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आसिम मुनीर को मिली बेलगाम ताकत... क्या मिलिट्री शासन की तरफ बढ़ रहा है पाकिस्तान? Inside Story

By Shubham KumarEdited By: Shubham Kumar
Updated: Fri, 21 Aug 2026 04:49 PM (IST)

आर्थिक तंगी और गुलाम कश्मीर के विद्रोह के बीच, क्या पाकिस्तान ने आसिम मुनीर को असीम सैन्य ताकत सौंपकर लोकतंत्र को दांव पर लगा दिया है?

पाकिस्तान की नई सैन्य व्यवस्था।

पाकिस्तान की नई सैन्य व्यवस्था।

HighLights

  1. आसिम मुनीर को तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर बनाया गया।

  2. परमाणु हथियारों की कमान भी अब मुनीर के हाथों में।

  3. लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर, 'अघोषित मार्शल लॉ' की आशंका बढ़ी।

शुभम कुमार, इस्लामाबाद। दुनियाभर में कटोरा लेकर घूम रहे नापाक पड़ोसी पाकिस्तान ने अपने सैन्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है, जिसनें देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर फिर से गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने 'डिफेंस फोर्सेस ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026' और 'नेशनल कमांड अथॉरिटी एक्ट, 2010' में संशोधन को मंजूरी दे दी है।

इस मंजूरी के साथ ही पाकिस्तान के छोटे से इतिहास में यह पहली बार होने जा रहा है कि पाकिस्तान की सैन्य और रणनीतिक कमान की पूरी ताकत अब केवल एक ही शख्स के हाथों में होगी और वो शख्स है फील्ड मार्शल आसिम मुनीर।

मुनीर को बेलगाम ताकत के मायने

गौर करने वाली बात यह है कि यह बदलाव पाकिस्तान और वहां की जनता के लिए कितना फायदेमंद है, यह केवल एक संशय मात्र है। हालांकि इस फैसले से एक बात तो साफ हो गई है कि असीम मुनीर को अब पाकिस्तान सरकार ने बेलगाम ताकत सौंप दी है।

अच्छा, ज्यादा सोचने वाली बात यह भी है कि मुनीर को यह ताकत ऐसे समय में सौंपी गई है, जब पाकिस्तान आर्थिक तंगी और बदहाली से जूझ रहा है। ऊपर से गुलाम कश्मीर में विद्रोह भी चल रहा है। 

फिलहाल, पाकिस्तान के इस फैसले ने एक साथ कई सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल पूछे जा रहे हैं कि मुनीर को अचानक इतनी ताकत देकर शहबाज सरकार क्या साबित करना चाहती है?

सवाल यह भी पूछे जा रहे हैं कि क्या गुलाम कश्मीर में चल रहे विद्रोह के पीछे पाकिस्तानी की कोई नापाक योजना है? जरूरी सवाल यह भी है कि धीरे-धीरे क्या पाकिस्तान सैन्य शासन की ओर बढ़ रहा है?

पहले समझिए असिम मुनीर को क्या-क्या ताकत मिली?

पाकिस्तान के इस नए डिफेंस लॉ ने जनरल आसिम मुनीर को पाकिस्तान की थल सेना, नौसेना और वायुसेना का सर्वोच्च सर्वेसर्वा बना दिया है। आसान भाषा में उसको यूनाइटेड कमांड कहा जा सकता है। इसके तहत अब तीनों सेनाएं एक केंद्रीय मुख्यालय के अधीन आ गई हैं, जिसके मुखिया खुद मुनीर हैं।

बर्खास्तगी और भर्ती के अधिकार भी

इसके अलावा नए कानून के तहत मुनीर को सैन्य अधिकारियों और कर्मियों को सेवा से हटाने, सेवानिवृत्त करने, त्यागपत्र स्वीकार या अस्वीकार करने तथा उम्र की सीमा में बदलाव करने के असीमित अधिकार मिल गए हैं।

इतना ही नहीं इस नए कानून के आने के बाद मुनीर अब सिर्फ सेना प्रमुख नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा मामलों पर प्रधानमंत्री के मुख्य सैन्य सलाहकार भी बन गए हैं, जिससे सरकार पर उनका सीधा नियंत्रण स्थापित हो गया है।

परमाणु हथियारों की कमान भी एक हाथ में

पाकिस्तान की बदहाली के बीच ज्यादा सोचने वाली बात यह है कि यह बदलाव सिर्फ पारंपरिक सेना तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की परमाणु ताकत को भी इसके दायरे में लाया गया है। 27वें संविधान संशोधन के तहत कमांडर ऑफ द नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड (CNSC) का नया चार-स्टार पद सृजित किया गया है।

इस बात को ऐसे समझिए कि पिछले महीने ही जनरल सैयद आमेर रजा को इस पद पर नियुक्त किया गया था। अब नए संशोधनों के जरिए पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार और रणनीतिक ताकतों के संचालन को भी इस नए फौजी ढांचे के अंतर्गत कानूनी जामा पहना दिया गया है।

वैश्विक मंच पर कैसे मजाक का पात्र बना पाकिस्तान?

इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि इस कानून के पास होने के बाद से वैश्विक मंचों और खुद पाकिस्तान के भीतर देश की भारी किरकिरी हो रही है। आलोचकों और जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान की संसद ने जिस तेजी से और बिना किसी सार्थक बहस के इन कानूनों को पारित किया है, उसने यह साबित कर दिया है कि वहां की चुनी हुई सरकार केवल फौजी तंत्र की रबर स्टैंप बनकर रह गई है।

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की मौजूदगी में इस कानून का पास होना इस बात का प्रमाण है कि इस्लामाबाद में असली सत्ता का केंद्र अब प्रधानमंत्री हाउस नहीं, बल्कि जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) बन चुका है।

अघोषित मार्शल लॉ का आधार भी समझिए

दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषक इसे पाकिस्तान में 'अघोषित मार्शल लॉ' करार दे रहे हैं, जहां लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर कर सीधे तौर पर वर्दीधारी अधिकारियों को देश की संपूर्ण बागडोर सौंप दी गई है।

अब समझिए बदलाव के मायने क्या हैं?

गौरतलब है कि पैसा, पानी और भोजन के लिए तरस रहे पाकिस्तान में इस प्रकार के गहरे मायने हैं। देखा जाए तो इस फैसले के साथ ही पाकिस्तान में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की शक्तियां सीमित हो गई हैं और सैन्य नेतृत्व पर प्रशासनिक या राजनीतिक जवाबदेही लगभग समाप्त हो गई है।

दूसरी तरफ पाकिस्तान में फैला फौजी तंत्र भले ही इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा और बहु-डोमेन एकीकरण' का नाम दे रहा हो, लेकिन असलियत यह है कि यह कदम सेना के शीर्ष नेतृत्व को कानूनी रूप से अछूत और सर्वशक्तिशाली बनाने के लिए उठाया गया है।