जिंदा बचने के लिए यूक्रेनी सैनिक ने खुद काटा अपना पैर, 8 महीने बाद ड्रोन के जरिए हुआ ड्रामेटिक रेस्क्यू
यूक्रेन के एक सैनिक कोस्तियानतीन व्लासेंको ने घायल होने के बाद जिंदा रहने के लिए अपना पैर खुद काट दिया ...और पढ़ें

यूक्रेनी सेना का ड्रोन के जरिए हुआ रेस्क्यू(फोटो: रॉयटर्स)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, कीव। यूक्रेन के एक सैनिक को लगभग 8 महीने तक एक तबाह हो चुके स्कूल में फंसे रहने के बाद हेवी-लिफ्ट ड्रोन की मदद से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
49 वर्षीय कोस्तियानतीन व्लासेंको रूसी ड्रोन हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। एक स्कूल के बॉयलर रूम में फंसे हुए थे। बचने का कोई रास्ता न देख उन्होंने जिंदा रहने के लिए खुद ही अपना पैर काट दिया था।
4 अक्टूबर को एक बड़े ड्रोन ने सुरक्षा बेल्ट के जरिए हवा में उठाया और 15 किलोमीटर दूर सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाया। इसके साथ ही मोर्चे पर 491 दिनों से चला आ रहा उनका खौफनाक संघर्ष खत्म हुआ।
यूक्रेनी कमांडरों के अनुसार, युद्ध के मैदान से किसी सैनिक को ड्रोन के जरिए एयरलिफ्ट करने का यह दुनिया का पहला मामला माना जा रहा है।
जिंदगी और मौत के बीच का संघर्ष
व्लासेंको को पिछले साल मई में मोर्चे पर भेजा गया था, जहां वे बास्की नाम के एक अन्य सैनिक के साथ एक बंकर में तैनात थे। दोनों को ड्रोन के जरिए ही खाने-पीने का सामान पहुंचाया जाता था। जब उन्हें बदलने के लिए दूसरे सैनिक भेजे गए, तो वे रास्ते में ही मारे गए। इसके बाद उनके शवों को लाने गए दो और सैनिकों की भी मौत हो गई।
फरवरी के महीने में बंकर में पानी भर जाने के कारण दोनों को पास के एक टूटे हुए स्कूल में शरण लेनी पड़ी। कुछ ही समय बाद वहां रूसी ड्रोन से हमला हुआ। इस हमले में बास्की की मौत हो गई, जबकि व्लासेंको गंभीर रूप से घायल हो गए।
उनका एक पैर बुरी तरह टूट चुका था और हड्डी बाहर आ गई थी। चलने-फिरने में असमर्थ व्लासेंको ने बॉयलर के नीचे शरण ली। संक्रमण और दर्द से जूझते हुए उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए चाकू से अपना पैर खुद ही अलग कर दिया और खून रोकने के लिए पट्टी बांध ली। बाद में अस्पताल से उन्होंने बताया कि मैंने मान लिया था कि मैं मर चुका हूं और अब बचने की कोई उम्मीद नहीं बची थी।
पारंपरिक तरीके क्यों हो गए नाकाम?
रूसी ड्रोन लगातार इलाके पर नजर रख रहे थे, इसलिए वहां पिकअप या बख्तरबंद गाड़ियां भेजना नामुमकिन था। यूक्रेनी सेना ने व्लासेंको तक पहुंचने के लिए जमीन पर चलने वाले रोबोटिक गाड़ियां भी भेजे, लेकिन उन्हें भी रूसी ड्रोनों ने नष्ट कर दिया।
इसके बाद यूक्रेनी अधिकारियों की नजर गुरजुफ डिफेंस द्वारा बनाए गए एक भारी ड्रोन पर पड़ी। छह बड़े पंखों वाला यह ड्रोन 90 किलोग्राम तक का वजन उठाकर 25 किलोमीटर तक उड़ सकता था।
मोर्चे पर महीनों बिताने के बाद व्लासेंको का वजन घटकर करीब 70 किलोग्राम रह गया था, जिससे ड्रोन के जरिए उन्हें निकालना संभव लगा। हालांकि, रूसी लड़ाकू ड्रोनों के खतरे के कारण यह मिशन बेहद जोखिम भरा था।
हवा में 70 मीटर की ऊंचाई पर 15 मिनट का सफर
मिशन से एक दिन पहले व्लासेंको को ड्रोन के जरिए एक हार्नेस यानी सुरक्षा बेल्ट और एक फोन भेजा गया, जिसमें वीडियो देखकर बेल्ट पहनने का तरीका समझाया गया था।
4 अक्टूबर को वह बड़ा ड्रोन वहां पहुंचा। व्लासेंको ने खुद को ड्रोन के नीचे लटकी हुक से बांध लिया। इसके बाद ड्रोन उन्हें करीब 70 मीटर की ऊंचाई तक उठाकर सुरक्षित क्षेत्र की ओर उड़ चला।
इस दौरान रूसी ड्रोनों का ध्यान भटकाने के लिए तीन छोटे ड्रोन साथ उड़ रहे थे। साथ ही यूक्रेनी तोपखाने और अन्य लड़ाकू ड्रोनों ने दो घंटे तक रूसी ठिकानों पर बमबारी कर दुश्मन को उलझाए रखा। लगभग 15 मिनट के तनावपूर्ण सफर के बाद ड्रोन उन्हें लेकर सुरक्षित स्थान पर उतर गया।
सफर को याद करते हुए व्लासेंको ने कहा कि मुझे जंगल में गिरने का डर नहीं था, लेकिन मैं पानी में गिरने से डर रहा था क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता। यह रेस्क्यू ऑपरेशन दिखाता है कि यूक्रेन अब ड्रोनों का इस्तेमाल सिर्फ हमलों या रसद पहुंचाने के लिए ही नहीं, बल्कि घायल सैनिकों की जान बचाने के लिए भी कर रहा है।
