पृष्ठभूमि में इजरायल का समाज कई स्तरों पर बंटा हुआ है। देश के सामने कई संवेदनशील और गहरे मुद्दे हैं।

अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स छूट विवाद: तेजी से बढ़ रही कट्टर धार्मिक आबादी को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट दी जानी चाहिए या नहीं, यह एक बड़ा सामाजिक सवाल बन चुका है, खासकर तब जब कई परिवारों ने युद्धों में अपने बच्चों को खोया है।

नेतन्याहू का नेतृत्त्व और गाजा युद्ध: प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। आलोचकों का आरोप है कि उन्होंने अपने राजनीतिक फायदों और सत्ता में बने रहने के लिए गाजा संघर्ष और बंधकों की रिहाई से जुड़े समझौतों में देरी की।

अंतरराष्ट्रीय छवि और क्षेत्रीय तनाव: गाजा में फलिस्तिनियों के साथ बर्ताव और वेस्ट बैंक में बढ़ती हिंसा के कारण इजरायल की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी असर पड़ा है। इसके अलावा, ईरान के साथ चल रहे तनाव और संभावित हमलों के खतरे ने राजनीतिक अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।

राष्ट्रपति इसाक हर्जोग और देश के अधिकांश राजनीतिक नेता यह भली-भांति समझ रहे हैं कि इजरायल इस समय एक और चुनाव का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है।

आने वाले कुछ हफ्तों में होने वाली बातचीत और दलों के बीच के समझौते ही यह तय करेंगे कि क्या इजरायल को एक स्थिर सरकार मिल पाती है या देश को एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरना होगा।